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डेली अपडेट्स

जीव विज्ञान और पर्यावरण

हिमाचल प्रदेश में बंदर हिंसक जानवर घोषित

  • 24 Jul 2019
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने हिमाचल प्रदेश में बंदरों को एक वर्ष के लिये हिंसक जानवर (Vermin) घोषित किया है।

प्रमुख बिंदु

  • मंत्रालय की घोषणा के बाद शिमला के स्थानीय अधिकारियों को गैर-वनीय क्षेत्रों में बंदरों को मारने के लिये एक वर्ष का समय दिया गया है।
  • इस फैसले का पशु अधिकारों के लिये कार्य करने वाले संगठनों द्वारा विरोध किया जा रहा है। इनका तर्क है कि फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले वन्य जीवों को मारना समस्या का समाधान नहीं है।
  • सरकार के इस निर्णय से वन्यजीवों के अवैध व्यापार में वृद्धि भी हो सकती है। अतः संबंधित मामले में विचार-विमर्श एवं विश्लेषण के बाद ही कोई कठोर कदम उठाया जाना चाहिये।

फैसले के पीछे कारण

  • हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में रीसस मकाक प्रजाति के बंदरों की संख्या में वृद्धि होने तथा उनके द्वारा बड़े पैमाने पर फसलों, लोगों के जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुँचाए जाने के संबंध में केंद्र सरकार को सूचित किया था, इस सूचना के आधार पर ही यह घोषणा की गई है।
  • इससे पहले भी हिमाचल प्रदेश में (वर्ष 2007 में) सैकड़ों रीसस मकाक (Rhesus Macaque) को मार दिया गया, उसके बाद लगभग 96,000 मकाक का बंध्याकरण किया गया हालाँकि इसके बाद भी समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

जानवरों को हिंसक घोषित करने के प्रावधान

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 [Wildlife (Protection) Act]] के तहत इन प्रजातियों को I से V अनुसूचियों में वर्गीकृत किया जाता है।
    • अनुसूची I के अंतर्गत शामिल प्रजातियों को सबसे ज़्यादा संरक्षण प्रदान किया जाता है। इनका शिकार करने वालों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत कड़ी सजा दिये जाने का प्रावधान है।
    • अनुसूची II और III के अंतर्गत जंगली सूअर, नीलगाय एवं रीसस मकाक बंदर को शामिल किया गया है जो संरक्षित तो हैं लेकिन विशिष्ट परिस्थितियों में इनका शिकार किया जा सकता है।
    • अनुसूची V के तहत रहने वाली प्रजातियों को हिंसक की श्रेणी में शामिल किया गया है जिसके तहत कौआ और फ्रूट बैट आते हैं।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की धारा 11 (1) के अनुसार, किसी भी ऐसे जंगली जानवर जिसके द्वारा गंभीर समस्या उत्पन्न की जा रही हो तथा उस जानवर को शांत या स्थानांतरित नहीं किया जा सके, ऐसी स्थिति में अधिकृत अधिकारी उसके शिकार की अनुमति देने के लिये अधिकृत है।
  • अनुसूची II, III एवं IV में शामिल जंगली जानवरों से होने वाले मानव एवं संपत्ति के नुकसान को देखते हुए अधिकृत अधिकारी निर्दिष्ट क्षेत्र में जंगली जानवर के शिकार की अनुमति दे सकता है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की धारा 62 के अंतर्गत प्रावधान है कि केंद्र सरकार अनुसूची I, II के अतिरिक्त अन्य जंगली जानवरों को निर्दिष्ट क्षेत्र एवं अवधि के लिये हिंसक जानवर घोषित कर सकता है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष की परिभाषा

  • वन्यजीवों और मनुष्यों में इस तरह की घटनाओं की बढ़ती संख्या को जैव-विविधता से जोड़ते हुए विशेषज्ञ निरंतर चेतावनी देते हैं कि मानव के इस अतिक्रामक व्यवहार से पृथ्वी पर जैव असंतुलन बढ़ रहा है। विज्ञान तथा तकनीकी के विकास से वन्य जीवों की हिंसा से उत्पन्न होने वाले भय तथा नुकसान से मनुष्य निश्चित रूप से लगभग मुक्त हो चुका है।
  • वन्यजीव अपने प्राकृतिक पर्यावास की तरफ स्वयं रुख करते हैं, लेकिन एक जंगल से दूसरे जंगल तक पलायन के दौरान वन्यजीवों का आबादी क्षेत्रों में पहुँचना स्वाभाविक है। मानव एवं वन्यजीवों के बीच संघर्ष का यही मूल कारण है। मानव तथा वन्यजीवों के बीच होने वाले किसी भी तरह के संपर्क की वज़ह से मनुष्यों, वन्यजीवों, समाज, आर्थिक क्षेत्र, सांस्कृतिक जीवन, वन्यजीव संरक्षण या पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव मानव-वन्यजीव संघर्ष की श्रेणी में आता है।

मनुष्य-पशु संघर्ष के कारण

  • पर्यावास का विनाश: विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये मानव ने बड़े पैमाने पर ऐसे वनों/जंगलों को नष्ट कर दिया है, जहाँ पर ये जानवर निवास तथा अपने भोजन के लिये शिकार करते थे। अतः भोजन एवं आवास की तलाश में ये जानवर खेतों एवं मानव आवासों तक पहुँच रहे हैं।
  • बाघों एवं तेंदुओं जैसे परभक्षी जानवरों की जनसंख्या में गिरावट से नीलगाय, हिरन आदि शाकाहारी जीवों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
  • प्राकृतिक आपदाएँ जैसे- सूखा, बाढ़ आदि के कारण भी जंगली जानवर खेतों एवं मानवीय आवासों में प्रवेश कर जाते हैं।
  • वर्तमान समय में पर्यटकों द्वारा जानवरों को खाना खिलाने का प्रचलन बढ़ रहा है, इसके कारण भी जानवर पर्यटकों का पीछा करते हुए मानव आबादी में प्रवेश कर जाते हैं।

उपाय

  • जंगली जानवरों के आवासों को नष्ट होने से बचाया जाए ताकि वे अपने आवासों में ही रहें।
  • वन्यजीवों से होने वाली क्षति से सरकार द्वारा क्षतिपूर्ति प्रदान की जानी चाहिये।
  • बाड़ जैसे प्राकृतिक रूपों से खेतों की घेराबंदी की जानी चाहिये।

स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया

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