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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

चीन एक सुरक्षा जोखिम के रूप में: नाटो

  • 23 Jun 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

नाटो

मेन्स के लिये:

शीत युद्ध के समय एवं उसके बाद नाटो की भूमिका

चर्चा में क्यों?

हाल ही में आयोजित उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) शिखर सम्मेलन ने पहली बार स्पष्ट रूप से चीन को सुरक्षा जोखिम के रूप में वर्णित किया है।

  • नाटो 'उदघोषणा' द्वारा पहचाने गए अन्य दो जोखिम ‘रूस’ और ‘आतंकवाद’ हैं।

प्रमुख बिंदु:

उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो):

  • गठन: नाटो की स्थापना 4 अप्रैल, 1949 की उत्तरी अटलांटिक संधि (जिसे वाशिंगटन संधि भी कहा जाता है) द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और कई पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा सोवियत संघ के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा प्रदान करने के लिये की गई थी।
    • इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में है।
  • राजनीतिक और सैन्य गठबंधन: नाटो का प्राथमिक लक्ष्य अपने सदस्यों की सामूहिक रक्षा और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में लोकतांत्रिक शांति व्यवस्था बनाए रखना है।
    • नाटो के अनुच्छेद V में निहित सामूहिक रक्षा सिद्धांत में कहा गया है कि "एक सहयोगी के खिलाफ हमले को सभी सहयोगियों के खिलाफ हमले के रूप में माना जाएगा"।
  • नाटो की सेनाएँ: नाटो के पास एक सैन्य और नागरिक मुख्यालय और एक एकीकृत सैन्य कमान संरचना है, लेकिन इसके पास बहुत कम बल या संपत्ति विशेष रूप से इसकी अपनी हैं।
    • जब तक कि सदस्य देश नाटो से संबंधित कार्यों को करने के लिये सहमत नहीं हो जाते अधिकांश बल पूर्ण रूप से राष्ट्रीय कमान और नियंत्रण में रहते हैं।
  • नाटो के निर्णय: एक "नाटो निर्णय" सभी 30 सदस्य देशों की सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति है क्योंकि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिये जाते हैं।

नाटो के प्रदर्शन का विश्लेषण:

  • शीत युद्ध काल: नाटो "यूरो-अटलांटिक क्षेत्र" को सोवियत विस्तार से बचाने और दो महाशक्तियों के बीच युद्ध को रोकने के अपने मिशन में पूरी तरह से सफल रहा।
    • वर्ष 1955 में नाटो और उसके सोवियत समकक्ष ‘वारसॉ पैक्ट’ के गठन से शीत युद्ध के युग (लगभग 1945 से 1991 तक) का प्रारंभ हुआ।
  • शीत युद्ध के बाद का युग: जब वर्ष 1991 में सोवियत संघ का पतन हुआ तो नाटो के सामूहिक सुरक्षा के प्रतिमान में बदलाव देखा गया।
    • जब वर्ष 1999 में बाल्कन संघर्ष छिड़ गया, तो नाटो को शीत युद्ध के बाद यूरोप में अपनी उपयोगिता साबित करने का मौका मिला।
  • पारस्परिक रूप से लाभकारी व्यवस्था:
    • यूरोप के लिये यह एक आकर्षक समझौता था, जहाँ स्वायत्तता में मामूली नुकसान के बदले इसे सस्ते मूल्य पर पूर्ण सुरक्षा मिलती थी।
      • रक्षा पर बड़े पैमाने पर खर्च न करने से यूरोप को शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने और एक मज़बूत कल्याणकारी राज्य में अपने अधिशेष का निवेश करने की अनुमति मिली।
    • नाटो ने जर्मनी को नीचे रखने के अतिरिक्त बोनस की भी पेशकश की जो ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिये एक प्रमुख कारक था।
    • यूरोपीय लोगों द्वारा स्वयं संगठित और प्रबंधित एक सामूहिक सैन्य बल अमेरिकी निरीक्षण से बाहर निकलने का रास्ता पेश कर सकता है।
      • हालाँकि इसने जर्मनी या फ्राँस जैसे एक या दो मज़बूत और धनी राज्यों के जोखिम का सामना किया।

नाटो और चीन:

  • नाटो नेताओं द्वारा चीन को लगातार सुरक्षा चुनौती घोषित किया गया है और बताया गया है कि चीनी वैश्विक व्यवस्था को कमज़ोर करने के लिये काम कर रहे हैं।
    • यह अमेरिकी राष्ट्रपति के चीन के व्यापार, सैन्य और मानवाधिकार प्रथाओं के खिलाफ अधिक एकीकृत प्रयासों के अनुरूप है।
    • अमेरिका का बढ़ता विश्वास यह है कि चीन उसके वैश्विक वर्चस्व के लिये खतरा है और उसे नियंत्रित किया जाना चाहिये।
  • हालाँकि फ्राँस और जर्मनी दोनों ने नाटो की आधिकारिक स्थिति और चीन की अपनी धारणा के बीच कुछ दूरी बनाने की मांग की।
    • नाटो के यूरोपीय सदस्य राज्य चीन को एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी और विरोधी के रूप में देख सकते हैं, लेकिन वे इस अमेरिकी विचार से सहमत नहीं हैं कि यह एक पूर्ण सुरक्षा खतरा है।
  • चीन का रुख: इसने नाटो से चीन के विकास को तर्कसंगत रूप से देखने, 'चीनी खतरे के सिद्धांत' के विभिन्न रूपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से रोकने और चीन के वैध हितों तथा कानूनी अधिकारों का उपयोग समूह राजनीति में कृत्रिम रूप से टकराव पैदा करने के बहाने के रूप में नहीं करने का आग्रह किया है।

नाटो और रूस:

  • रूस के साथ तनाव पूर्व की ओर विस्तार करने के लिये नाटो के प्रयासों का एक अनिवार्य परिणाम है जिसे रूस अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में मानता है।
    • यूक्रेन, जॉर्जिया और माल्डोवा जैसे देशों को नाटो की छत्रछाया में लाने की कोशिश ने रूस के साथ टकराव को जन्म दिया है।
  • जैसा कि रूस ने क्रीमिया, जॉर्जिया और माल्डोवा में सैनिकों को तैनात करके अपने हितों की रक्षा करने की मांग की, नाटो ने उस पर गैर-ज़िम्मेदाराना तरीके से काम करने और "नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था" को तोड़ने का आरोप लगाया।

निष्कर्ष:

चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही पश्चिमी बाज़ारों के साथ गहराई से एकीकृत है। इसके बावजूद चीन को 'खतरा' माना जा रहा है। यह देखा जाना बाकी है कि वर्तमान यूरोप नाटो के निर्णयों को किस प्रकार वरीयता देगा।

स्रोत- द हिंदू

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