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कृषि

जलवायु प्रतिरोधी कृषि

  • 14 Jun 2023
  • 14 min read

प्रिलिम्स के लिये:

सूखा, कृषि उत्पादकता, वाटरशेड विकास, भूजल, हीटवेव, पिंक बॉलवॉर्म, बिपरजॉय चक्रवात

मेन्स के लिये:

भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रभाव

चर्चा में क्यों?  

हाल ही में शोधकर्त्ताओं ने महाराष्ट्र के सूखा-प्रवण जालना ज़िले पर कुछ शोध किये हैं, इससे कृषि प्रणालियों के जलवायु प्रतिरोध को बढ़ाने में विभिन्न हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता का पता चला है।

शोध के प्रमुख बिंदु:

  • जल संसाधन विकास पर अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित शोध में महाराष्ट्र के दो अर्द्ध-शुष्क गाँवों- बाबई और देउलगाँव टाड में 15 वर्ष की अवधि में विभिन्न कृषि विकास हस्तक्षेपों के प्रभाव की पड़ताल शामिल है।
  • इन गाँवों को दो कृषि प्रणालियों के रूप में चुना गया था:
    • जहाँ बाबई में हस्तक्षेप का उद्देश्य कृषि उत्पादकता और सिंचाई के बुनियादी ढाँचे में सुधार करना था
    • वहीं देउलगाँव टाड में हस्तक्षेपों द्वारा कृषि उत्पादकता में सुधार लाने के साथ ही अनुकूलन क्षमताओं के निर्माण को लक्षित करना था।
  • निष्कर्ष:  
    • वाटरशेड विकास में हस्तक्षेप के कारण फसल बुआई के पैटर्न में बदलाव और कृषि में वृद्धि देखने को मिली है।
    • हालाँकि समय के साथ इन तरीकों से भू-जल तालिका और मृदा स्वास्थ्य में गिरावट आई।
    • अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पारंपरिक कृषि विकास रणनीतियों को बहुत मामूली सफलता मिली है।
    • जल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, आजीविका विविधीकरण और खाद्य तथा पोषण सुरक्षा के साथ उत्पादकता बढ़ाने वाले संयुक्त हस्तक्षेपों से जलवायु प्रतिरोध क्षमता संकेतकों में सुधार हुआ।
    • प्रतिरोध क्षमता में वृद्धि के लिये निगरानी, ​​मूल्यांकन, लर्निंग और अनुकूल निर्णय लेना प्रमुख घटक थे।
    • बाबई के पास बेहतर जल संसाधन थे, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2007 में देउलगाँव टाड की तुलना में वह अधिक प्रतिरोधी था। पूरे वर्ष पर्याप्त जल और बेहतर गुणवत्ता वाली मृदा तक पहुँच बाबई के बेहतर प्रतिरोध क्षमता के लिये उत्तरदायी थी।
    • हालाँकि शोध के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में बाबई की समग्र प्रतिरोधकता में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
    • अनुकूली क्षमताओं और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर केंद्रित उपायों के कारण वर्ष 2007 में देउलगाँव टाड, जिसकी प्रतिरोधक क्षमता कम थी, में सभी प्रतिरोधकता मापदंडों में सुधार हुआ था।

भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रभाव:  

  • वर्षा प्रतिरूप में बदलाव: जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा प्रतिरूप में बदलाव आया है, जिसमें वर्षा के समय, तीव्रता एवं वितरण में बदलाव शामिल है।
    • इसके परिणामस्वरूप सूखा, बाढ़ और अनियमित वर्षा हो सकती है, जिससे कृषि उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
    • उदाहरण के लिये वर्ष 2019 में भारत में मानसूनी वर्षा में देरी और कमी का अनुभव हुआ, जिससे कई क्षेत्रों में फसल की पैदावार कम हुई।
  • बढ़ा हुआ तापमान: बढ़ते तापमान का फसल की वृद्धि और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
    • विभिन्न मौसम के दौरान उच्च तापमान फसल की को पैदावार और फसलों के पोषण मूल्य को कम कर सकता है। हीट स्ट्रेस पशुधन के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता को भी प्रभावित कर सकता है।
    • हाल के वर्षों में भारत में हीट वेब ने फसल की पैदावार विशेषकर गेहूँ और चावल जैसी गर्मी के प्रति संवेदनशील फसलों को प्रभावित किया है।
  • बदलते कीट और रोग प्रतिरूप: जलवायु परिवर्तन कीट और रोगों के वितरण एवं बहुतायत को प्रभावित करता है, जिससे कृषि कीट प्रबंधन को चुनौती का सामना करना पड़ता है।
    • तापमान और वर्षा प्रतिरूप में परिवर्तन कुछ कीटों और बीमारियों के प्रसार में सहायक हो सकते हैं, जो फसल के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
    • उदाहरण के लिये पिंक बॉलवर्म जैसे कीटों की बढ़ती घटनाओं ने भारत में कपास के उत्पादन को प्रभावित किया है एवं अनियमित वर्षा के कारण सोमालिया क्षेत्र से लोकस्ट स्वार्म को प्रभावित किया है।
  • जल संकट: जलवायु परिवर्तन जल की उपलब्धता विशेष रूप से सिंचाई हेतु वर्षा या हिमपात पर निर्भर क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
    • वर्षा प्रतिरूप में परिवर्तन और ग्लेशियरों के पिघलने से जल की कमी हो सकती है, यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण फसल विकास चरणों के दौरान फसल उत्पादकता को कम कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता कम हो सकती है और जल संसाधनों के लिये प्रतिस्पर्द्धा बढ़ सकती है।
  • फसल प्रतिरूप में परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन कुछ क्षेत्रों में विभिन्न फसलों की उपयुक्तता को प्रभावित कर सकता है। जैसे-जैसे तापमान एवं वर्षा प्रतिरूप बदलते हैं, उत्पादकता सुनिश्चित करने हेतु किसानों को अपने फसल प्रतिरूप को अपनाने की आवश्यकता हो सकती है।
    • कुछ फसलें कम व्यवहार्य हो सकती हैं, जबकि अन्य अधिक उपयुक्त हो सकती हैं। हालाँकि अखिल भारतीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन से नारियल उत्पादन बढ़ने का अनुमान है।
  • चरम मौसम की घटनाओं में वृद्धि: जलवायु परिवर्तन को चक्रवात, तूफान और ओलावृष्टि जैसी चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि से जोड़ा गया है। इन घटनाओं से फसलों, पशुधन तथा बुनियादी ढाँचे को काफी नुकसान हो सकता है, जिससे किसानों को उपज की हानि और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

आगे की राह  

  • ज्ञान गहन कृषि के लिये इनपुट गहन: भारत कृषि पद्धतियों की विविधता हेतु जाना जाता है।  भविष्य के लिये उपयुक्त समाधान खोजने के लिये राष्ट्रीय स्तर की बातचीत में विविध दृष्टिकोणों को शामिल करना महत्त्वपूर्ण है।
    • साथ ही उन्नत दुनिया सटीक प्रथाओं और इनपुट के आवेदन के लिये सेंसर एवं अन्य वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग करके सटीक कृषि की ओर बढ़ रही है।
    • भारत में हाई-टेक खेती की दिशा में एक स्मार्ट और सटीक कदम औसत लागत को कम करेगा, किसानों की आय बढ़ाएगा और कई अन्य चुनौतियों का समाधान करेगा।
  • इंटरक्रॉपिंग और एग्रोफोरेस्ट्री: एक ही खेत में विभिन्न फसलों को एक साथ उगाने या फसलों के साथ पेड़ों को एकीकृत करने से जैवविविधता में वृद्धि हो सकती है, मिट्टी का क्षरण कम हो सकता है और जलवायु लचीलापन बढ़ सकता है। उदाहरण के लिये अनाज के साथ फलियाँ उगाने से न केवल अतिरिक्त आय प्राप्त होती है बल्कि नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार होता है।
    • इसके अलावा गैर-पारंपरिक फसलों की खेती को प्रोत्साहित करना, जो कि जलवायु चरम सीमाओं के प्रति अधिक लचीला है, एक फसल पर निर्भरता और जोखिमों को कम कर सकता है।
    • उदाहरण के लिये सूखा-सहिष्णु बाजरा को बढ़ावा देने से किसानों को बदलती जलवायु परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सकती है।
  • जलवायु-स्मार्ट जल प्रबंधन: विशेष रूप से जल-तनाव वाले क्षेत्रों में कृषि में जलवायु लचीलेपन के लिये कुशल जल प्रबंधन महत्त्वपूर्ण है। जल संसाधनों का संरक्षण करते हुए जलवायु-स्मार्ट जल प्रबंधन प्रथाओं को लागू करने से कृषि उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है।
    • बारिश के पानी को बर्बाद होने से बचाने और स्टोर करने के लिये तालाबों, चेक डैम और खेत में तालाबों का निर्माण भूजल को रिचार्ज करने तथा शुष्क समय के दौरान सिंचाई प्रदान करने में मदद कर सकता है।
    • किसान सूखे के दौरान या पूरक सिंचाई के लिये इस संग्रहीत पानी का उपयोग कर सकते हैं, जिससे अनियमित वर्षा पैटर्न पर निर्भरता कम हो जाती है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. स्थायी कृषि (पर्माकल्चर), पारंपरिक रासायनिक कृषि से किस तरह भिन्न है?(2021) 

  1. स्थायी कृषि एकधान्य कृषि पद्धति को हतोत्साहित करती है लेकिन पारंपरिक रासायनिक कृषि में एकधान्य कृषि पद्धति की प्रधानता है।
  2. पारंपरिक रासायनिक कृषि के कारण मृदा की लवणता में वृद्धि हो सकती है किंतु इस तरह की परिघटना स्थायी कृषि में दृष्टिगोचर नहीं होती है।
  3. पारंपरिक रासायनिक कृषि अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में आसानी से संभव है किंतु ऐसे क्षेत्रों में स्थायी कृषि इतनी आसानी से संभव नहीं है।
  4. मल्च बनाने (मल्चिंग) की प्रथा स्थायी कृषि में काफी महत्त्वपूर्ण है किंतु पारंपरिक रासायनिक कृषि में ऐसी प्रथा आवश्यक नहीं है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3 
(b)  केवल 1, 2 और 4 
(c) केवल 4  
(d)  केवल 2 और 3 

उत्तर: (b) 


प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी 'मिश्रित खेती' की प्रमुख विशेषता है? (2012)

(a) नकदी और खाद्य दोनों सस्यों की साथ-साथ खेती 
(b) दो या दो से अधिक सस्यों को एक ही खेत में उगाना  
(c) पशुपालन और सस्य उत्पादन को एक साथ करना  
(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

उत्तर: (c)

प्रश्न. सूक्ष्म सिंचाई के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2011) 

  1. उर्वरक/पोषक तत्त्वों के नुकसान को कम किया जा सकता है।
  2. यह शुष्क भूमि खेती में सिंचाई का एकमात्र साधन है।
  3. खेती के कुछ क्षेत्रों में भूजल स्तर में गिरावट को रोका जा सकता है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3 

उत्तर: (c) 


मेन्स:

प्रश्न. फसल विविधता के समक्ष मौजूदा चुनौतियाँ क्या हैं? उभरती प्रौद्योगिकियाँ फसल विविधता के लिये किस प्रकार अवसर प्रदान करती हैं? (2021) 

प्रश्न. जल इंजीनियरिंग और कृषि विज्ञान के क्षेत्रों में क्रमशः सर एम. विश्वेश्वरैया और डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन के योगदानों से भारत को किस प्रकार लाभ पहुँचा था? (2019) 

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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