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न्यायिक अवमानना बनाम वाक् स्वतंत्रता

  • 05 Aug 2020
  • 7 min read

प्रीलिम्स के लिये:

न्यायिक अवमानना

मेन्स के लिये:

न्यायिक अवमानना

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा उनके विरुद्ध ‘न्यायिक अवमानना की कार्यवाही’ के तहत ‘सर्वोच्च न्यायालय’ द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस के जवाब में 142 पृष्ठों वाला हलफ़नामा दायर किया गया।

प्रमुख बिंदु:

  • दरअसल यह मामला वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के द्वारा किये गए ट्वीट (tweet) से संबंधित है, जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया साइट्स ट्विटर पर पोस्ट किये गये कथित अवमाननाकारक ट्वीट में सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना की थी। 
  • प्रशांत भूषण ने वैश्विक महामारी COVID-19 के दौरान दूसरे राज्यों से पलायन कर रहे कामगारों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के रवैये की तीखी आलोचना की थी।

न्यायिक अवमानना:

  • न्यायिक अवमानना का अर्थ है, किसी न्यायालय की गरिमा तथा उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना, न्यायिक आदेशों की अवहेलना करना तथा उनका पालन  सुनिश्चित न करना। 

अवधारणा का विकास:

  • 'न्यायालय की अवमानना' संबंधी अवधारणा का अस्तित्त्व इंग्लैंड में कई सदियों से है। इंग्लैंड में इसे एक सामान्य कानूनी सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त है जिसका उद्देश्य राजा की ‘न्यायिक शक्तियों’ की रक्षा करना है। 
  • शुरुआत में राजा स्वयं अपनी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करता था परंतु बाद में इन शक्तियों का प्रयोग ‘न्यायाधीशों के एक पैनल’; जो राजा के नाम पर कार्रवाई कार्य करता है, द्वारा किया जाने लगा। न्यायाधीशों के आदेशों के उल्लंघन को स्वयं राजा के अपमान के रूप में देखा जाता था।
  • समय के साथ न्यायाधीशों की किसी भी तरह की अवज्ञा, या उनके निर्देशों के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करना, या ऐसी कोई टिप्पणी या कार्य करना जो उनके प्रति अनादर दिखाते थे, दंडनीय माने जाने लगे।
  • भारत में न्यायिक अवमानना के कानून स्वतंत्रता से पहले से ही विद्यमान थे। प्रारंभिक उच्च न्यायालयों के अलावा कुछ रियासतों के न्यायालयों में ऐसे कानून विद्यमान थे।

वैधानिक आधार (Statutory Basis):

  • संविधान का अनुच्छेद-129 सर्वोच्च न्यायालय को और अनुच्छेद-215 उच्च न्यायालयों को अवमानना पर दंडित करने की शक्ति प्रदान करते हैं।
  • 'न्यायालय की अवमानना अधिनियम' (Contempt of Courts Act)- 1971 इसे वैधानिक समर्थन प्रदान करता है।

अनुच्छेद-129 और अभिलेख न्यायालय:

  • अभिलेख न्यायालय के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के पास दो प्रकार की शक्तियाँ हैं:
    • उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही एवं निर्णय सार्वजनिक अभिलेख और साक्ष्य के रूप में रखे जाएंगे तथा उन्हे विधिक संदर्भों की तरह स्वीकार किया जाएगा। इन अभिलेखों पर किसी अन्य न्यायालय में चल रहे मामले के दौरान प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। 
    • सर्वोच्च न्यायालय के पास अवमानना पर दंडित करने का अधिकार है। दंड देने की यह शक्ति न केवल सर्वोच्च न्यायालय में निहित है, बल्कि ऐसा ही अधिकार उच्च न्यायालयों , अधीनस्थ न्यायालयों और पंचाटों को भी प्राप्त है। 

न्यायिक अवमानना के प्रकार:

  • न्यायालय की अवमानना अधिनियम', न्यायिक अवमानना को सिविल अवमानना और आपराधिक अवमानना के रूप में वर्गीकृत करता है:

सिविल अवमानना (Civil Contempt):

  • सिविल अवमानना का मतलब है जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से न्यायालय के आदेश, निर्णय या न्यायादेश की अवहेलना करता है। 

आपराधिक अवमानना (Criminal contempt):

  • लिखित या मौखिक शब्दों, संकेतों और क्रियाओं के माध्यम से न्यायालय के प्राधिकार को कम करना या बदनाम करना या ऐसा करने का प्रयास करना।
  • न्यायिक प्रक्रिया के प्रति पूर्वाग्रह रखना या हस्तक्षेप करना। 
  • न्याय प्रशासन को किसी भी तरीके से रोकना या बाधित करना। 

न्यायिक अवमानना में शामिल हैं:

  • संपूर्ण न्यायपालिका या अलग-अलग न्यायाधीशों के खिलाफ आरोप लगाना; 
  • न्यायालय के निर्णयों और न्यायिक कार्यों में बाधा उत्पन्न करना; 
  • न्यायाधीशों के आचरण पर किसी भी तरह के अपमानजनक हमले करना।

न्यायालय की अवमानना नहीं है:

  • न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग में न्यायालय की अवमानना नहीं होगी।
  • किसी मामले की सुनवाई और निपटान के बाद न्यायिक आदेश की युक्तिसंगत निष्पक्ष आलोचना करना।

दंडित करने का अधिकार:

  • न्यायालय के पास अवमानना पर पर दंडित करने का अधिकार है। इसमें 6 महीने के लिये सामान्य जेल या 2000 रुपए तक अर्थदंड या दोनों शामिल हैं। 

चिंता के विषय:

  • संविधान का अनुच्छेद-19 भारत के प्रत्येक नागरिक को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है परंतु न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971 द्वारा न्यायालय की कार्यप्रणाली के खिलाफ बात करने पर अंकुश लगा दिया है।
  • किसी न्यायाधीश की आलोचना को सर्वोच्च न्यायालय की निंदा या उसकी गरिमा को कम करने का आधार मानना युक्तिसंगत आलोचना के विरुद्ध है।

आगे की राह:

  • न्यायपालिका को दो परस्पर विरोधी सिद्धांतों अर्थात् अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा और न्यायालय की अवमानना ​​की शक्ति को संतुलित करने की दिशा में प्रयास करना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू

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