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भारतीय अर्थव्यवस्था

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट

  • 11 Oct 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), विदेशी मुद्रा भंडार, FPI, विशेष आहरण अधिकार।

मेन्स के लिये:

भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशी मुद्रा भंडार का प्रभाव।

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के अनुसार, पिछले 13 महीनों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 110 बिलियन अमेरिकी डाॅलर की गिरावट आई है।

विदेशी मुद्रा भंडार:

  • परिचय: विदेशी मुद्रा भंडार का आशय केंद्रीय बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा में आरक्षित संपत्ति से होता है, जिसमें बाॅण्ड, ट्रेज़री बिल और अन्य सरकारी प्रतिभूतियाँ शामिल होती हैं।
    • अधिकांश विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिकी डॉलर में रखा जाता है।
  • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है:
  • विदेशी मुद्रा भंडार का महत्त्व:
    • मौद्रिक और विनिमय दर प्रबंधन हेतु निर्मित नीतियों के प्रति समर्थन व विश्वास बनाए रखना।
    • यह राष्ट्रीय या संघ की मुद्रा के समर्थन में हस्तक्षेप करने की क्षमता प्रदान करता है।
    • संकट के समय या जब उधार लेने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है, तो संकट के समाधान के लिये विदेशी मुद्रा तरलता को बनाए रखते हुए बाहरी प्रभाव को सीमित करती है।

विशेष आहरण अधिकार (SDRs):

  • विशेष आहरण अधिकार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) द्वारा 1969 में अपने सदस्य देशों के लिये अंतर्राष्ट्रीय आरक्षित संपत्ति के रूप में बनाया गया था।
  • SDR न तो एक मुद्रा है और न ही IMF पर इसका दावा किया जा सकता है। बल्कि यह IMF के सदस्यों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने योग्य मुद्राओं पर एक संभावित दावा है। इन मुद्राओं के लिये SDR का आदान-प्रदान किया जा सकता है।
  • SDR के मूल्य की गणना ‘बास्केट ऑफ करेंसी’ में शामिल मुद्राओं के औसत भार के आधार पर की जाती है। इस बास्केट में पाँच देशों की मुद्राएँ शामिल हैं- अमेरिकी डॉलर, यूरोप का यूरो, चीन की मुद्रा रॅन्मिन्बी, जापानी येन और ब्रिटेन का पाउंड।
  • SDRs या SDRi पर ब्याज दर सदस्यों को उनके SDR होल्डिंग्स पर दिया जाने वाला ब्याज़ है।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के कारण:

  • वर्तमान परिदृश्य:
    • सितंबर 2021 के बाद से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार में 110 बिलियन अमेरिकी डॉलर की गिरावट आई है, जहाँ यह 642.45 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर था।
      • यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि भारतीय रुपया एक स्वतंत्र रूप से फ्लोटिंग मुद्रा है और इसकी विनिमय दर बाज़ार द्वारा निर्धारित होती है। RBI की कोई निश्चित विनिमय दर नहीं है।
    • इस भारी गिरावट के बावजूद भारत की स्थिति कई आरक्षित मुद्राओं, उभरती बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं और इसके एशियाई समकक्षों की तुलना में काफी बेहतर रहा है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के कारण:
    • रुपए का समर्थन: वैश्विक विकास के कारण प्रमुख रूप से दबाव के मध्य केंद्रीय बैंक रुपए का समर्थन करने के लिये विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर का विक्रय कर रहा है।
      • रुपए की मुक्त गिरावट को रोकने और बाज़ार में अस्थिरता को कम करने के लिये हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
    • अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की आक्रामक नीति:
      • पूंजी बहिर्वाह: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (foreign portfolio investors-FPIs) द्वारा पूंजी बहिर्वाह के रूप में अमेरिकी फेडरल रिज़र्व ने मौद्रिक नीति को सख्त करने और ब्याज दरों में वृद्धि की शुरूआत की।
        • FPIs ने भारतीय बाज़ारों से हटना शुरू कर दिया है। ये FPIs वित्तीय और आईटी सेवाओं के विक्रेता तथा दूरसंचार एवं पूंजीगत वस्तुओं के खरीदार थे।
      • मूल्यांकन हानि: मूल्यांकन हानि, प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की कीमत में वृद्धि और सोने की कीमतों में गिरावट ने भी विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी में भूमिका निभाई।
        • चालू वित्त वर्ष के दौरान भंडार में लगभग 67% गिरावट, अमेरिकी डॉलर की बढ़त और उच्च अमेरिकी बॉण्ड प्रतिफल से उत्पन्न मूल्यांकन परिवर्तनों के कारण थी।

विनिमय दरों को प्रभावित करने वाले कारक:

मुद्रास्फीति दर: बाज़ार मुद्रास्फीति में परिवर्तन मुद्रा विनिमय दरों में परिवर्तन का कारण बनता है। उदाहरण के लिये दूसरे देश की तुलना में कम मुद्रास्फीति दर वाले देश की मुद्रा के मूल्य में वृद्धि देखी जाती है।

उत्पादों के आयात पर अपने विदेशी मुद्रा कोअधिक खर्च करने के कारण चालू खाते में घाटा, निर्यात की बिक्री से होने वाली आय से मूल्यह्रास का कारण बनता है और यह किसी देश की घरेलू मुद्रा की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव को बढ़ावा देता है।

सरकारी ऋण: सरकारी ऋण केंद्र सरकार के स्वामित्व वाला ऋण है। बड़े सरकारी कर्ज वाले देश में विदेशी पूंजी प्राप्त करने की संभावना कम होती है, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ जाती है।

इस मामले में,विदेशी निवेशक अपने बॅाण्ड की विक्री खुले बाज़ार में करेंगे, यदि बाज़ार किसी निश्चित देश के भीतर सरकारी ऋण का अनुमान लगाता है। परिणामतः इसकी विनिमय दर के मूल्य में कमी आएगी।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भुगतान सन्तुलन के संदर्भ में निम्नलिखित में से किससे/किनसे चालू खाता बनता है? (2014)

  1. व्यापार संतुलन
  2. विदेशी संपत्ति
  3. अदृश्य का संतुलन
  4. विशेष आहरण अधिकार

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 1, 2 और 4

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • भुगतान संतुलन (BoP) दो मुख्य पहलुओं से बना है: चालू खाता और पूंजी खाता।
  • BoP का चालू खाता वस्तुओं, सेवाओं, निवेश आय और हस्तांतरण भुगतानों के प्रवाह व बहिर्वाह को मापता है। सेवाओं में व्यापार (अदृश्य); माल के रूप में व्यापार (दृश्यमान); एकतरफा स्थानांतरण; विदेशों से प्रेषण; अंतर्राष्ट्रीय सहायता चालू खाते के कुछ मुख्य घटक हैं। जब सभी वस्तुओं और सेवाओं को संयुक्त किया जाता है, तो वे एक साथ मिलकर किसी देश का व्यापार संतुलन (BoT) को दर्शाता है। अतः कथन 1 और 3 सही हैं।
  • BoP का पूंजी खाता किसी देश के निवासियों और बाकी दुनिया के बीच उन सभी लेनदेन को रिकॉर्ड करता है, जो देश के निवासियों या उसकी सरकार की संपत्ति या देनदारियों में बदलाव का कारण बनते हैं
  • निजी अथवा सार्वजनिक क्षेत्रों द्वारा ऋण और उधार; निवेश; विदेशी मुद्रा भंडार में परिवर्तन पूंजी खाते के घटकों के कुछ उदाहरण हैं। अतः कथन 2 और 4 सही नहीं हैं। इसलिये विकल्प (c) सही उत्तर है।

मेन्स:

प्रश्न.भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिये प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवश्यकता का औचित्य सिद्ध कीजिये। हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों और वास्तविक एफडीआई के बीच अंतर क्यों है? भारत में वास्तविक एफडीआई बढ़ाने के लिये उठाए जाने वाले उपचारात्मक कदमों का सुझाव दीजिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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