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दया याचिका पर निर्णय में देरी

  • 23 Jan 2021
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सॉलिसिटर जनरल ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि वर्ष 1991 के राजीव गांधी हत्याकांड मामले में दोषी की दया याचिका पर तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा अगले तीन-चार दिनों में निर्णय लिया जाएगा।

  • दया याचिका की अवधारणा का अनुसरण भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा जैसे कई देशों में किया जाता है।
  • भारत में क्षमा प्रदान करने की शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद-72 और अनुच्छेद-161 के तहत क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों को सौंपी गई है। यह देश की न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत क्षमा करने या मृत्यु की सज़ा प्राप्त अपराधियों के प्रति दया दिखाने के लिये शक्तियों का हवाला देकर एक मानवीय पक्ष जोड़ता है। 
    • क्षमा प्रदान करने या अपराधियों के प्रति दया दिखाने संबंधी शक्तियाँ भारत की न्यायिक प्रक्रिया में एक मानवीय पक्ष को शामिल करती हैं।

प्रमुख बिंदु

पृष्ठभूमि

  • सर्वप्रथम वर्ष 2015 में  दोषी द्वारा दिये गए एक माफीनामे पर राज्य के राज्यपाल द्वारा विचार नहीं किया गया था, हालाँकि सितंबर 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित याचिका पर निर्णय देते हुए कहा कि क्षमादान पर निर्णय लेने हेतु राज्यपाल पूर्णतः उपयुक्त है।
  • इसके पश्चात् राज्य मंत्रिमंडल द्वारा अनुच्छेद 161 का हवाला देकर आरोपी की उम्रकैद की सज़ा को रद्द करने की सिफारिश की गई थी।
  • हालाँकि राज्यपाल का निर्णय अभी भी लंबित है।

केंद्र सरकार का पक्ष

  • केंद्र सरकार का पक्ष है कि दया याचिका को राज्यपाल के बजाय राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिये, क्योंकि इस मामले की सुनवाई एक केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जा रही है।

याचिकाकर्त्ता का पक्ष

  • अपराधी क्षमादान के लिये राष्ट्रपति या राज्यपाल का चयन करने हेतु स्वतंत्र है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने भारत संघ बनाम श्रीहरन वाद (वर्ष 2015) में संवैधानिक पीठ के निर्णय को संदर्भित किया, जिसमें कहा गया था कि ‘कार्यकारी क्षमादान की शक्ति’ ‘राष्ट्रपति एवं राज्यपाल में निहित है।’
  • दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432 के तहत दोषियों की सज़ा को रद्द करने के तमिलनाडु सरकार के प्रस्ताव पर वर्ष 2018 में केंद्र की अस्वीकृति, अनुच्छेद 161 के तहत क्षमा के लिये राज्यपाल को अलग से याचिका देने हेतु बाधा नहीं है।
    • CrPC की धारा 432: इसके मुताबिक, उपयुक्त सरकार किसी भी समय, बिना किसी शर्त के या किसी विशिष्ट शर्त के आधार पर किसी भी व्यक्ति की सज़ा को रद्द कर सकती है अथवा सज़ा के किसी भी हिस्से को समाप्त कर सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन 

  • सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा की गई देरी को ‘असाधारण’ करार दिया है। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार की सिफारिश के बावजूद राज्यपाल द्वारा कोई निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा है। 
    • ज्ञात हो कि राज्यपाल, राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश को अस्वीकार नहीं कर सकता है, हालाँकि निर्णय देने को लेकर कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
    • राज्यपाल ने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिये पहले ही राज्य सरकार को फाइल लौटा दी गई थी, लेकिन सरकार अब भी अपने निर्णय पर बरकरार है।

क्षमादान की शक्ति:

राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति:

  • संबंधित प्रावधान:
    • संविधान के अनुच्छेद-72 के तहत राष्ट्रपति को उन व्यक्तियों को क्षमा करने की शक्ति प्राप्त है, जो निम्नलिखित मामलों में किसी अपराध के लिये दोषी करार दिये गए हों।
      • संघीय विधि के विरुद्ध किसी अपराध के संदर्भ में दिये गए दंड में,
      • सैन्य न्यायालय द्वारा दिये गए दंड में,
      • यदि मृत्युदंड की सज़ा दी गई हो।
  • सीमाएँ:
    • राष्ट्रपति क्षमादान की अपनी शक्ति का प्रयोग केंद्रीय मंत्रिमंडल के परामर्श के बिना नहीं कर सकता।
    • सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कई मामलों में निर्णय दिया है कि राष्ट्रपति को दया याचिका का फैसला करते हुए मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्रवाई करनी है। इनमें वर्ष 1980 में मारू राम बनाम भारत संघ और वर्ष 1994 में धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य वाद शामिल हैं।
  • प्रक्रिया:
    • राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका को मंत्रिमंडल की सलाह लेने के लिये गृह मंत्रालय के पास भेजा जाता है।
    • मंत्रालय याचिका को संबंधित राज्य सरकार को भेजता है, जिसका उत्तर मिलने के बाद मंत्रिपरिषद अपनी सलाह देती है।
  • पुनर्विचार:
    • यद्यपि राष्ट्रपति के लिये मंत्रिमंडल की सलाह बाध्यकारी होती है, किंतु अनुच्छेद 74 (1) उसे मंत्रिमंडल के पुनर्विचार हेतु याचिका को वापस करने का अधिकार देता है। यदि मंत्रिमंडल बिना किसी भी बदलाव के इसे राष्ट्रपति को भेजता है तो राष्ट्रपति के पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्य के राज्यपाल को भी क्षमादान की शक्तियाँ प्राप्त हैं। 

राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान की शक्तियों के मध्य अंतर:

  • अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति का दायरा अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से अधिक है, जो निम्नलिखित दो तरीकों से भिन्न है:
    • सैन्य मामले: राष्ट्रपति सैन्य न्यायालय द्वारा दी गई सज़ा को क्षमा कर सकता है परंतु राज्यपाल नहीं।
    • मृत्युदंड: राष्ट्रपति मृत्युदंड से संबंधित सभी मामलों में क्षमादान दे सकता है, परंतु राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति मृत्युदंड के मामलों तक विस्तारित नहीं है।

शब्दावली:

  • क्षमा (Pardon)- इसमें दंड और बंदीकरण दोनों को हटा दिया जाता है तथा दोषी को दंड, दंडादेशों एवं निर्हर्ताओं से पूर्णतः मुक्त कर दिया जाता है। 
  • लघुकरण (Commutation)- इसका अर्थ है सज़ा की प्रकृति को बदलना जैसे-मृत्युदंड को कठोर कारावास में बदलना।
  • परिहार (Remission) - सज़ा की अवधि में बदलाव जैसे- 2 वर्ष के कठोर कारावास को 1 वर्ष के कठोर कारावास में बदलना।
  • विराम (Respite) - विशेष परिस्थितियों की वजह से सज़ा को कम करना। जैसे- शारीरिक अपंगता या महिलाओं की गर्भावस्था के कारण।
  • प्रविलंबन (Reprieve) - किसी दंड को कुछ समय के लिये टालने की प्रक्रिया। जैसे- फाँसी को कुछ समय के लिये टालना।

स्रोत : द हिंदू

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