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भारतीय अर्थव्यवस्था

कर सुधार

  • 09 Jun 2020
  • 7 min read

प्रीलिम्स के लिये

सरकार द्वारा किये गए प्रमुख कर सुधार 

मेन्स के लिये

सरकार द्वारा किये गए कर सुधारों के प्रभाव

चर्चा में क्यों?

वित्त मंत्रालय के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018-19 में हुए शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह की तुलना में वित्त वर्ष 2019-20 में शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह में कमी हुई है, किंतु प्रत्यक्ष करों के संग्रह में हुई यह गिरावट संभावनाओं के अनुरूप ही है।

प्रमुख बिंदु

  • वित्त मंत्रालय के अनुसार, सरकार द्वारा लागू किये गए ऐतिहासिक कर सुधारों के साथ-साथ वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान काफी अधिक रिफंड जारी किये जाने के कारण यह गिरावट अस्थायी है।
  • उल्लेखनीय है कि वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान कुल 1.84 लाख करोड़ रुपए का रिफंड जारी किया गया था, जो कि वित्त वर्ष 2018-19 में किये गए 1.61 लाख करोड़ रुपए के रिफंड की तुलना में काफी अधिक है।

प्रमुख कर सुधार

  • निगम कर की दर में कमी 
    • विकास और निवेश को बढ़ावा देने के लिये सरकार ने कराधान कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2019 के माध्यम से एक ऐतिहासिक कर सुधार लागू किया है, जिसके तहत वित्त वर्ष 2019-20 से सभी मौजूदा घरेलू कंपनियों के लिये 22 प्रतिशत की रियायती कर व्यवस्था प्रदान की गई, बशर्ते कि वे किसी भी निर्दिष्ट छूट या प्रोत्साहन का लाभ न उठाएँ। 
    • इसके अलावा, इन कंपनियों को न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum Alternate Tax-MAT) के भुगतान से भी छूट दे दी गई है। 
  • नई विनिर्माण घरेलू कंपनियों हेतु प्रोत्साहन
    • विनिर्माण क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के लिये कराधान कानून (संशोधन) अध्यादेश 2019 के माध्यम से नई विनिर्माण घरेलू कंपनी के लिये कर की दर को घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है, बशर्ते कि इस तरह की कंपनी किसी भी निर्दिष्ट छूट या प्रोत्साहन का लाभ न उठाए। इन कंपनियों को भी न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) के भुगतान से छूट दी गई है।
  • न्यूनतम वैकल्पिक कर की दर में कटौती
    • सरकार ने कंपनियों को राहत प्रदान करने के लिये न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum Alternate Tax-MAT) की दर भी 18.5 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दी गई है।
  • आयकर में छूट 
    • 5 लाख रुपये तक की कर योग्य आय वाले व्यक्तियों को आयकर के भुगतान से पूरी तरह राहत प्रदान करने के लिए वित्त अधिनियम, 2019 के माध्यम से 100 प्रतिशत कर छूट प्रदान की गई है। 
    • इसके अलावा, वेतनभोगी करदाताओं को राहत देने के लिये वित्त अधिनियम, 2019 के माध्यम से मानक कटौती (Standard Deduction) को 40,000 रुपए से बढ़ाकर 50,000 रुपए कर दिया गया है।

उपरोक्त सुधारों का राजस्व प्रभाव निगम कर के लिये 1.45 लाख करोड़ रुपए और व्यक्तिगत आयकर के 23,200 करोड़ रुपए आंका गया है।

  • लाभांश वितरण कर (Dividend Distribution Tax-DDT) की समाप्ति 
    • सरकार ने भारतीय इक्विटी बाज़ार का आकर्षण बढ़ाने और निवेशकों के एक बड़े वर्ग को राहत देने के लिये वित्त अधिनियम, 2020 के माध्यम से लाभांश वितरण कर (DDT) को समाप्त कर दिया है, जिसके तहत कंपनियों को 01.04.2020 से डीडीटी का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है।
  • विवाद से विश्वास
    • वर्तमान समय में बड़ी संख्‍या में प्रत्यक्ष करों से संबंधित विवाद अधिनिर्णय के विभिन्न स्तरों पर में लंबित हैं। इन कर विवादों में सरकार के साथ-साथ करदाताओं के संसाधनों का भी एक बड़ा हिस्सा लग जाता है और इसके साथ ही ये विवाद सरकार को समय पर राजस्व संग्रह से वंचित कर देते हैं। 
    • इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए लंबित कर विवादों के त्वरित समाधान की नितांत आवश्यकता महसूस की गई, जो न केवल समय पर राजस्व सृजित करके सरकार को लाभांवित करेगा, बल्कि करदाताओं को भी लाभांवित करेगा। ‘प्रत्यक्ष कर विवाद से विश्वास अधिनियम, 2020’ को 17 मार्च, 2020 को कानून का रूप दिया गया जिसके तहत फि‍लहाल विवादों को निपटाने के लिये घोषणाएँ दाखिल की जा रही हैं।
  • डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना
    • अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण को सुगम बनाने और बेहिसाब लेन-देन को कम करने के लिये विभिन्न उपाय किये गए हैं, जिनमें डिजिटल टर्नओवर पर अनुमानित लाभ की दर में कमी करना, लेन- देन के निर्दिष्‍ट तरीकों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate-MDR) को हटाना, नकद लेन-देन के लिये प्रारंभिक सीमा को कम करना, कुछ विशेष नकदी लेन-देन पर रोक लगाना आदि शामिल हैं।
  • अपील दाखिल करने के लिए मौद्रिक सीमा बढ़ाना
    • करदाताओं की शिकायतों/मुकदमेबाजी में प्रभावकारी रूप से कमी लाने और मुख्यतः जटिल कानूनी मुद्दों एवं अधिक कर अदायगी वाले मुकदमों पर ही आयकर विभाग का ध्यान केंद्रित करने में मदद करने के लिये विभागीय अपील दाखिल करने हेतु आरंभिक मौद्रिक सीमा को आयकर अपील अधिकरण (Income Tax Appellate Tribunal) में अपील करने के लिये 20 लाख रुपए से बढ़ाकर 50 लाख रुपए, उच्च न्यायालय में अपील करने के लिये 50 लाख रुपए से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपए और सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 2 करोड़ रुपए कर दिया गया है।

स्रोत: पी.आई.बी.

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