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ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड और संबंधित दिशा-निर्देश

  • 11 Feb 2021
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

वैज्ञानिकों द्वारा उत्तराखंड के चमोली ज़िले में आई हालिया बाढ़ के लिये ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) को एक बड़ा कारण माना जा रहा है।

  • अक्तूबर 2020 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) के कारण होने वाली आपदाओं को कम करने और उनसे निपटने के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये थे।
  • NDMA द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक, संभावित रूप से खतरनाक झीलों की पहचान और मैपिंग करके, उनके अचानक फटने या तबाही मचाने को रोकने के लिये संरचनात्मक उपाय करने तथा ऐसी आपात स्थिति में जीवन एवं संपत्ति के नुकसान को बचाने के लिये एक आवश्यक तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है।

प्रमुख बिंदु

  • ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF)
    • अर्थ
      • यह ऐसी बाढ़ को संदर्भित करता है जिसमें ग्लेशियर या मोराइन (ग्लेशियर की सतह पर गिरी धूल और मिट्टी का जमाव) से पानी अचानक गिरता है।
      • जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो यह जल, रेत, कंकड़ और बर्फ के अवशेषों से बने प्राकृतिक बाँध जैसी संरचना यानी ‘मोराइन’ में एकत्रित हो जाता है।
      • मिट्टी के बाँधों के विपरीत, ‘मोराइन’ बाँध की कमजोर संरचना के कारण ये प्रायः जल्दी टूट जाते हैं, जिससे निचले इलाकों में तेज़ी से बाढ़ आती है।
    • कारण
      • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के मुताबिक, हिंदू-कुश हिमालय के अधिकांश हिस्सों में होने वाले जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नई ग्लेशियल झीलों का निर्माण हो रहा है, जो कि ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) का प्रमुख कारण हैं।
  • ग्लेशियल झीलें
    • ग्लेशियल झीलें आमतौर पर एक ग्लेशियर के तल पर बनती हैं।
    • जिस प्रकार ग्लेशियर आगे बढ़ते हैं वे अपने चारों ओर की मिट्टी और तलछट का अपक्षरण करते चलते हैं, जिससे आस-पास की भूमि पर गड्ढे बन जाते हैं। इस दौरान ग्लेशियर का पिघला हुआ जल उन गड्ढों को भर देता है, जिससे एक झील का निर्माण होता है।
    • प्रकार
      • ग्लेशियल झीलों का निर्माण तब होता है जब ग्लेशियर का पिघला हुआ पानी ग्लेशियर द्वारा बनाए गए गड्ढों के अंदर जाता है, और यह प्रक्रिया बर्फ की सतह (सुप्राग्रैशियल झील) पर, ग्लेशियर की सतह से अलग भूमि पर (प्रोग्रैशियल झीलें), या बर्फ की सतह के नीचे के नीचे भी (सबग्रैशियल झीलें) हो सकता है।
    • प्रभाव
      • ग्लेशियर झीलें बर्फ की सतह पर घर्षण को कम करके बर्फ के प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे प्रारंभिक स्खलन/बेसल स्लाइडिंग को बढ़ावा मिलता है।
      • प्रोग्रैशियल झीलें खंडन (Calving) का कारण बनती हैं, जो कि ग्लेशियर के द्रव्यमान संतुलन को प्रभावित करता है।
      • ग्लेशियर झीलें आपदा की दृष्टि से भी काफी संवेदनशील होती हैं और मोराइन जैसी बाँध संरचना के विफल होने पर गंभीर प्रलय आने की संभावना बढ़ जाती है।
    • ग्लेशियल झीलों की बढ़ती संख्या
      • हाल के अध्ययनों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप लगातार बढ़ रहे गर्म तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसके कारण व्यापक पैमाने पर बाढ़ और विनाशकारी घटनाओं की संभावना में भी बढ़ोतरी हो रही है।
      • उदाहरण के लिये वर्ष 2013 में केदारनाथ त्रासदी में एक बड़ी ग्लेशियल झील का फटना शामिल था।
      • वर्ष 2011-15 के दौरान केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा प्रायोजित एक अध्ययन के अनुसार सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में क्रमशः 352, 283 तथा 1,393 ग्लेशियल झील एवं जल निकाय हैं।
  • जोखिम प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देश
    • संभावित खतरनाक झीलों की पहचान
      • ज़मीनी दौरे, पूर्व की घटनाओं, झील/बाँध और आस-पास की भू-तकनीकी विशेषताओं तथा अन्य भौतिक स्थितियों के आधार पर संभावित खतरनाक झीलों की पहचान की जा सकती है।
    • तकनीक का उपयोग
      • मानसून के महीनों के दौरान नई झील संरचनाओं समेत जल निकायों में आने वाले स्वतः परिवर्तनों का पता लगाने के लिये सिंथेटिक-एपर्चर रडार इमेज़री (एक प्रकार का रडार जो द्वि-आयामी छवियों के निर्माण में सहायता करता है) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है।
      • अंतरिक्ष से जल निकायों की निगरानी से संबंधित तंत्र और प्रोटोकॉल भी विकसित किया जा सकता है।
    • निर्माण गतिविधि के लिये समान संहिता
      • संवेदनशील क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के विकास, निर्माण और उत्खनन के लिये एक व्यापक ढाँचा विकसित किया जाना चाहिये।
      • ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में भूमि उपयोग नियोजन के लिये प्रक्रियाओं को मान्यता दिये जाने की आवश्यकता है।
    • अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) में सुधार करना
      • भारत समेत विश्व के लगभग सभी देशों में ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) से संबंधित अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) की संख्या बहुत कम है।
      • हिमालयी क्षेत्र में, ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) को लेकर पूर्व चेतावनी के लिये सेंसर और निगरानी आधारित तकनीकी प्रणालियों के तीन उदाहरण मौजूद हैं, जिसमें से दो नेपाल में तथा एक चीन में है।
    • स्थानीय श्रमशक्ति को प्रशिक्षित करना
      • आपतकालिक स्थिति में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और थल सेना जैसे विशेष बलों का प्रयोग करने के साथ-साथ स्थानीय श्रम-शक्ति को भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिये।
      • यह देखा गया है कि 80 प्रतिशत से अधिक खोज और बचाव कार्य स्थानीय समुदाय द्वारा राज्य मशीनरी तथा विशेष खोज एवं बचाव टीमों के हस्तक्षेप से पूर्व किया जाता है।
      • इस प्रणाली के तहत स्थानीय टीमें आपातकालीन आश्रयों की योजना बनाने और स्थापित करने, राहत पैकेज वितरित करने, लापता लोगों की पहचान करने तथा भोजन, स्वास्थ्य देखभाल, पानी की आपूर्ति आदि की ज़रूरतों को पूरा करने में भी सहायता कर सकती हैं।
    • अलार्म सिस्टम
      • पारंपरिक अलार्म सिस्टम के स्थान पर स्मार्टफोन का उपयोग करने वाली आधुनिक संचार तकनीक प्रणाली का उपयोग किया जा सकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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