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COVID- 19 के लिये प्रयोगात्मक थेरपी

  • 30 Mar 2020
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये:

कान्वलेसंट प्लाज़्मा थेरेपी 

मेन्स के लिये:

COVID- 19 महामारी 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ( US Food and Drug Administration- USFDA) ने  COVID- 19 के गंभीर रूप से बीमार रोगियों के इलाज के लिये रक्त प्लाज़्मा का उपयोग करने को मंज़ूरी प्रदान की है।

मुख्य बिंदु: 

  • प्लाज़्मा स्थानांतरण की इस प्रणाली को कान्वलेसंट प्लाज़्मा थेरेपी (Convalescent Plasma Therapy- CPT) कहा जाता है। इसमें ऐसे रोगी जो COVID- 19 महामारी से ठीक हो चुके हैं, उनमें विकसित एंटीबॉडी का उपयोग किया जाता है। ऐसे ठीक हुए लोगों का पूरा रक्त या प्लाज़्मा लिया जाता है तथा इस प्लाज़्मा को गंभीर रूप से बीमार रोगियों में इंजेक्ट किया जाता है ताकि एंटीबॉडी को स्थानांतरित किया जा सके और वायरस के खिलाफ रोगियों के शरीर को लड़ने में मदद मिल सके।
  • द लांसेट इंफेक्शियस डिज़ीज़ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, COVID-19 के मरीज़ सामान्यत: 10-14 दिनों में वायरस के खिलाफ प्राथमिक प्रतिरक्षा विकसित कर लेते हैं, इसलिये यदि प्रारंभिक अवस्था में प्लाज़्मा को इंजेक्ट किया जाता है, तो यह संभवतः वायरस से लड़ने तथा गंभीर बीमारी को रोकने में मदद कर सकता है।
  • एक अध्ययन के अनुसार, इस प्रकार के प्लाज़्मा के उपयोग से H1N1रोगियों में श्वसन तंत्र संबंधी विकार दूर करने तथा मृत्यु-दर कम करने में मदद मिली।  

CPT के प्रयोग का अनुभव:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका ने स्पेनिश फ्लू (1918-1920 के दौरान) के रोगियों पर प्लाज़्मा इस्तेमाल किया था, इसी प्रकार वर्ष 2005 में हांगकांग ने सार्स रोगियों के इलाज के लिये तथा वर्ष 2009 में H1N1 रोगियों के इलाज में प्लाज़्मा का प्रयोग किया था। वर्ष 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों पर इबोला तथा वर्ष 2015 में कांगो द्वारा MERS (Middle East Respiratory Syndrome) के रोगियों पर इसका प्रयोग किया जा चुका है।

CPT प्रक्रिया:

  • प्लाज़्मा को एकत्रित करने की प्रक्रिया को बहुत कम समय में पूरा कर लिया जाता है, इसके लिये केवल मानक रक्त संग्रह प्रथाओं तथा प्लाज़्मा संग्रहण प्रक्रिया की आवश्यकता होती है।
  • यदि संपूर्ण रक्त (350-450 मिलीलीटर) डोनेट किया जाता है, तो प्लाज़्मा को अलग करने के लिये रक्त विभाजन प्रक्रिया (Blood Fractionation Process) का उपयोग किया जाता है, अन्यथा दाता से सीधे प्लाज़्मा निकालने के लिये एक विशेष मशीन जिसे एपैरेसिस मशीन (Aphaeresis Machine) कहा जाता है, का उपयोग किया जा सकता है। जब दाता से रक्त एफ़ैरेसिस मशीन द्वारा निकाल जाता है तो प्लाज़्मा किट का उपयोग करके यह मशीन प्लाज़्मा को अलग करके बाहर निकालती है तथा शेष रक्त घटकों को दाता के शरीर में वापस कर देती है।

WHO के दिशा-निर्देश:

  • WHO के वर्ष 2014 के दिशा-निर्देशों के अनुसार, शरीर से प्लाज़्मा निकालने से पूर्व दाता की अनुमति आवश्यक है एवं ठीक हो चुके मरीज़ों से ही प्लाज़्मा लिया जा सकता है।  
  • एचआईवी, हेपेटाइटिस, सिफलिस या किसी संक्रामक बीमारी से संक्रमित लोगों के  प्लाज़्मा का उपयोग नहीं लिया जाना चाहिये। 
  • यदि रोगी के पूरे रक्त को एकत्र किया जाता है, तो प्लाज़्मा को अवसादन (Sedimentation) या सेंट्रीफ्यूजेशन (Centrifugation) विधि द्वारा अलग करके रोगी में इंजेक्ट किया जाता है। 
  • यदि प्लाज़्मा को उसी व्यक्ति से फिर से इकट्ठा करने की आवश्यकता होती है, जिससे पहले भी प्लाज़्मा एकत्रित  किया जा चुका हो तो पुरुषों के लिये पहले दान के 12 सप्ताह एवं महिलाओं से 16 सप्ताह के बाद प्लाज़्मा एकत्रित किया जाना चाहिये।

CPT की उपयोगिता:

  • COVID-19 के लिये अभी कोई विशिष्ट उपचार नहीं उपलब्ध नहीं है, केवल सहायक देखभाल- जिसमें एंटीवायरल ड्रग्स, सामान्य मामलों में ऑक्सीजन की आपूर्ति एवं एक्स्ट्राकोर्पोरियल झिल्ली ऑक्सीकरण (Extracorporeal Membrane Oxygenation) जैसी कुछ प्रणालियाँ शामिल हैं। 
  • प्लाज़्मा को दो प्रकार के COVID- 19 रोगियों में प्रयोग किया जा सकता है- जिन लोगों को गंभीर बीमारी हो या जिन लोगों को वायरस से संक्रमित होने का अधिक खतरा होता है।
  • ठीक हो चुके मरीज़ों के प्लाज़्मा के साथ न केवल एंटीबॉडी अपितु संक्रमण का भी खतरा हो सकता है, हालांकि इस बारे में पर्याप्त जानकारी का अभाव है। 

भारत में उपयोगिता:

  • भारत में फेरेसिस (Aphaeresis) का उपयोग करके दाता से 500 मिलीलीटर प्लाज़्मा निकालने की सुविधा उपलब्ध है। 
  • इसे प्रायोगिक रूप में शुरू करने के लिये COVID-19 के रोगियों से प्लाज़्मा निकालने के लिये ब्लड बैंकों को ‘ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया’  (Drug Controller General of India- DCGI) की मंज़ूरी की आवश्यकता होगी।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार यह उपचार विधि 40-60 वर्ष की आयु के रोगियों के लिये प्रभावी हो सकती है, लेकिन 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में यह अधिक प्रभावशाली नहीं रहेगी।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में दाता के अनुमोदन संबंधी प्रक्रिया बहुत लंबी है, अत: भारत में इस तकनीक के प्रयोग में प्रक्रिया एक बहुत बड़ी बाधक है।  

आगे की राह:

ऐसे समय में जब नोवल कोरोनोवायरस रोग के लिये कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है तथा अभी वैक्सीन निर्माण में कम-से-कम एक वर्ष और लगने की उम्मीद है ऐसे में CPT विधि एक सहायक विधि के रूप में कारगर साबित हो सकती है। 

स्रोत: द हिंदू

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