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एक देश दो प्रणाली

  • 02 Sep 2019
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

हॉन्गकॉन्ग में लगातार चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच चीन की एक देश दो प्रणाली (One Country Two Systems) नीति फिर से चर्चा में आ गई है।

प्रमुख बिंदु:

  • हॉन्गकॉन्ग की स्थानीय सरकार द्वारा एक विवादास्पद कानून लाए जाने के बाद से ही स्थानीय लोग इसे हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता का उल्लंघन मान रहे हैं जिसकी वजह से चीन के विरुद्ध वहाँ पर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चीन इस प्रकार के प्रदर्शन को देश विरोधी बता रहा है।
  • हॉन्गकॉन्ग और मकाउ क्षेत्र चीन के मुख्य भू-भाग से आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर भिन्न हैं इसलिये उन्हें विशेष प्रशासनिक क्षेत्र घोषित किया गया है।

नीति की उत्पत्ति:

  • डेंग शियाओपिंग (Deng Xiaoping) द्वारा वर्ष 1970 के आसपास देश के शासन की बागडोर संभालने के बाद एक देश दो प्रणाली (One Country Two Systems) नीति प्रस्तावित की गई थी। डेंग की इस योजना का मुख्य उद्देश्य चीन और ताइवान को एकजुट करना था।
  • इस नीति के माध्यम से ताइवान को उच्च स्वायत्तता देने का वादा किया गया था। इस नीति के तहत ताइवान चीनी संप्रभुता के अंतर्गत अपनी पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली का पालन कर सकता है, एक अलग प्रशासन चला सकता है और अपनी सेना रख सकता है। हालाँकि ताइवान ने कम्युनिस्ट पार्टी के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
  • चीन के राष्ट्रवादी समर्थकों को वर्ष 1949 में कम्युनिस्टों ने गृहयुद्ध में हरा दिया था। कम्युनिस्टों से हारने के बाद चीन के राष्ट्रवादी ताइवान चले गए थे।
  • राष्ट्रवादियों द्वारा तब से ताइवान में चीन से एक अलग शासन चलाया जा रहा है, हालांँकि चीन ने ताइवान पर अपना दावा कभी नहीं छोड़ा।

ताइवान और मकाउ का इतिहास:

  • हॉन्गकॉन्ग और मकाउ क्रमशः ब्रिटेन और पुर्तगाल के उपनिवेश थे। वर्ष 1842 के प्रथम अफीम युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने हॉन्गकॉन्ग पर अधिकार कर लिया था। ब्रिटिश सरकार और चीन के किंग राजवंश ने पेकिंग के दूसरे कन्वेंशन पर वर्ष 1898 में हस्ताक्षर किये , जिसके अनुसार हॉन्गकॉन्ग को 99 वर्षों के लिये चीन ने लीज़ पर ब्रिटेन को दे दिया। वहीं दूसरी ओर मकाउ पर वर्ष 1557 से पुर्तगालियों का शासन था। पुर्तगाल ने 1970 के दशक के मध्य से ही अपने सैनिकों को वापस बुलाना शुरू कर दिया था।
  • डेंग शियाओपिंग ने 1980 के दशक से ही दोनों क्षेत्रों का हस्तांतरण चीन को करने के लिये ब्रिटेन और पुर्तगाल के साथ बातचीत शुरू की। बातचीत के दौरान ही चीन ने एक देश दो प्रणाली के तहत इन क्षेत्रों की स्वायत्तता का सम्मान करने का वादा किया था।
  • चीन और ब्रिटेन के बीच 19 दिसंबर, 1984 को बीजिंग में चीन-ब्रिटिश संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किये गए थे, जिसके तहत हॉन्गकॉन्ग हेतु वर्ष 1997 से कानूनी, आर्थिक और सरकारी प्रणालियों में स्वायत्तता का निर्धारण किया गया था।
  • इसी तरह 26 मार्च, 1987 को चीन और पुर्तगाल ने मकाउ के प्रश्न पर संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किये, जिसमें चीन ने मकाउ को भी हॉन्गकॉन्ग की भांँति स्वायत्तता देनी की बात कही थी।
  • उपरोक्त दो अनुबंधों के बाद एक देश दो प्रणाली की नीति को व्यावहारिक स्तर पर लागू किया गया था।
  • 1 जुलाई, 1997 को हॉन्गकॉन्ग और 20 दिसंबर, 1999 को मकाउ चीनी नियंत्रण में आ गए। चीन ने दोनों देशों को विशेष प्रशासनिक क्षेत्र घोषित किया।
  • इस प्रकार इन देशों की अपनी मुद्राएँ, आर्थिक और कानूनी प्रणालियांँ होंगी, लेकिन रक्षा तथा विदेशी कूटनीति चीन द्वारा तय की जाएगी।
  • इसके तहत 50 वर्षों के लिये एक मिनी संविधान बनाया गया जो हॉन्गकॉन्ग हेतु वर्ष 2047 तक और मकाउ के लिये वर्ष 2049 तक वैध होगा। इस समयावधि के बाद की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट नहीं किया गया है।

वर्तमान संकट:

  • हाल के वर्षों में हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता को नष्ट करने के संबधी चीन के कथित प्रयासों के विरुद्ध यहाँ के लोकतंत्र समर्थक नागरिक समाज में तनाव बढ़ गया है। जिसके परिणामस्वरूप यहाँ के युवाओं ने स्थानीय सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
  • हॉन्गकॉन्ग की एक स्थानीय पार्टी हॉन्गकॉन्ग नेशनल पार्टी को वर्ष 2018 में गैर कानूनी घोषित कर दिया गया था।
  • इस वर्ष हॉन्गकॉन्ग की मुख्य कार्यकारी कैरी लैम ने प्रत्यर्पण विधेयक का प्रस्ताव रखा, जिसमें हॉन्गकॉन्ग के लोगों को उन स्थानों पर प्रत्यर्पित करने का प्रावधान किया गया था जो हॉन्गकॉन्ग के प्रत्यर्पण समझौते के तहत नहीं आते हैं, इसमें चीन भी शामिल है।
  • इस प्रकार के प्रत्यर्पण समझौते से चीन, हॉन्गकॉन्ग से किसी व्यक्ति को प्रत्यर्पित कर सकता है जो सीधे-सीधे यहाँ की स्वायत्तता पर हमला होगा इसका विरोध हॉन्गकॉन्ग में बड़े स्तर पर हो रहा है।
  • वर्तमान में विरोध के बाद इस समझौते के मसौदे को वापस ले लिया है लेकिन गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों को रिहा करने और शहर की चुनावी प्रणाली में सुधार हेतु अभी प्रदर्शन जारी हैं।

स्रोत: द हिंदू

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