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शासन व्यवस्था

न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

  • 11 Mar 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारत के मुख्य न्यायाधीश, संयुक्त राष्ट्र महासभा, दोहा घोषणा, सतत् विकास लक्ष्य, संयुक्त राष्ट्र, सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम।

मेन्स के लिये:

महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के कारण, महिलाओं के अधिक प्रतिनिधित्व का महत्त्व एवं आगे की राह, महिलाओं से संबंधित मुद्दे, लिंग।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में महिलाओं की कम संख्या को लेकर चिंता व्यक्त की है।

  • उन्होंने यह टिप्पणी अंतर्राष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस (10 मार्च) के अवसर पर एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए की।

प्रमुख बिंदु 

अंतर्राष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस:

  • अंतर्राष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस के बारे में:
    • वर्ष 2021 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प 75/274 द्वारा 10 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस के रूप में नामित किया गया।
      • भारत इस प्रस्ताव को प्रायोजित करने वाले देशों में शामिल था, जिसे कतर द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
  • महत्त्व:
    • इस दिन का उद्देश्य महिला न्यायाधीशों द्वारा किये जा रहे प्रयासों और योगदान को मान्यता प्रदान करना है।
    • यह दिन समुदाय की उन युवतियों और लड़कियों को भी सशक्त बनने की प्रेरणा देता है जो जज और नेता बनने की इच्छा रखती हैं।
    • न्यायिक सेवाओं में लैंगिक असमानता का मुकाबला करने से संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी मदद मिलेगी।
      • एसडीजी लक्ष्य 5: लैंगिक समानता हासिल करना और सभी महिलाओं व लड़कियों को सशक्त बनाना।

न्यायपालिका में महिलाओं की स्थिति:

  • उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीश मात्र 11.5% हैं,  जबकि सर्वोच्च न्यायालय में 33 में से चार महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं।
  • देश में महिला अधिवक्ताओं/वकीलों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। पंजीकृत 1.7 मिलियन अधिवक्ताओं में से केवल 15% महिलाएंँ हैं।

महिला प्रतिनिधियों के कम होने का कारण:

  • समाज की पितृसत्तात्मक सोच: यह समय की माँग और आवश्यकता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नत होने वालों के नामों की अनुशंसा और अनुमोदन में पितृसत्तात्मक मानसिकता से बचा जाए और पदोन्नति के लिये योग्य महिला अधिवक्ताओं तथा ज़िला न्यायाधीशों पर विचार के साथ महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।  
    • जब तक महिलाएँ सशक्त नहीं होंगी, उनके साथ न्याय नहीं हो सकता।
  • अपारदर्शी कॉलेजियम प्रणाली: भर्ती के लिये प्रवेश परीक्षा पद्धति के माध्यम से अधिकाधिक महिलाएँ निचली न्यायपालिका में प्रवेश करती हैं। 
    • हालाँकि उच्च न्यायपालिका में एक कॉलेजियम प्रणाली प्रचलित है, जो अधिकाधिक अपारदर्शी बनी हुई है और इसलिये इसके पूर्वाग्रह से ग्रसित होने की अधिक संभावना है।
    • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उच्च न्यायालयों के लिये 192 उम्मीदवारों की सिफारिश की, इनमें से 37 यानी 19% महिलाएँ थीं लेकिन दुर्भाग्य से अब तक अनुशंसित 37 में से केवल 17 महिलाओं को ही नियुक्त किया गया है।
  • महिला आरक्षण का अभाव: कई राज्यों में निचली न्यायपालिका में महिलाओं के लिये एक आरक्षण नीति का कार्यान्वयन किया जाता है, लेकिन उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में यह अवसर मौजूद नहीं है। 
    • असम, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और राजस्थान जैसे राज्यों को इस तरह के आरक्षण से लाभ हुआ है, क्योंकि अब उनके पास 40-50% महिला न्यायिक अधिकारी हैं।
    • वस्तुस्थिति यह है कि संसद और राज्य विधानसभाओं तक में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का विधेयक आज तक पारित नहीं हुआ है, बावजूद इसके कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से इसका समर्थन करते रहे हैं।
  • पारिवारिक उत्तरदायित्व: आयु और पारिवारिक उत्तरदायित्व जैसे कारक भी अधीनस्थ न्यायिक सेवाओं से उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की पदोन्नति को प्रभावित करते हैं। 
  • लिटिगेशन (Litigation) के क्षेत्र में महिलाओं की पर्याप्त संख्या का अभाव: चूँकि बार से बेंच में पदोन्नत किये गए अधिवक्ता उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के एक महत्त्वपूर्ण अनुपात का निर्माण करते हैं, महिलाएँ यहाँ भी पीछे रह जाती हैं। उल्लेखनीय कि महिला अधिवक्ताओं की संख्या अभी भी कम है, जिससे वह समूह छोटा रह जाता है, जिससे महिला न्यायाधीश चुनी जा सकती हैं।  
  • न्यायिक अवसंरचना: न्यायिक बुनियादी ढाँचा या इसकी कमी पेशेवर महिलाओं के लिये एक और बाधा है।
    • छोटे कोर्टरूम जो भीड़भाड़ वाले और तंग हैं में टॉयलेट का अभाव तथा चाइल्डकेयर सुविधाओं की कमी।
  • कोई गंभीर प्रयास नहीं:
  • पिछले 70 वर्षों के दौरान उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायिक सेवाओं में पदोन्नति के लिये उपलब्ध हैं, लेकिन इसके बावजूद महिला न्यायाधीशों की संख्या कम है।

उच्च महिला प्रतिनिधित्व का महत्त्व:

  • अधिकाधिक महिलाओं को न्याय प्राप्त करने हेतु प्रेरणा: महिला न्यायाधीशों की अधिक संख्या और उनकी अधिक दृश्यता अधिकाधिक महिलाओं को न्याय प्राप्त करने और अपने अधिकार पाने के लिये न्यायालयों तक पहुँचने हेतु प्रेरित कर सकती है। 
    • हालाँकि यह बात सभी मामलों में लागू नहीं होती, लेकिन न्यायाधीश का महिला होना महिलाओं को अधिक साहस प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
    • उदाहरण के लिये यदि ट्रांसजेंडर महिलाओं के मामले की सुनवाई के लिये न्यायाधीश के रूप में एक ट्रांसजेंडर महिला उपलब्ध हो तो निश्चय ही इससे वादियों के भरोसा बढ़ेगा।
  • अलग-अलग दृष्टिकोण का समावेश: न्यायपालिका में विभिन्न सीमांत/वंचित तबके के लोगों का प्रतिनिधित्व उनके अलग-अलग जीवन-अनुभवों के कारण निश्चित रूप से मूल्यवान साबित होगा।  
    • बेंच में विविधता निश्चित रूप से वैधानिक व्याख्याओं के लिये वैकल्पिक और समावेशी दृष्टिकोण लेकर आएगी।
  • न्यायिक तर्कसंगतता में वृद्धि: न्यायिक विविधता में वृद्धि विभिन्न सामाजिक संदर्भों और अनुभवों को शामिल करने तथा प्रतिक्रिया देने के लिये न्यायिक तर्कसंगतता की क्षमता को समृद्ध और सुदृढ़ करती है।  
    • यह महिलाओं और हाशिये पर स्थित समूहों की आवश्यकताओं के प्रति न्याय क्षेत्र की प्रतिक्रियाओं में सुधार ला सकता है। 

आगे की राह

  • भारत में समावेशिता पर ज़ोर देकर संस्थागत, सामाजिक और व्यावहारिक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।
  • यह समय की मांग और आवश्यकता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नत होने वालों के नामों की अनुशंसा एवं अनुमोदन में पितृसत्तात्मक मानसिकता को दूर किया जाए तथा पदोन्नति के लिये योग्य महिला अधिवक्ताओं व ज़िला न्यायाधीशों पर विचार करने के साथ महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।  
    • जब तक महिलाएँ सशक्त नहीं होंगी, उनके साथ न्याय नहीं हो सकता।
  • यह उपयुक्त समय है कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में भूमिका रखने वाले लोग न्यायपालिका में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता को समझें।  
    • वास्तव में उच्च न्यायपालिका में भी अधीनस्थ न्यायपालिका की तरह योग्यता से कोई समझौता किये बिना महिलाओं के लिये क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिये।

स्रोत: द हिंदू

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