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भारतीय राजनीति

प्रत्यायोजित विधान

  • 12 Jan 2023
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

विमुद्रीकरण का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, आरबीआई अधिनियम 1934, अध्यादेश, शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत

मेन्स के लिये:

प्रत्यायोजित विधान- महत्त्व और आलोचना, शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत और प्रत्यायोजित विधान

चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत के फैसले ने प्रत्यायोजित कानून की वैधता को बरकरार रखा, जबकि असहमति वाले फैसले में कहा गया कि सत्ता का अत्यधिक प्रत्यायोजन मनमाना है।

प्रत्यायोजित विधान क्या है?

  • परिचय:
    • चूँकि संसद स्वयं शासन प्रणाली के हर पहलू से नहीं निपट सकती है, इसलिये इन कार्यों को कानून द्वारा नियुक्त अधिकारियों को सौंपती है। ऐसा प्रतिनिधिमंडल विधियों में उल्लेख किया गया है, जिसे आमतौर पर प्रत्यायोजित विधान कहा जाता है।
    • उदाहरण- विधानों के तहत विनियम और उपनियम (एक स्थानीय प्राधिकरण द्वारा बनाए गए कानून जो केवल उसके क्षेत्र में लागू होते हैं)।
  • प्रत्यायोजित कानून पर सर्वोच्च न्यायालय का विचार:
    • हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ (1959) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने शक्तियों के प्रत्यायोजन को इस आधार पर रद्द कर दिया कि यह अस्पष्ट था।
      • यह निष्कर्ष निकाला गया कि 1954 के ड्रग एंड मैजिक रेमेडीज़ (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम के केंद्र द्वारा विशिष्ट बीमारियों और स्थितियों को निर्दिष्ट करने का अधिकार अनैतिक एवं अनियंत्रित है और एक वैध प्रतिनिधिमंडल के दायरे से परे है। इसलिये इसे असंवैधानिक करार दिया गया।
    • 1973 के एक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रत्यायोजित कानून का विचार एक समकालीन कल्याणकारी राज्य की व्यावहारिक आवश्यकताओं तथा मांगों के कारण अस्तित्व में आया है।
  • विमुद्रीकरण मामले में प्रत्यायोजित विधान:
    • RBI अधिनियम, 1934 की धारा 26(2) के अनुसार, केंद्र सरकार के पास मुद्रा के किसी मूल्यवर्ग की कानूनी मुद्रा को बंद करने का अधिकार है।
      • संसद ने केंद्र सरकार को कानूनी निविदा की प्रकृति में परिवर्तन करने की शक्ति सौंपी है। जिसे बाद में राजपत्र अधिसूचना (विधायी आधार) जारी करके प्रयोग किया जाता है।
    • केंद्र की सत्ता के इस प्रतिनिधिमंडल को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि धारा 26 (2) में केंद्र द्वारा अपनी शक्तियों के प्रयोग संबंधी कोई नीतिगत दिशा-निर्देश नहीं है, इस प्रकार यह मनमाना (और असंवैधानिक) है।

प्रत्यायोजित विधान का महत्त्व और आलोचना:

  • महत्त्व:
    • यह कानून बनाने की प्रक्रिया में लचीलापन और अनुकूलता प्रदान करता है। कुछ शक्तियों को प्रत्यायोजित करके विधायिका बदलती परिस्थितियों और उभरते मुद्दों पर अधिक तेज़ी एवं कुशलता से प्रतिक्रिया कर सकती है।
    • अतिरिक्त कौशल, अनुभव और ज्ञान (प्रौद्योगिकी, पर्यावरण आदि जैसे क्षेत्रों में जहाँ संसद के पास हमेशा विशेषज्ञता नहीं हो सकती है) के साथ प्रत्यायोजित प्राधिकरण कानून बनाने के लिये अधिक उपयुक्त हैं।
  • आलोचना:
    • इसके परिणामस्वरूप विधायी प्रक्रिया में जवाबदेही/पारदर्शिता की कमी हो सकती है क्योंकि कार्यकारी एजेंसियों/प्रशासनिक निकायों द्वारा अधिनियमित कानून सार्वजनिक जाँच और बहस के उसी स्तर के अधीन नहीं होते हैं जैसा कि विधायिका द्वारा अधिनियमित कानून हैं।
    • इसके अतिरिक्त यह सरकार की कार्यकारी और प्रशासनिक शाखाओं में शक्ति केंद्रीकरण को भी जन्म दे सकता है, जो शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को कमज़ोर कर सकता है।
      • हालाँकि कुछ प्रकार के प्रत्यायोजित कानून, जैसे अध्यादेशों को विधायिका द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिये।

आगे की राह

  • भारत में प्रत्यायोजित विधान पर संसदीय नियंत्रण कम प्रभावी है; प्रत्यायोजित विधान के 'स्थापन' को नियंत्रित करने वाली कोई वैधानिक प्रक्रिया नहीं है।
    • संसद की समितियों को सशक्त करना आवश्यक है और शक्तियों के प्रत्यायोजन के लिये समान नियमों का प्रावधान करने वाला एक अलग कानून बनाया जाना चाहिये।
  • इसके अलावा नागरिक कार्यकारी एजेंसियों और प्रशासनिक निकायों द्वारा प्रस्तावित तथा कार्यान्वित किये जा रहे कानूनों एवं विनियमों से परिचित रहते हुए प्रत्यायोजित विधान में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकते हैं।
    • वे सार्वजनिक परामर्श और टिप्पणी अवधि में भी भाग ले सकते हैं तथा अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार को जवाबदेह ठहरा सकते हैं।
  • इसके अतिरिक्त मीडिया प्रत्यायोजित कानून के साथ किसी भी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने और सार्वजनिक संवाद के लिये एक मंच प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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