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बाल विवाह को रद्द करने का मामला कैबिनेट के समक्ष पेश किया जाएगा

  • 20 Jul 2018
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

भारत में बाल विवाह समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाते हुए  महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (WCD) बाल विवाह को रद्द करने संबंधी कानून में संशोधन के प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष पेश करने को तैयार है। वर्तमान में, भारत में 21 साल से कम उम्र के व्यक्ति और 18 साल से कम उम्र की महिला के बीच विवाह को केवल अनुबंधित पक्षों (Contracting Parties) के निवेदन पर शून्यकरणीय (Voidable) घोषित किया जा सकता है।

प्रमुख बिंदु 

  • बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006,  बाल विवाह को न सिर्फ  अमान्य करता है बल्कि अभिभावक के माध्यम से इसे रद्द करने का विकल्प देता है।
  • मंत्रालय द्वारा कैबिनेट को एक मसौदा भेजा गया है जिसमें बाल विवाह को प्रारंभ से ही शून्य (void) बनाने का प्रस्ताव है|
  • मसौदे में PCMA की धारा 3 में संशोधन का प्रस्ताव दिया गया है, जिसके तहत वर्तमान में बाल विवाह अनुबंध केवल पक्षों के विकल्प पर ही शून्यकरणीय (voidable) है|
  • यदि कैबिनेट की मंज़ूरी मिलती है, तो कानून में एक असंगति को दूर किया जा सकेगा जिसके संबंध में अक्टूबर 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद बाल विवाह जारी है| अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 18 साल से कम उम्र की नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बलात्कार माना जाएगा चाहे उसकी सहमति ली गई हो अथवा नहीं|

देश में बाल विवाह की स्थिति 

  • 2014 में यूनिसेफ की रिपोर्ट, महिलाओं के बीच बाल विवाह की उच्च दर के संबंध में भारत को शीर्ष 10 देशों में छठे स्थान पर रखती है। रिपोर्ट के मुताबिक अत्यंत गरीब समुदायों (20 प्रतिशत) में बालिकाओं की शादी की  औसत आयु 15.4 वर्ष थी, जबकि अमीर समुदायों में यह 19.7 वर्ष पाई गई थी।
  • 2011 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में 12 मिलियन बाल विवाह दर्ज किये गए हैं जिनमें 21 साल से कम उम्र के 7 मिलियन लड़के और 18 साल से कम उम्र की 5 मिलियन लड़कियाँ हैं|

प्रस्तावित संशोधन और बाल विवाह से संबंधित मुद्दे 

  • PCMA में प्रस्तावित संशोधन भारत में बाल विवाह को समाप्त करने और प्रारंभिक गर्भधारण, यौन हिंसा, और शिक्षा के अधिकार तथा शारीरिक स्वायत्तता से इनकार करने जैसे मुद्दों पर एक लंबा सफर तय करेगा। हालाँकि, यह अभी भी निजी कानूनों के तहत अनुबंधित विवाह के मुद्दे को अनसुलझा छोड़ देता है, जब तक कि ऐसे कानूनों में भी संशोधन नहीं किया जाता है।
  • मिसाल के तौर पर  हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, (हिंदुओं, बौद्धों, सिखों, जैनों के लिये) और मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939  अभी भी बाल विवाह को शून्य (void) नहीं मानते हैं।
  • दोनों कानून केवल तभी एक लड़की की शादी के विघटन की इज़ाज़त देते हैं, जब उसकी शादी 15 साल की उम्र से पहले की गई हो  और वह 18 वर्ष की आयु के बाद शादी को तोड़ने (विघटन) के लिये आवेदन करे।
  • मुस्लिम व्यक्तिगत कानून उन लड़कियों को विवाह तोड़ने की अनुमति देता है जिन्होंने विवाह करने के लिये 15 साल की आयु प्राप्त कर ली हो|
  • भारतीय क्रिश्चियन विवाह अधिनियम और हिंदू विवाह अधिनियम दोनों ही बाल विवाह को जारी रखने की अनुमति देने के मामले में पर्याप्त रूप से उदार हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, बाल विवाह के मामले में भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है। देश में प्रतिदिन 39,000 नाबालिग लड़कियों की शादी होती है। यहाँ तक कि सर्वाधिक साक्षरता वाले राज्य केरल और हिमाचल प्रदेश भी इस बुराई से मुक्त नहीं हैं।
  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -4 (2015-16) के मुताबिक, भारत में  20 से 24 साल के बीच 26 प्रतिशत महिलाओं का नाबालिग अवस्था में विवाह हुआ।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आँकड़ों से पता चलता है कि 2016 में  पूरे देश में PCMA के तहत मात्र 326 मामले दर्ज किये गए थे।

निष्कर्ष 

  • बेशक मुगल और ब्रिटिश राजशाही के दौर में लड़कियों को बलात्कार एवं अन्य प्रकार के उत्पीडऩ से बचाने के लिये बाल विवाह को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता था परंतु आज हालात बदल चुके हैं और बाल विवाह के दुष्परिणामों को देखते हुए इसे रोकने की आवश्यकता है।
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