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संवेदनशील गवाहों की रक्षा करना: SC

  • 12 Jan 2022
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

संवेदनशील गवाह जमा केंद्र (VWDC), अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार), भारत के संविधान का अनुच्छेद 141/142।

मेन्स के लिये:

भारत में गवाह संरक्षण, वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर), संवेदनशील गवाह जमा केंद्र, धारा 377 आईपीसी, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने संवेदनशील गवाहों के अर्थ का विस्तार करते हुए इसमें अन्य यौन उत्पीड़न पीड़ितों, मानसिक रूप से बीमार, बोलने या सुनने में अक्षम लोगों को भी शामिल किया है।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1996 और फिर 2004 व 2017 के एक फैसले का हवाला दिया जिसमें उसने इसी तरह के निर्देश पारित किये थे। जब उसने देश के सभी उच्च न्यायालयों को संवेदनशील गवाहों हेतु 2017 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा तैयार किये गए दिशा निर्देशों को अपनाने के लिये कहा था।

प्रमुख बिंदु:

  • संवेदनशील गवाह: संवेदनशील गवाहों का मतलब केवल बाल गवाहों तक सीमित नहीं होगा। इसमें निम्नलिखित भी शामिल होंगे:
  • खतरो के शिकार गवाह और कोई भी भाषण या श्रवण बाधित व्यक्ति या किसी अन्य विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति।
  • संवेदनशील गवाह जमा केंद्र (VWDC): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि सभी उच्च न्यायालय (HC) दो महीने की अवधि के भीतर एक संवेदनशील गवाह जमा केंद्र (VWDC) योजना को अपनाएँ और अधिसूचित करें।
  • संवेदनशील गवाह जमा केंद्र (Vulnerable Witness Deposition Centre- VWDC)
    • VWDC संवेदनशील गवाहों के साक्ष्य दर्ज़ करने के लिये एक सुरक्षित और बाधा मुक्त वातावरण प्रदान करेगा।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय से यह सुनिश्चित करने को कहा कि प्रत्येक ज़िले में एक VWDC हो।
    • इन VWDC को वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) केंद्रों के निकट स्थापित किया जाना चाहिये।
  • हितधारकों को संवेदनशील बनाना: सर्वोच्च न्यायालय ने VWDC के प्रबंधन के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने और बार, बेंच व कर्मचारियों सहित सभी हितधारकों को संवेदनशील बनाने के महत्त्व की ओर भी इशारा किया है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गीता मित्तल से अखिल भारतीय VWDC प्रशिक्षण कार्यक्रम को डिज़ाइन करने और लागू करने के लिये समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने का आग्रह किया।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने समिति के अध्यक्ष को प्रशिक्षण की योजनाओं हेतु एक प्रभावी इंटरफेस प्रदान करने के लिये राष्ट्रीय और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों के साथ जुड़ने का भी निर्देश दिया।
    • साथ ही न्यायालय ने केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को आवश्यक लॉजिस्टिक्स सहायता के समन्वय हेतु एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति का निर्देश दिया है।

भारत में गवाह संरक्षण:

  • वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘गवाह संरक्षण योजना- 2018’ को मंज़ूरी दी थी, जिसका उद्देश्य एक गवाह को निडर और सच्चाई से गवाही देने में सक्षम बनाना है। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
    • अदालतों में स्वतंत्र रूप से गवाही देने का गवाहों का अधिकार अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा है।
    • यह योजना भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 और 142 के तहत एक कानून के तौर पर लागू होगी।
    • न्यायपीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को संवेदनशील गवाह केंद्र स्थापित करने को भी कहा है।
  • यद्यपि यह योजना अभी तक संसद में लंबित है, सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों में इस योजना को तुरंत लागू करने का आदेश दिया है और स्पष्ट कहा कि यह योजना देश में कानून के तौर पर लागू होगी।
  • वर्षों से विधि आयोग की विभिन्न रिपोर्टों और न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में गवाहों की रक्षा करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है।
    • गुजरात राज्य बनाम अनिरुद्ध सिंह (1997), 14वें विधि आयोग की रिपोर्ट और मलीमथ समिति की रिपोर्ट ने गवाह संरक्षण योजना की सिफारिश की है।

आगे की राह

  • गवाह ‘न्याय की आँख और कान’ होते हैं और ऐसे में यह योजना राष्ट्र की प्रभावी न्याय वितरण प्रणाली की दिशा में एक सही कदम साबित होगी।
  • हालाँकि अब तक ऐसे कई तदर्थ कदम उठाए गए हैं, जिसमें संवेदनशील गवाहों हेतु कुछ समर्पित अदालत कक्ष और गवाहों की पहचान छुपाना (आतंकवाद विरोधी आदि जैसे मामलों में) आदि शामिल हैं, किंतु ये अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में असफल रहे हैं।
  • इसलिये गवाहों से छेड़छाड़ के खिलाफ निषेध पर ज़ोर देने के विधायी उपाय मौजूदा समय की अपरिहार्य आवश्यकता बन गए हैं।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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