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उत्प्रवासन विधेयक 2021

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  • 27 Jul 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

1983 का उत्प्रवासन अधिनियम 

मेन्स के लिये:

उत्प्रवासन विधेयक 2021 के प्रावधान एवं इसका महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विदेश मंत्रालय (MEA) ने उत्प्रवासन विधेयक 2021 के लिये सार्वजनिक सुझाव आमंत्रित किये हैं। यह विधेयक विदेशों में रोज़गार चाहने वाले नागरिकों की भर्ती प्रक्रिया में सुधार हेतु दीर्घावधि से लंबित अवसर प्रदान करता है।

प्रमुख बिंदु:

विधेयक की मुख्य विशेषताएँ:

  • यह विधेयक वर्ष 1983 के उत्प्रवास अधिनियम को बदलने का इरादा रखता है।
  • विधेयक में व्यापक उत्प्रवास प्रबंधन की परिकल्पना की गई है, भारतीय नागरिकों के विदेशी रोज़गार को नियंत्रित करने वाले नियामक तंत्र स्थापित किये गए हैं और प्रवासियों के कल्याण के संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु एक ढाँचा स्थापित किया गया है।
  • इस विधेयक में एक त्रिस्तरीय संस्थागत ढाँचे का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है:
    • यह (MEA) में एक नया प्रवासी नीति प्रभाग शुरू करता है जिसे केंद्रीय प्रवास प्रबंधन प्राधिकरण के रूप में संदर्भित किया जाएगा।
    • यह एक प्रवासी नीति और योजना ब्यूरो के निर्माण का प्रस्ताव करता है तथा प्रवासी प्रशासन ब्यूरो दिन-प्रतिदिन के परिचालन मामलों को संभालेगा एवं प्रवासियों के कल्याण की देखरेख करेगा।
    • यह प्रवासियों के कल्याण और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये एक मुख्य प्रवासी अधिकारी के अधीन नोडल एजेंसियों का प्रस्ताव करता है।
  • यह सरकारी अधिकारियों को श्रमिकों द्वारा विधेयक के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन किये जाने पर उनके पासपोर्ट रद्द या निलंबित करने और 50,000 रुपए तक का जुर्माना लगाकर दंडित करने की अनुमति देता है।
    • विधेयक को लागू कर इसका उपयोग उन श्रमिकों पर नकेल कसने हेतु एक उपकरण के रूप में किया जा सकता है जो अपंजीकृत दलालों के माध्यम से या पर्यटक वीज़ा जैसे अनियमित व्यवस्था के माध्यम से प्रवास करते हैं।
  • प्रस्तावित कानून मानव संसाधन एजेंसियों के पंजीकरण, रख-रखाव, वैधता और नवीनीकरण तथा प्रमाण पत्र को रद्द करने का भी प्रावधान करेगा।
    • इसके अलावा अधिकारियों को सिविल कोर्ट की कुछ शक्तियों का अधिकार होगा।

विधेयक की आवश्यकता:

  • श्रम प्रवास उत्प्रवास अधिनियम, 1983 द्वारा नियंत्रित होता है जो सरकार द्वारा प्रमाणित भर्ती एजेंटों, सार्वजनिक या निजी एजेंसियों के माध्यम से व्यक्तियों को काम पर रखने के लिये एक तंत्र स्थापित करता है। 
    • यह संभावित नियोक्ताओं के लिये श्रमिकों की व्यवस्था करने हेतु एजेंटों के दायित्वों की रूपरेखा तैयार करता है, सेवा शुल्क की सीमा निर्धारित करता है और श्रमिकों की यात्रा तथा रोज़गार दस्तावेज़ों की सरकारी समीक्षा की व्यवस्था करता है (जिसे उत्प्रवास मंज़ूरी के रूप में जाना जाता है)।
    • उत्प्रवास अधिनियम, 1983 को खाड़ी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्प्रवास के विशिष्ट संदर्भ में अधिनियमित किया गया है, जो वर्तमान में उत्प्रवास के व्यापक भू-आर्थिक, भू-राजनीतिक और भू-रणनीतिक प्रभाव को संबोधित करने में विफल रहा है।
  • वर्षों से प्रवासी श्रमिकों की स्थिति की स्वतंत्र जाँच ने गंभीर शोषणकारी प्रथाओं को रेखांकित किया है, जिनमें शामिल हैं:
    • अधिक भर्ती शुल्क
    • अनुबंध प्रतिस्थापन
    • धोखाधड़ी
    • पासपोर्ट प्रतिधारण
    • मज़दूरी का भुगतान न करना या कम भुगतान
    • खराब आवास की स्थिति
    • भेदभाव और दुर्व्यवहार के अन्य रूप
  • उदाहरण के लिये हाल के महीनों में मीडिया रिपोर्टों ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि कैसे अरब खाड़ी राज्यों/पश्चिम एशिया में अधिकांश प्रवासी श्रमिकों की मृत्यु दिल के दौरे और श्वसन विफलताओं की वजह से होती है। 

संबद्ध मुद्दे:

  • मानवाधिकार फ्रेमवर्क की कमी: प्रवासियों और उनके परिवारों के अधिकारों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से एक मानवाधिकार ढाँचे/ फ्रेमवर्क की कमी के कारण विधेयक की आलोचना की जाती है। उदाहरण :
    • कानून के तहत दंडात्मक प्रावधान, प्रवासी कामगारों के लिये विकल्पों का अपराधीकरण करते हैं, क्योंकि वे कानून से अनभिज्ञ होते हैं  या नियोक्ताओं के प्रभाव में या बस एक अच्छी नौकरी खोजने के लिये तत्पर होते हैं।
    • इसके अलावा एक अनियमित स्थिति में प्रवासियों को डर रहता है कि उन पर जुर्माना लगाया जा सकता है या उनका पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है, उनसे की जाने वाली दुर्व्यवहार की घटना की शिकायत करने या समाधान  करने की संभावना कम होती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं: विधेयक जनशक्ति एजेंसियों को श्रमिकों से  सेवा शुल्क लेने की अनुमति देता है, और यहाँ तक कि एजेंटों को अपनी सीमा निर्धारित करने की भी अनुमति देता है। 
    • हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के सामान्य सिद्धांत यह मानते हैं कि भुगतान का वहन नियोक्ता को करना चाहिये न कि श्रमिकों को।
    • कामगारों द्वारा भुगतान की जाने वाली भर्ती फीस उनकी बचत को खत्म कर देती है, उन्हें उच्च ब्याज ऋण लेने के लिये मज़बूर करती है, श्रमिकों को बंधुआ श्रमिक के रूप में ऋण बंधन की स्थिति में डाल देती है।
  • न्यून लिंग आयाम: यह विधेयक श्रम प्रवास के लिंग आयामों को भी पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता है।
    • महिलाओं की भर्ती में उनके समकक्षों की तुलना में सीमित एजेंसियाँ होती हैं  तथा हाशिये पर स्थित वर्ग के अनौपचारिक क्षेत्रों और/या अलग-अलग व्यवसायों में नियोजित होने की अधिक संभावना होती है जिसमें श्रम, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और यौन शोषण सामान्य मुद्दे हैं।

आगे की राह 

  • समावेशी विकास सुनिश्चित करने और संकटपूर्ण प्रवास को कम करने के लिये भारत को प्रवास केंद्रित नीतियों, रणनीतियों और संस्थागत तंत्र तैयार करने की आवश्यकता है।
  • इससे गरीबी में कमी और सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की भारत की संभावनाओं में वृद्धि होगी।

स्रोत : द हिंदू

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