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भारतीय अर्थव्यवस्था

निर्माण-परिचालन-हस्तांतरण मॉडल

  • 16 Jul 2022
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

निवेश मॉडल, NHAI, सार्वजनिक-निजी भागीदारी

मेन्स के लिये:

निवेश के विभिन्न मॉडल, सार्वजनिक-निजी भागीदारी का महत्त्व और चुनौतियांँ, बुनियादी ढांँचे के निर्माण में निवेश मॉडल की भूमिका।

चर्चा में क्यों?

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने वर्ष 2022 की तीसरी तिमाही के दौरान सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत निर्माण-परिचालन-हस्तांतरण (Build-Operate-Transfer) मॉडल का उपयोग करके निजी साझेदारों को कम-से-कम दो राजमार्ग उन्नयन परियोजनाओं की पेशकश करने की योजना बनाई है।

निर्माण-परिचालन-हस्तांतरण (BOT) मॉडल:

  • परिचय:
    • BOT मॉडल के तहत एक निजी साझेदार को निर्दिष्ट अवधि (20 या 30 वर्ष की रियायत अवधि) के लिये एक परियोजना के वित्तीयन, निर्माण और संचालन के लिये रियायत दी जाती है, जिसमें निजी साझेदार उपयोगकर्त्ता शुल्क या सुविधा का उपयोग करने वाले ग्राहकों से टोल के माध्यम से निवेश की भरपाई करता है और इस प्रकार एक निश्चित मात्रा में वित्तीय जोखिम उठाता है।
    • BOT एक निजी-सार्वजनिक भागीदारी (Public Private Partnership) मॉडल है जिसके अंतर्गत निजी साझेदार पर अनुबंधित अवधि के दौरान ढांँचागत परियोजना के डिज़ाइन, निर्माण एवं परिचालन की पूरी ज़िम्मेदारी होती है।
      • निजी क्षेत्र के भागीदार को परियोजना के लिये वित्तीयन के साथ ही इसके निर्माण और रखखाव की ज़िम्मेदारी लेनी होती है।
    • सरकार ने रियायत अवधि के दौरान पूर्व के प्रति 10 वर्ष की जगह अब प्रति 5 वर्ष पर परियोजना की राजस्व क्षमता का आकलन करने का निर्णय लिया है।
      • इसका अर्थ होगा कि निजी कंपनी के लिये राजस्व की निश्चितता सुनिश्चित करने हेतु रियायत अवधि (या अवधि जब तक सड़क डेवलपर्स टोल एकत्र कर सकते हैं) को अनुबंध अवधि पूर्ण होने से पूर्व बढ़ाया जा सकेगा।
  • कार्य प्रक्रिया:
    • निर्माण:
      • इसके अंतर्गत निजी कंपनी (या संघ) सार्वजनिक बुनियादी ढांँचा परियोजना में निवेश करने के लिये सरकार से सहमत होने पर परियोजना के निर्माण के लिये वित्तपोषण करती है।
    • परिचालन:
      • इसके अंतर्गत निजी साझेदार एक सहमत रियायत अवधि के लिये सुविधा का संचालन, रखरखाव और प्रबंधन करता है तथा शुल्क या टोल के माध्यम से अपने निवेश की वसूली करता है।
    • हस्तांतरण:
      • इसके अंतर्गत रियायती अवधि के बाद कंपनी सरकार या संबंधित राज्य प्राधिकरण को सुविधा के स्वामित्व और संचालन का हस्तांतरण करती है।

BOT मॉडल का महत्त्व और चुनौतियाँं :

  • लाभ:
    • परियोजना के निर्माण, संचालन और रखरखाव के लिये वित्त जुटाने और सर्वोत्तम प्रबंधन कौशल का उपयोग करने में सरकार को निजी क्षेत्र का लाभ मिलता है।
    • निजी भागीदारी भी सर्वोत्तम उपकरणों का उपयोग करके दक्षता और गुणवत्ता सुनिश्चित करती है
    • BOT उद्यमों को प्रदर्शन-आधारित अनुबंधों और निर्गत-उन्मुख लक्ष्यों के माध्यम से दक्षता में सुधार करने के लिये तंत्र और प्रोत्त्साहन प्रदान करता है।
    • परियोजनाएँ पूरी तरह से प्रतिस्पर्द्धी बोली की स्थिति में संचालित की जाती हैं और इस प्रकार न्यूनतम संभव लागत पर पूरी की जाती हैं।
    • परियोजना के जोखिम निजी क्षेत्र द्वारा साझा किये जाते हैं।
  • चुनौतियाँं:
    • वित्तपोषण के इक्विटी हिस्से में लाभ का घटक निहित है, जो ऋण लागत से अधिक होता है। यह वह कीमत है जो निजी क्षेत्र को जोखिम से निपटने के लिये चुकाई जाती है।
    • BOT वित्तपोषण समझौते को तैयार करने और समाप्त करने में काफी समय एवं अग्रिम खर्च करना पड़ सकता है क्योंकि इसमें कई संस्थाएँ शामिल होती हैं और इसके लिये अपेक्षाकृत जटिल कानूनी तथा संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता होती है। ऐसें में छोटी परियोजनाओं के लिये BOT उपयुक्त नहीं है।
    • यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक संस्थागत क्षमता विकसित करने में समय लग सकता है कि BOT के पूर्ण लाभ प्राप्त हों, जैसे कि पारदर्शी और निष्पक्ष बोली और मूल्यांकन प्रक्रियाओं का विकास तथा प्रवर्तन एवं कार्यान्वयन के दौरान संभावित विवादों का समाधान।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP):

  • परिचय:
    • PPP सार्वजनिक संपत्ति और/या सार्वजनिक सेवाओं के प्रावधान के लिये सरकारी एवं निजी क्षेत्र के बीच एक व्यवस्था है।
    • सार्वजनिक-निजी भागीदारी बड़े पैमाने पर सरकारी परियोजनाओं, जैसे- सड़कों, पुलों और अस्पतालों को निजी वित्तपोषण के साथ पूरा करने की अनुमति देती है।
    • इस प्रकार की साझेदारी में निजी क्षेत्र की संस्था द्वारा एक निर्दिष्ट अवधि के लिये निवेश किया जाता है।
    • समय पर एवं बजट के भीतर काम पूरा करने के लिये निजी क्षेत्र की प्रौद्योगिकी और नवाचार के साथ सार्वजनिक क्षेत्र के प्रोत्साहन के संयोजन से इस साझेदारी को सुनिश्चित किया जा सकता है।
    • चूँकि PPP में सेवाएँ प्रदान करने के लिये सरकार द्वारा ज़िम्मेदारी का पूर्ण प्रतिधारण शामिल है, इसलिये यह निजीकरण के समान नहीं है।
    • इसमें निजी क्षेत्र और सार्वजनिक इकाई के बीच जोखिम का सुपरिभाषित आवंटन शामिल है।
  • चुनौतियाँं:
    • PPP परियोजनाओं के समक्ष मौजूदा अनुबंधों में विवाद, पूंजी की अनुपलब्धता और भूमि अधिग्रहण से संबंधित नियामक बाधाएँ जैसे मुद्दे मौजूद हैं।
    • मेट्रो परियोजनाएँ क्रोनी कैपिटलिज़्म से ग्रसित हो जाती हैं और निजी कंपनियों द्वारा भूमि एकत्रण करने का एक साधन बन जाती हैं।
    • माना जाता है कि बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिये ऋण प्रदान करने में भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के गैर-निष्पादित परिसंपत्ति पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा शामिल है।
    • PPP में फर्म कम राजस्व या लागत में वृद्धि जैसे कारणों का हवाला देकर अनुबंधों पर फिर से बातचीत करने के लिये हर अवसर का उपयोग करती है।
    • बार-बार होने वाली बातचीत के परिणामस्वरूप सार्वजनिक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा इसमें समाप्त हो जाता है।

PPP के कुछ अन्य मॉडल:

  • इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC):
    • इस मॉडल के तहत लागत पूरी तरह से सरकार द्वारा वहन की जाती है। सरकार निजी कंपनियों से इंजीनियरिंग कार्य के लिये बोलियाँ आमंत्रित करती है। कच्चे माल की खरीद और निर्माण लागत सरकार द्वारा वहन की जाती है।
  • हाइब्रिड वार्षिकी मॉडल (HAM):
    • भारत में नया HAM BOT-एन्युइटी और EPC मॉडल का मिश्रण है। डिज़ाइन के अनुसार, सरकार वार्षिक भुगतान के माध्यम से पहले पाँच वर्षों में परियोजना लागत का 40% योगदान देगी। शेष भुगतान सृजित परिसंपत्तियों और विकासकर्त्ता के प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा।
  • बिल्ड-ओन-ऑपरेट (BOO):
    • इस मॉडल में नवनिर्मित सुविधा का स्वामित्व निजी पार्टी के पास रहेगा।
    • पारस्परिक रूप से नियमों और शर्तों पर सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदार परियोजना द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं की 'खरीद' करने पर सहमति बनाई जाती है।
  • बिल्ड-ओन-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOOT):
    • BOOT के इस प्रकार में समय पर बातचीत के बाद परियोजना को सरकार या निजी ऑपरेटर को स्थानांतरित कर दिया जाता है।
    • BOOT मॉडल का उपयोग राजमार्गों और बंदरगाहों के विकास के लिये किया जाता है।
  • बिल्ड-ओन-लीज़-ट्रांसफर (BOLT):
    • इस मॉडल में सरकार निजी साझेदार को सार्वजनिक हित की सुविधाओं के निर्माण हेतु कुछ रियायतें देती है, साथ ही इसके डिज़ाइन, स्वामित्त्व, सार्वजनिक क्षेत्र के पट्टे का अधिकार भी देती है।
  • डिज़ाइन-बिल्ड-फाइनेंस-ऑपरेट (DBFO):
    • इस मॉडल में अनुबंधित अवधि के लिये परियोजना के डिज़ाइन, उसके विनिर्माण, वित्त और परिचालन का उत्तरदायित्त्व निजी साझीदार पर होता है। 
  • लीज़-डेवलप-ऑपरेट (LDO):
    • इस प्रकार के निवेश मॉडल में या तो सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के पास नवनिर्मित बुनियादी ढाँचे की सुविधा का स्वामित्व बरकरार रहता है और निजी प्रमोटर के साथ लीज़ समझौते के रूप में भुगतान प्राप्त किया जाता है। इसका पालन अधिकतर एयरपोर्ट सुविधाओं के विकास में किया जाता है।

भारत में बुनियादी ढाँचा क्षेत्र के लिये पहल:

  • राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन
    • NIP बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं पर आगे के दृष्टिकोण को सुनिश्चित करेगा जो रोज़गार सृजन, जीवनयापन में सुधार और सभी के लिये बुनियादी ढाँचे तक समान पहुँच की सुविधा प्रदान करेगा जिससे अधिक समावेशी विकास होगा।
    • इसमें ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड दोनों परियोजनाएँ शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन:
    • इसका उद्देश्य ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में निजी क्षेत्र को शामिल करना और उन्हें राजस्व अधिकार हस्तांतरित करना है, हालाँकि इसके तहत परियोजनाओं के स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं किया जाएगा, साथ ही इसके माध्यम से उत्पन्न पूंजी का उपयोग देश भर में बुनियादी अवसंरचनाओं के निर्माण के लिये किया जाएगा।
  • राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक:
    • इसमें पूरी तरह से या आंशिक रूप से भारत में अवस्थित अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के लिये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उधार देना, निवेश करना या निवेश को आकर्षित करना शामिल है।
    • इसमें अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिये बॉण्ड, ऋण और व्युत्पन्नों (डेरिवेटिव्स) के बाज़ार के विकास में मदद करना शामिल है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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