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जीव विज्ञान और पर्यावरण

बालसम में समृद्ध पूर्वी हिमालयी क्षेत्र

  • 17 Jun 2019
  • 5 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India) द्वारा प्रकाशित पुस्तक में कई नए रिकॉर्ड सहित नई प्रजातियों का विवरण प्रस्तुत किया गया।

  • इसके अनुसार वर्ष 2010 से 2019 के बीच वनस्पतिविदों और वर्गिकी वैज्ञानिकों ने पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में इम्पेतिंस (Impatiens) जो पौधों का एक समूह है, की लगभग 23 नई प्रजातियों की खोज की।
  • उल्लेखनीय है कि इम्पेतिंस पौधे के समूह को बालसम या ज्वेल-वीड (Balsams or jewel-weeds) के रूप में भी जाना जाता है।

प्रमुख बिंदु

  • इस विवरण में बालसम की (Balsams) 83 प्रजातियों (Species), एक किस्म (Variety), एक प्राकृतिक प्रजाति (Naturalised species) और दो खेती की जाने वाली प्रजातियों (Cultivated Species) का विवरण प्रस्तुत किया गया है।
  • इन 83 प्रजातियों में से 45 प्रजातियाँ अरुणाचल प्रदेश में, 24 प्रजातियाँ सिक्किम में एवं 16 प्रजातियाँ दोनों राज्यों में (संयुक्त रूप से) सामान्य रूप सी पाई गई हैं।
  • ये औषधीय गुणों से युक्त तथा उच्च स्थानिक/देशज पौधे हैं, जो वार्षिक एवं बारहमासी दोनों ही रूपों में पाए जाते हैं।
  • अपने चमकीले फूलों के कारण पौधों के ये समूह बागवानी के लिये भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

Balsams

बालसम

  • इसकी अधिकतर प्रजातियाँ औषधीय गुणों से युक्त हैं, इसे गुलमेहंदी भी कहा जाता है।
  • आज़ादी के बाद, पूर्वोत्तर भारत में इम्पेतिंस पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। इस पुस्तक के प्रकाशन से पहले पूर्वी हिमालय में बालसम प्रजाति की कुल संख्या लगभग 50 ही थी।
  • भारत में बालसम की लगभग 230 प्रजातियाँ पाई जाती हैं और उनमें से अधिकांश पूर्वी हिमालय और पश्चिमी घाटों में पाई जाती हैं।

आने वाली चुनौतियाँ

  • इम्पेतिंस की अधिकांश प्रजातियाँ उच्च स्थानिक होने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील भी है जो सूर्य के प्रत्यक्ष प्रकाश, लगातार सूखे की स्थिति या अन्य जोखिमों को सहन नहीं कर पाती हैं।
  • परिणामस्वरूप इम्पेतिंस की अधिकांश प्रजातियाँ नमी वाली सड़कों, पानी के आस-पास की जगहों, झरने और नम जंगलों के समीप के क्षेत्रों तक ही सीमित हो गई हैं।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार, बालसम की कम-से-कम छह प्रजातियाँ ऐसी हैं जो अरुणाचल प्रदेश में केवल निचली दिबांग घाटी तक ही सीमित है। जो निम्नलिखित हैं-
    • आई. एडामोव्सकिआना (I. adamowskiana)
    • आई. डीबलजेंसिस (I. debalgensis)
    • आई. अल्बोपेटाला (I. albopetala)
    • आई. अशिहोई (I. ashihoi)
    • आई. इडुमिश्मेंनसिस (I. idumishmiensis)
    • आई. रगोसिपेटाला (I. rugosipetala)
  • कुछ प्रजातियाँ को उनकी खूबसूरती और चमकदार फूलों के कारण बड़े बागानों में लगाया जाता हैं। जिनमें प्रमुख हैं-
    • आई. लोहितेंसिस (I. lohitensis)
    • आई. पेथाकियाना (I. pathakiana)
    • आई. स्यूडोलाइविगाटा (I. pseudolaevigata)
  • पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन का इस समूह पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अतः ऐसे में इसके संरक्षण के संबंध में विशेष रूप से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

वैज्ञानिकों के अनुसार, इन नई प्रजातियों की खोज ही पर्याप्त नहीं है, गर्म जलवायु में इसके पनपने हेतु आवश्यक अनुकूलन क्षमता का विकास कर अलग-अलग संकर पौधे बनाने के लिये अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।

स्रोत- द हिंदू

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