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भारत में हरित निर्वाचन

  • 30 Mar 2024
  • 18 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारत का निर्वाचन आयोग (ECI), गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्री, हरित निर्वाचन, कार्बन फूटप्रिंट, एकल-उपयोग प्लास्टिक सामग्री, बायोडिग्रेडेबल सामग्री

मेन्स के लिये:

हरित निर्वाचन का महत्त्व और भारत के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के संबंध में इसकी उपयोगिता।

स्रोत: द हिंदू  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने चुनावों में गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्रियों के उपयोग से जुड़े पर्यावरणीय जोखिमों पर अपनी चिंता व्यक्त की।

  • यह वर्ष 1999 से पार्टियों और उम्मीदवारों से चुनाव अभियान के दौरान चुनाव सामग्री की तैयारी के लिये प्लास्टिक/पॉलिथीन के उपयोग से बचने का आग्रह करता रहा है।

हरित चुनाव की ओर बदलाव की आवश्यकता क्यों है?

  • पारंपरिक चुनावों के पर्यावरणीय फूटप्रिंट: पारंपरिक चुनाव प्रक्रियाओं के विभिन्न कारकों के कारण महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय परिणाम होते हैं:
    • अभियान उड़ानें: चुनाव के दौरान अभियान उड़ानों से होने वाला उत्सर्जन समग्र कार्बन फूटप्रिंट में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
      • उदाहरण के लिये: वर्ष 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में, केवल एक उम्मीदवार की अभियान उड़ानों से उत्सर्जन 500 अमेरिकियों के वार्षिक कार्बन फूटप्रिंट के बराबर था।
    • निर्वनीकरण और अन्य मुद्दे: मतपत्रों, अभियान साहित्य और प्रशासनिक दस्तावेज़ों के लिये कागज़-आधारित सामग्रियों पर निर्भरता से निर्वनीकरण तथा ऊर्जा-गहन उत्पादन प्रक्रियाएँ होती हैं।
    • ऊर्जा की बचत: लाउडस्पीकर, प्रकाश व्यवस्था और अन्य ऊर्जा खपत वाले उपकरणों के साथ बड़े पैमाने पर चुनावी रैलियाँ ऊर्जा की खपत एवं उत्सर्जन में योगदान करती हैं।
    • अपशिष्ट उत्पादन: अभियानों के दौरान उपयोग किये जाने वाले PVC फ्लेक्स बैनर, होर्डिंग्स और डिस्पोज़ेबल आइटम अपशिष्ट उत्पादन व पर्यावरणीय प्रभाव को बढ़ाते हैं।

कार्बन फुटप्रिंट क्या है?

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कार्बन फुटप्रिंट जीवाश्म ईंधन जलाने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन पर मानव गतिविधियों के प्रभाव का आकलन करता है, जिसे आमतौर पर मीट्रिक टन CO2 उत्सर्जन में मापा जाता है।
  • इसका आकलन वार्षिक CO2 उत्सर्जन के संदर्भ में किया जाता है, एक मीट्रिक जिसमें अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसें जैसे मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और अन्य CO2-समतुल्य गैसें शामिल हो सकती हैं।
  • यह एक व्यापक उपाय हो सकता है या किसी व्यक्ति, परिवार, घटना, संगठन या यहाँ तक कि पूरे देश के कार्यों पर लागू किया जा सकता है।

हरित निर्वाचन की अवधारणा क्या है?

  • हरित निर्वाचन: हरित निर्वाचन ऐसी प्रथाएँ है जिसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रियाओं के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना है। इनमें पुनर्चक्रित सामग्रियों का उपयोग करना, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को बढ़ावा देना और उम्मीदवारों को स्थायी अभियान प्रथाओं को अपनाने के लिये प्रोत्साहित करना जैसे उपाय शामिल हैं।
  • हरित चुनाव का उद्देश्य निम्नलिखित के माध्यम से चुनावी प्रक्रियाओं के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना है:
    • पर्यावरण-मित्र अभियान सामग्री: उम्मीदवार और पार्टियाँ पुनर्नवीनीकरण कागज, बायोडिग्रेडेबल बैनर तथा पुन: प्रयोज्य सामग्री जैसे टिकाऊ विकल्प अपना सकते हैं।
    • ऊर्जा की खपत कम करना: रैलियों के दौरान ऊर्जा-कुशल प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि प्रणाली और परिवहन का विकल्प चुनने से कार्बन पदचिह्न को कम करने में मदद मिल सकती है।
    • डिजिटल अभियान को बढ़ावा देना: प्रचार के लिये डिजिटल प्लेटफॉर्म (वेबसाइट, सोशल मीडिया और ईमेल) का लाभ उठाने से कागज़ का उपयोग और ऊर्जा की खपत कम हो जाती है।

पर्यावरण मित्र (Eco friendly) चुनावी पहल के उदाहरण क्या हैं?

  • भारत के संदर्भ में उदाहरण:
    • केरल का हरित अभियान: 
      • वर्ष 2019 के आम चुनाव के दौरान, केरल राज्य चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों से अपने अभियानों के दौरान एकल उपयोग वाली प्लास्टिक सामग्री से बचने का आग्रह करके एक सक्रिय कदम उठाया।
        • एकल-उपयोग प्लास्टिक एक डिस्पोजेबल सामग्री है जिसे फेंकने या पुनर्नवीनीकरण करने से पहले केवल एक बार उपयोग किया जा सकता है, जैसे प्लास्टिक बैग, पानी की बोतलें, सोडा की बोतलें, स्ट्रॉ, प्लास्टिक प्लेटें, कप, अधिकांश खाद्य पैकेजिंग और कॉफी स्टिरर एकल उपयोग वाली प्लास्टिक सामग्री के स्रोत हैं।
      • इसके बाद, केरल उच्च न्यायालय ने चुनाव प्रचार में फ्लेक्स और गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्रियों पर प्रतिबंध लगा दिया। 
      • एक विकल्प के रूप में, दीवार भित्तिचित्र और कागज़ के पोस्टर उभरे, जो अधिक टिकाऊ दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं। इसके अतिरिक्त, सरकारी निकायों ने पर्यावरण-मित्र प्रथाओं पर बल देते हुए हरित निर्वाचन सुनिश्चित करने के लिये तिरुवनंतपुरम में ज़िला प्रशासन के साथ सहयोग किया। जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण के प्रति जागरूक व्यवहार को बढ़ावा देने के लिये चुनाव कार्यकर्त्ताओं के लिये गाँवों में प्रशिक्षण सत्र भी आयोजित किये गए।
    • गोवा के कारीगरों द्वारा तैयार किये गए पर्यावरण-मित्र बूथ
      • वर्ष 2022 में, गोवा राज्य जैवविविधता बोर्ड ने विधानसभा चुनावों के लिये पर्यावरण-मित्र चुनाव बूथ शुरू करके एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया।
      • इन बूथों का निर्माण सत्तारी और पोंडा के स्थानीय पारंपरिक कारीगरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार की गई बायोडिग्रेडेबल सामग्रियों का उपयोग करके किया गया था।
        •  ये सामग्रियाँ न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि ये स्थानीय कारीगरों की भी मदद करती हैं।
    • श्रीलंका का कार्बन-सेंसिटिव अभियान
      • वर्ष 2019 में श्रीलंका की पोदुजना पेरामुना (SLPP) पार्टी ने विश्व का पहला कार्बन-सेंसिटिव पर्यावरण अनुकूल चुनाव अभियान शुरू किया।
      • उन्होंने वाहनों और बिजली के उपयोग सहित अभियान गतिविधियों से कार्बन उत्सर्जन को सावधानीपूर्वक मापा।
      • इन उत्सर्जनों की भरपाई करने के लिये उन्होंने प्रत्येक ज़िले में वृक्षारोपण पहल में जनता को शामिल किया।
      • इस अभिनव दृष्टिकोण ने न केवल अभियान के कार्बन पदचिह्न को कम किया बल्कि वन आवरण के महत्त्व के बारे में जागरूकता भी बढ़ाई।
  • सीमापारीय उदाहरण:
    • एस्टोनिया की डिजिटल वोटिंग क्रांति
      • एस्टोनिया ने पारंपरिक कागज़-आधारित विधि के विकल्प के रूप में डिजिटल वोटिंग का प्रयोग किया।
      • इस दृष्टिकोण ने पर्यावरणीय प्रभाव को महत्त्वपूर्ण रूप से कम करते हुए मतदाता भागीदारी को प्रोत्साहित किया।
      • निर्वाचन के दौरान सुदृढ़ सुरक्षा उपायों को कार्यान्वित करके, एस्टोनिया ने प्रदर्शित किया कि डिजिटल वोटिंग पर्यावरण-अनुकूल और मतदाता-अनुकूल दोनों हो सकती है। इस दृष्टिकोण की सफलता से पता चलता है कि अन्य लोकतंत्र देश भी इसका अनुसरण कर सकते हैं।
  • ये उदाहरण दर्शाते हैं कि निर्वाचन प्रक्रियाओं में पर्यावरणीय उद्देश्यों को प्राथमिकता देना अन्य देशों के लिये एक उदाहरण स्थापित कर सकता है और अधिक संधारणीय भविष्य में योगदान दे सकता है।

हरित निर्वाचन के अंगीकरण से संबंधित क्या चुनौतियाँ हैं?

  • नई प्रौद्योगिकियों तक पहुँच और अधिकारियों के लिये प्रशिक्षण: सभी मतदाताओं की नई प्रौद्योगिकियों तक उचित पहुँच सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि इसके लिये निर्वाचन अधिकारियों को प्रशिक्षण देने और मतदाताओं को नई प्रणालियों के संबंध में शिक्षित करने के संदर्भ में पर्याप्त प्रयासों की आवश्यकता है। इससे संबंधित कुछ विशिष्ट चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:
    • प्रशिक्षण और अभ्यास: निर्वाचन अधिकारियों को नई तकनीक के संचालन और समस्या निवारण के संबंध में कुशल होने की आवश्यकता है। संबंद्ध जानकारी के अंतराल को पाटने के लिये पर्याप्त प्रशिक्षण कार्यक्रम आवश्यक हैं।
    • न्यायसंगत पहुँच: दूरवर्ती अथवा वंचित क्षेत्रों के मतदाताओं सहित सभी मतदाताओं तक प्रौद्योगिकी की पहुँच और उपयोग सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता में असमानताओं को दूर करना महत्त्वपूर्ण है।
  • वित्तीय बाधाएँ और अग्रिम लागत: पर्यावरण-अनुकूल सामग्री और उन्नत प्रौद्योगिकी को नियोजित करने में अमूमन महत्त्वपूर्ण अग्रिम लागत आती है। सरकारों, विशेषकर सीमित बजट वाली सरकारों को वित्तीय बाधाओं के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
    • बजट आवंटन: अन्य आवश्यक सेवाओं को संतुलित करते हुए प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिये धन आवंटित करना एक संवेदनशील कार्य है। बजट सीमाओं के भीतर आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
    • दीर्घकालिक बचत: हालाँकि प्रारंभिक लागत अधिक हो सकती है, दीर्घकालिक लाभों (जैसे- कागज़ का कम उपयोग और सुव्यवस्थित प्रक्रिया) पर ज़ोर देने से निवेश को उचित रूप देने में मदद मिल सकती है।
  • सांस्कृतिक जड़ता और मतदाता व्यवहार: परंपरागत रूप से, मतदान को मतदान केंद्रों पर भौतिक उपस्थिति से जोड़ा गया है। सफल आधुनिकीकरण के लिये सांस्कृतिक जड़ता पर काबू पाना और मतदाता व्यवहार में बदलाव आवश्यक है।
    • शारीरिक मतदान का अनुमानित महत्त्व: कई मतदाता शारीरिक रूप से मतदान करने जाने को एक पवित्र नागरिक कर्त्तव्य के रूप में देखते हैं। उन्हें यह समझाना कि डिजिटल विकल्प भी समान रूप से मान्य हैं, चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
    • नई प्रणालियों में विश्वास: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रणालियों में विश्वास को हासिल करना महत्त्वपूर्ण है। सुरक्षा, गोपनीयता और संभावित हेरफेर के बारे में जनता के संदेह को पारदर्शिता तथा मज़बूत सुरक्षा उपायों के माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिये।
  • सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और समझौते: ऑनलाइन वोटिंग या ब्लॉकचेन-आधारित सिस्टम जैसे नए दृष्टिकोण पेश करने से मत सुरक्षा के बारे में चिंताएँ बढ़ सकती हैं:
    • साइबर सुरक्षा ज़ोखिम: यह सुनिश्चित करना कि मतदान प्रणालियाँ साइबर खतरों से सुरक्षित हैं, सर्वोपरि है। कोई भी समझौता जनता के विश्वास और चुनाव की अखंडता को कमज़ोर कर सकता है।
    • सुरक्षा और पहुँच को संतुलित करना: मज़बूत सुरक्षा उपायों और उपयोगकर्त्ता के अनुकूल इंटरफेस के बीच सही संतुलन बनाना एक चुनौती है। कठोर सुरक्षा प्रोटोकॉल के उपयोग में आसानी में बाधा नहीं आनी चाहिये।

आगे की राह

  • इस हरित परिवर्तन में राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग, सरकार, मतदाताओं, मीडिया और नागरिक समाज जैसे सभी हितधारकों को शामिल किया जाना चाहिये।
  • हरित परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिये शीर्ष स्तर के निर्देशों को ज़मीनी स्तर की पहल के साथ एकीकृत करना अनिवार्य है।
  • राजनीतिक दलों को इसका नेतृत्व करना चाहिये। यह यात्रा पर्यावरण-अनुकूल निर्वाचन प्रथाओं को अनिवार्य करने वाला कानून बनाकर शुरू हो सकती है, जिसमें निर्वाचन आयोग उन्हें आदर्श आचार संहिता में शामिल करेगा।
  • इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म या घर-घर जाकर प्रचार करना (ऊर्जा-गहन सार्वजनिक रैलियों को कम करना) और निर्वाचन कार्य के लिये सार्वजनिक परिवहन के उपयोग को प्रोत्साहित करना शामिल है।
  • मतदान केंद्रों के लिये प्लास्टिक और कागज़-आधारित सामग्रियों के प्रतिस्थापन को प्राकृतिक वस्त्र, पुनर्नवीनीकृत कागज़ और कम्पोस्टेबल प्लास्टिक जैसे टिकाऊ स्थानीय विकल्पों के साथ प्रोत्साहित करने से अपशिष्ट प्रबंधन में सहायता मिलेगी तथा स्थानीय कारीगरों को समर्थन मिलेगा।
  • निर्वाचन आयोग डिजिटल वोटिंग पर ज़ोर दे सकता है, भले ही इसके लिये अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता हो।
  • डिजिटल चुनावी प्रक्रिया में सभी मतदाताओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये सरकार को मतदाताओं को शिक्षित और समर्थन करना चाहिये तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी तक समान पहुँच सुनिश्चित करनी चाहिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. भारत के संविधान के अनुसा, कोई भी ऐसा व्यक्ति जो मतदान के लिये योग्य है, किसी राज्य में छह माह  हेतु मंत्री बनाया जा सकता है, तब भी जब कि वह उस राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है।
  2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, कोई भी ऐसा व्यक्ति जो दांडिक अपराध के अंतर्गत दोषी पाया गया है और जिसे पाँच वर्ष के लिये कारावास का दंड दिया गया है, चुनाव लड़ने हेतु स्थायी तौर पर निरर्हत हो जाता है भले ही वह कारावास से मुक्त हो चुका हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (d)


प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच-सदस्यीय निकाय है।
  2. संघ का गृह मंत्रालय, आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिये चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
  3. निर्वाचन आयोग मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवाद निपटाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 3

उत्तर: (d)


मेन्स:

प्रश्न.1 'लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक ही साथ चुनाव, चुनाव-प्रचार की अवधि और व्यय को तो सीमित कर देंगे, परंतु ऐसा करने से लोगों के प्रति सरकार की जवाबदेही कम हो जाएगी।' चर्चा कीजिये। (2017)

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