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आवश्यक रक्षा सेवा विधेयक, 2021

  • 23 Jul 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये 

आवश्यक रक्षा सेवा विधेयक, 2021, सार्वजनिक उपयोगिता सेवाएँ, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947

मेन्स के लिये

आवश्यक रक्षा सेवाओं का संक्षिप्त विवरण एवं हड़ताल का अधिकार 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सरकार ने लोकसभा में आवश्यक रक्षा सेवा विधेयक, 2021 (Essential Defence Services Bill, 2021) पेश किया।

  • यह जून 2021 में जारी किये गए अध्यादेश को प्रतिस्थापित करने का प्रयास करता है और आवश्यक रक्षा सेवाओं में शामिल कर्मियों के हड़ताल करने एवं किसी भी तरह के विरोध-प्रदर्शन पर रोक लगाता है।

प्रमुख बिंदु

आवश्यक रक्षा सेवाएँ: 

  • इसमें किसी भी प्रतिष्ठान या उपक्रम में वे सेवाएँ शामिल हैं जो किसी भी रक्षा संबंधी उद्देश्यों या सशस्त्र बलों की  स्थापना या उनकी रक्षा से जुड़ी हैं तथा आवश्यक वस्तुओं या उपकरणों के उत्पादन से संबंधित हैं। 
    • इसमें ऐसी सेवाएँ भी शामिल हैं जो बंद (Ceased) होने पर ऐसी सेवाओं से जुड़े प्रतिष्ठान या उसके कर्मचारियों की सुरक्षा को प्रभावित करती हैं। 
  • इसके अतिरिक्त सरकार किसी भी सेवा को एक आवश्यक रक्षा सेवा के रूप में घोषित कर सकती है, यदि इसकी समाप्ति निम्नलिखित को प्रभावित करती है:
    • रक्षा उपकरण या वस्तुओं का उत्पादन।
    • ऐसे उत्पादन में जुड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों या इकाइयों का संचालन या रखरखाव।
    • रक्षा से जुड़े उत्पादों की मरम्मत या रखरखाव।

 हड़ताल की परिभाषा :

  • इसे एक साथ कार्यरत व्यक्तियों के एक निकाय द्वारा कार्य की समाप्ति के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें शामिल हैं: 
    • सामूहिक आकस्मिक अवकाश।
    • किसी भी संख्या में व्यक्तियों को कार्यरत रखना या रोज़गार स्वीकार करने से समन्वित इनकार।
    • जहाँ आवश्यक रक्षा सेवाओं के रख-रखाव हेतु ऐसा कार्य ज़रूरी हो, वहाँ ओवरटाइम कार्य प्रणाली से इनकार करना।
    • कोई अन्य आचरण जिसके परिणामस्वरूप आवश्यक रक्षा सेवाओं के कार्य में व्यवधान उत्पन्न होता है या होने की संभावना है।
  • हड़ताल, तालाबंदी और छँटनी पर रोक: 
    • सरकार आवश्यक रक्षा सेवाओं में लगी इकाइयों में हड़ताल, तालाबंदी और छँटनी पर रोक लगा सकती है।
    • साथ ही भारत की संप्रभुता और अखंडता, किसी भी राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता आदि के हित में यदि आवश्यक हो तो ऐसा आदेश जारी कर सकता है।

दंड:

  • अवैध तालाबंदी और छँटनी:
    • अवैध तालाबंदी या छँटनी करने वाले नियोक्ताओं को एक वर्ष तक की कैद या 10,000 रुपए जुर्माना या दोनों सज़ा एक साथ दी जा सकती है।
  • हड़ताल:
    • अवैध हड़ताल शुरू करने वाले या उसमें भाग लेने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक की कैद या 10,000 रुपए का जुर्माना या फिर दोनों सज़ा एक साथ दी जा सकती है।
    • अवैध हड़ताल जारी रखने के लिये उकसाने या जान-बूझकर ऐसे उद्देश्यों के लिये पैसे की आपूर्ति करने वाले व्यक्ति को दो वर्ष तक की कैद या 15,000 रुपए का जुर्माना या फिर दोनों सज़ा एक साथ हो सकती है।
      • ऐसे कर्मचारियों के विरुद्ध सेवा नियमों और शर्तों के अनुसार बर्खास्तगी सहित अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
      • ऐसे मामले में जिसमें जाँच करना व्यावहारिक रूप से उचित नहीं है, उसमें संबंधित प्राधिकारी को बिना किसी पूछताछ के कर्मचारी को बर्खास्त करने या हटाने की अनुमति दी जाती है।
  • सभी अपराधों की सज़ा संज्ञेय (Cognisable) और गैर-जमानती होगी।
    • संज्ञेय अपराध वे होते हैं जिनमें तत्काल गिरफ्तारी की आवश्यकता होती है।

सार्वजनिक उपयोगिता सेवा:

  • यह सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं (Public Utility Service) के अंतर्गत आवश्यक रक्षा सेवाओं को शामिल करने के लिये औद्योगिक विवाद अधिनियम (Industrial Disputes Act), 1947 में संशोधन करेगा।
    • बिजली, पानी, गैस, परिवहन आदि जैसी बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति करने वाले उपक्रम जनोपयोगी सेवा प्रदाता के दायरे में आते हैं।

हड़ताल का अधिकार

  • हड़ताल के अधिकार को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) मौलिक अधिकारों के रूप में कुछ स्वतंत्रताओं की सुरक्षा की गारंटी देता है जैसे:
    • वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
    • शांति पूर्वक और हथियारों के बिना सम्मेलन की स्वतंत्रता।
    • संगम या संघ बनाने का अधिकार।
    • पूरे भारत क्षेत्र में अबाध संचरण की स्वतंत्रता।
    • भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता।
    • किसी भी व्यवसाय, पेशा अपनाने एवं व्यापार शुरू करने की स्वतंत्रता।
  • हालाँकि भारत के संविधान में हड़ताल को स्पष्ट रूप से मान्यता नहीं दी गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने कामेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य 1958 के मामले को यह कहकर सुलझा लिया कि हड़ताल मौलिक अधिकार नहीं है। सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने का कोई कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है।
  • भारत ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत हड़ताल को एक वैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947

  • यह सार्वजनिक उपयोगिता सेवा और हड़ताल को परिभाषित करता है, यह हड़ताल के अधिकार पर कुछ निषेध भी लगाता है। यह प्रावधान करता है कि सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में कार्यरत कोई भी व्यक्ति अनुबंध का उल्लंघन कर हड़ताल पर नहीं जाएगा, जो इस प्रकार है:
    • हड़ताल से पहले छह सप्ताह के भीतर नियोक्ता को हड़ताल का नोटिस दिये बिना।
    • ऐसा नोटिस देने के चौदह दिनों के भीतर।
    • पूर्वोक्त ऐसे किसी नोटिस में निर्दिष्ट हड़ताल की तिथि की समाप्ति से पहले।
    • सुलह अधिकारी के समक्ष किसी भी सुलह की कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान और ऐसी कार्यवाही के समापन के सात दिन बाद।
  • यह ध्यान दिया जाना चाहिये कि ये प्रावधान कामगारों को हड़ताल पर जाने से नहीं रोकते हैं, लेकिन उन्हें हड़ताल पर जाने से पहले शर्त को पूरा करने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा ये प्रावधान केवल सार्वजनिक उपयोगिता सेवा (Public Utility Service) पर लागू होते हैं।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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