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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

नाविक

  • 27 Oct 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

इसरो, जीपीएस, आईएमओ, आईआरएनएसएस, L बैंड, ग्लोनास, गैलीलियो, बीडौ।ँ

मेन्स के लिये:

NavIC का महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

भारत अपनी क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली NaVIC (भारतीय नक्षत्र में नेविगेशन) का विस्तार करने की योजना बना रहा है, ताकि देश की सीमाओं से दूर यात्रा करने वाले नागरिक क्षेत्र और जहाज़ों, विमानों में इसके उपयोग को बढ़ाया जा सके।

नाविक:

  • परिचय:
    • कुल आठ उपग्रह हैं लेकिन अभी तक केवल सात ही सक्रिय हैं।
      • भूस्थिर कक्षा में तीन और भू-समकालिक कक्षा में चार उपग्रह स्थापित हैं।
      • नाविक या भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) को 7 उपग्रहों के एक समूह और 24 x 7 पर चलने वाले ग्राउंड स्टेशनों के नेटवर्क के साथ डिज़ाइन किया गया है।
  •  नाविक का पहला उपग्रह (IRNSS-1A) 1 जुलाई, 2013 को लॉन्च किया गया था और आठवांँ उपग्रह RNSS-1 अप्रैल 2018 में लॉन्च किया गया था।
    • तारामंडल के उपग्रह (IRNSS-1G) के सातवें प्रक्षेपण के साथ 2016 में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा IRNSS का नाम बदलकर NaVIC कर दिया गया।
  • इसे अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा 2020 में हिंद महासागर क्षेत्र में संचालन के लिये वर्ल्ड-वाइड रेडियो नेविगेशन सिस्टम (WWRNS) के एक भाग के रूप में मान्यता दी गई थी।

संभावित उपयोग:

  • स्थलीय, हवाई और समुद्री नेविगेशन;
  • आपदा प्रबंधन;
  • वाहन ट्रैकिंग और बेड़ा प्रबंधन (विशेषकर खनन व परिवहन क्षेत्र के लिये);
  • मोबाइल फोन के साथ एकीकरण;
  • सटीक समय (एटीएम और पावर ग्रिड के लिये);
  • मानचित्रण और जियोडेटिक डेटा कैप्चर

IRNSS

महत्त्व:

  • यह 2 सेवाओं के लिये वास्तविक समय की जानकारी देता है अर्थात् नागरिक उपयोग के लिये मानक स्थिति सेवा और जिसे सेना के लिये अधिकृत एन्क्रिप्ट की जाने वाली प्रतिबंधित सेवा का संचालन करता है।
  • भारत उन 5 देशों में से एक बन गया जिनके पास अपना नेविगेशन सिस्टम है। इसलिये नेविगेशन उद्देश्यों के लिये अन्य देशों पर भारत की निर्भरता कम हो जाती है।
  • यह भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति में मदद करेगा। यह देश की संप्रभुता और सामरिक आवश्यकताओं के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • अप्रैल 2019 में, सरकार ने निर्भया मामले के फैसले के अनुसार देश के सभी वाणिज्यिक वाहनों के लिये नाविक-आधारित वाहन ट्रैकर्स को अनिवार्य कर दिया।
  • साथ ही, क्वालकॉम टेक्नोलॉजीज ने नाविक का समर्थन करने वाले मोबाइल चिपसेट का अनावरण किया है
  • इसके अलावा व्यापक कवरेज के साथ परियोजना के भविष्य के उपयोगों में से एक में सार्क देशों के साथ परियोजना को साझा करना शामिल है। इससे क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली को और एकीकृत करने में मदद मिलेगी तथा इस क्षेत्र के देशों के प्रति भारत की ओर से कूटनीतिक सद्भावना का संकेत मिलेगा।

मुद्दे एवं उनमें सुधार

  • L बैंड:
    • इसरो ने कम से कम पाँच उपग्रहों को बेहतर L-बैंड से बदलने की योजना बनाई है, जो इसे जनता को बेहतर वैश्विक स्थिति सेवाएंँ प्रदान करने में सक्षम बनाएगा क्योंकि इस समूह के कई उपग्रहों की कार्यावधि को समाप्त कर दिया गया है।
      • निष्क्रिय उपग्रहों को बदलने के लिये समय-समय पर पाँच और उपग्रह प्रक्षेपित किये जाएंगे।
      • नए उपग्रहों में L-1, L-5 और S बैंड होंगे।
        • L1, L2 और L5 GPS आवृत्ति हैं, जहाँ L1 आवृत्ति का उपयोग GPS उपग्रह स्थान को ट्रैक करने के लिये किया जाता है, L2 आवृत्ति का उपयोग GPS उपग्रहों की स्थिति को ट्रैक करने के लिये किया जाता है और L5 आवृत्ति का उपयोग नागरिक उपयोग के लिये सटीकता जैसे कि विमान की सटीकता में सुधार करने के लिये किया जाता है।
        • S बैंड 8-15 सेमी की तरंग दैर्ध्य और 2-4 गीगाहर्ट्ज़ की आवृत्ति पर काम करता है। तरंग दैर्ध्य और आवृत्ति के कारण, S बैंड रडार आसानी से क्षीण नहीं होते हैं। यह उन्हें निकट और दूर के मौसम के अवलोकन के लिये उपयोगी बनाता है।
  • सामरिक क्षेत्र के लिये लॉन्ग कोड:
    • वर्तमान में इसरो केवल शाॅर्ट कोड प्रदान कर रहा है। अब शॉर्ट कोड को रणनीतिक क्षेत्र के उपयोग के लिये लॉन्ग कोड बनना होगा ताकि सिग्नल का उल्लंघन या वह अनुपलब्ध हो सके।
    • ऐसा इसलिये किया जाएगा ताकि यूज़र बेस को चौड़ा किया जा सके और इसे यूज़र फ्रेंडली बनाया जा सके।
  • मोबाइल संगतता:
    • वर्तमान में भारत में मोबाइल फोन को इसके संकेतों को संसाधित करने के लिये अनुकूल नहीं बनाया गया है।
    • भारत सरकार निर्माताओं पर अनुकूल ब्राॅडबैंड के लिये दबाव बना रही है और जनवरी 2023 की समय-सीमा तय की है, लेकिन मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि वर्ष 2025 से पहले इसकी संभावना नहीं है।

दुनिया में अन्य नेविगेशन सिस्टम:

  • चार वैश्विक प्रणालियाँ:
    • अमेरिका का जीपीएस
    • रूस का ग्लोनास
    • यूरोपीय संघ का गैलीलियो
    • चीन का बाइडू
  • दो क्षेत्रीय प्रणालियाँ:
    • भारत का नाविक
    • जापान का QZSS

नाविक की आवश्यकता, अन्य नेवीगेशन प्रणालियों के समांतर:  

  • GPS और ग्लोनास आदि देशों की रक्षा एजेंसियों द्वारा संचालित होती है।
  • यह संभव है कि नागरिक सेवा को बाधित या अस्वीकार किया जा सकता है।
  • नाविक भारतीय क्षेत्र में एक स्वतंत्र क्षेत्रीय प्रणाली है और सेवा क्षेत्र के भीतर स्थिति सेवा प्रदान करने के लिये अन्य प्रणालियों पर निर्भर नहीं है।
  • यह पूरी तरह से भारत सरकार के नियंत्रण में है।

आगे की राह 

  • नाविक को वास्तव में जीपीएस की तरह वैश्विक बनाने के लिये वर्तमान प्रणाली की तुलना में अधिक उपग्रहों को पृथ्वी के करीब एक कक्षा में स्थापित करने की आवश्यकता होगी।
  • अभी नाविक की पहुंँच भारतीय क्षेत्र से केवल 1,500 किमी. दूर है लेकिन इससे आगे की यात्रा करने वाले हमारे जहाज़ों और हवाई जहाज़ों के लिये हमें मध्यम पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों की आवश्यकता होगी। इसे किसी बिंदु पर वैश्विक बनाने के लिये हम MEO उपग्रहों को जोड़ना जारी रख सकते हैं।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स:

Q. भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. IRNSS के भूस्थिर में तीन उपग्रह और भू-समकालिक कक्षाओं में चार उपग्रह हैं।
  2. IRNSS पूरे भारत को कवर करता है और लगभग 5500 वर्ग किमी.इसकी सीमाओं से परे है ।
  3. 2019 के मध्य तक भारत के पास पूर्ण वैश्विक कवरेज के साथ अपना स्वयं का उपग्रह नेविगेशन सिस्टम होगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 1 
(B) केवल 1 और 2
(C) केवल 2 और 3
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर: (A)


मेन्स 

प्रश्न. भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) की आवश्यकता क्यों है? यह नेविगेशन में कैसे मदद करता है? (2018)

स्रोत: द हिंदू

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