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जीव विज्ञान और पर्यावरण

पूर्वी घाट तथा स्थानीय प्रजातियाँ

  • 21 Jan 2020
  • 6 min read

प्रीलिम्स के लिये:

पूर्वी घाट

मेन्स के लिये:

पूर्वी घाट के शोध से संबंधित विभिन्न तथ्य

चर्चा में क्यों?

पूर्वी घाट में हुए एक शोध के अनुसार, यह क्षेत्र भारत के सर्वाधिक दोहन किये गए और निम्नीकृत पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है।

मुख्य बिंदु:

  • पूर्वी घाट की असंबद्ध पहाड़ी श्रृंखलाएँ ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में फैली हुई हैं जो कि अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र का उदहारण है।
  • यहाँ 450 से अधिक स्थानिक पौधों की प्रजातियाँ विद्यमान होने के बावजूद भी यह क्षेत्र भारत के सर्वाधिक दोहन किये गए और निम्नीकृत पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है।
  • पूर्वी घाट क्षेत्र को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने में मानवीय, खनन, शहरीकरण, बांध निर्माण, जलाऊ लकड़ी संग्रहण और कृषि विस्तार गतिविधियाँ प्रमुख हैं।

शोध से संबंधित मुख्य बिंदु:

  • शोधकर्त्ताओं ने उपलब्ध पौधों की प्रजातियों के आँकड़ों का अध्ययन किया तथा 250 से अधिक स्थानों पर प्राप्त 22 प्रजातियों की पहचान की और पूर्वी घाट के लगभग 800 स्थानों पर 28 दुर्लभ, लुप्तप्राय एवं संकटग्रस्त (Rare, Endangered and Threatened- RET) प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की।
  • शोधकर्त्ताओं ने इन क्षेत्रों में मृदा, भूमि उपयोग, मानवजनित हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन का भी अध्ययन किया।

जनसंख्या वृद्धि से अत्यधिक दोहन:

  • ‘एन्वायरनमेंटल मॉनीटरिंग एंड असेसमेंट’ (Environmental Monitoring and Assessment) नामक जर्नल में छपे इस शोध के परिणाम के अनुसार, पूर्वी घाट क्षेत्र में वर्ष 2050 तक कुल मानव आबादी 2.6 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है जिससे यहाँ मानवजनित हस्तक्षेपों का पर्यावरण पर दबाव बढ़ेगा।
  • जनसंख्या बढ़ने से यहाँ भोजन, सड़क और अन्य गतिविधियों के लिये भूमि की मांग में वृद्धि होगी जो स्थानीय और RET प्रजातियों के निवास के लिये खतरा उत्पन्न करेगा।

असुरक्षित पर्यटन से समस्याएँ:

  • असुरक्षित पर्यटन भी इन प्रजातियों के वितरण को प्रभावित करता है।
  • विनियामक दिशा-निर्देशों के साथ ‘इको-टूरिज़्म’ (Ecotourism) को लागू करना पर्यावरण संरक्षण को सुधारने और बढ़ावा देने का एक सकारात्मक तरीका है।

क्षेत्रवार विश्लेषण:

  • शोधकर्त्ताओं द्वारा स्थानिक प्रजातियों को कालाहांडी, महेंद्रगिरि, नल्लामलाई, शेषाचलम, कोल्ली और कलरेयान पहाड़ी के जंगलों के मुख्य क्षेत्रों में वितरित किया गया।
  • वहीं RET प्रजातियों का वितरण जंगलों के मुख्य क्षेत्रों के साथ-साथ परिधि क्षेत्र में भी किया गया। इसलिये ये प्रजातियाँ मानवीय गतिविधियों से सर्वाधिक प्रभावित होती हैं।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव:

  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, क्षेत्रीय या स्थानीय जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार बिना वर्षा वाले दिनों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
  • वहीं अधिकतम और न्यूनतम तापमान वाले दिनों की संख्या में वृद्धि होने से मृदा की नमी में कमी और मृदा निम्नीकरण में वृद्धि हुई है।
  • इन कारकों ने लगातार वनाग्नि की घटनाएँ बढ़ने में योगदान दिया है, जिससे जंगलों में स्थानिक प्रजातियों का पुनरुत्पादन नहीं हो पाता है।
  • दुनिया भर के अध्ययनों से पता चला है कि अन्य क्षेत्रों की तुलना में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के पौधों की जैव विविधता में तेज़ी से कमी आ रही है, जिससे अध्ययनकर्त्ता इस क्षेत्र में तत्काल संरक्षणकारी रणनीतियों के निर्माण की आवश्यकता पर ज़ोर दे रहे हैं।

आगे की राह:

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change) तथा राज्यों के वन विभागों द्वारा पूर्वी घाट के जैव विविधता संरक्षण पर केंद्रित पहलों की शुरुआत की जानी चाहिये जिससे स्थानिक और RET प्रजातियों के घटते मूल निवास स्थानों की रक्षा की जा सके। राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों की सीमाओं को स्थानिक और RET प्रजातियों की समृद्धि के आधार पर पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिये।

स्रोत- द हिंदू

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