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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत में कृषि उत्पादकता

  • 12 Nov 2019
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये

PM-KISAN, APMC क्या है?

मेन्स के लिये

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान।

संदर्भ :

भारत के पास चीन की तुलना में अधिक कृषि योग्य भूमि, कुल सिंचित क्षेत्र तथा सकल बुआई क्षेत्र है। इसके बावजूद भारत चीन से कृषि उत्पादन के मामले काफी पीछे है।

मुख्य बिंदु :

  • भारत तथा चीन दोनों देशों ने 1960 के दशक के मध्य में अपने उपलब्ध क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने के लिये आधुनिक तकनीक के प्रयोग का प्रारंभ किया। जिसके तहत उच्च उत्पादक किस्म (High Yield Variety-HYV) के बीजों, कुल सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि एवं रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया।

भारत-चीन तुलना (कृषि क्षेत्र में)

चीन भारत
कृषि योग्य भूमि 120 मिलियन हेक्टेयर 156 मिलियन हेक्टेयर
कुल सिंचित क्षेत्र 41 प्रतिशत 48 प्रतिशत
सकल बुआई क्षेत्र 166 मिलियन हेक्टेयर 198 मिलियन हेक्टेयर
कृषि उत्पादन (कीमतें डॉलर में) 1367 बिलियन डॉलर 407 बिलियन डॉलर
  • उपरोक्त आँकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि चीन ने भारत की तुलना में कृषि उत्पादकता में अधिक प्रगति की है। चीन में बढ़ते कृषि उत्पादन के लिये निम्नलिखित तीन कारक महत्त्वपूर्ण हैं जिससे भारत को सीख लेना चाहिये।
  1. कृषि संबंधी नवाचार, अनुसंधान एवं विकास में अधिक निवेश।
  2. कृषि बाज़ारों में सुधार के माध्यम से किसानों को अधिक लाभ प्रदान करना।
  3. प्रत्यक्ष आय सहायता योजना (Direct Income Support Scheme)।

1. कृषि संबंधी नवाचार, अनुसंधान एवं विकास

(Research & Development-R&D)

  • चीन द्वारा कृषि ज्ञान तथा नवाचार प्रणाली (Agriculture Knowledge and Innovation System-AKIS), जो कृषि संबंधी अनुसंधान तथा विकास के लिये जिम्मेदार है, के लिये वर्ष 2018-19 में 7.8 बिलियन डॉलर का निवेश किया गया, इसके विपरीत भारत ने इस क्षेत्र में मात्र 1.4 बिलियन डॉलर का निवेश किया।
  • कृषि संबंधी अनुसंधान एवं शिक्षा (Agricultural Research & Education: Agri-R&E) पर होने वाले निवेश का सकल घरेलु उत्पाद (Gross Domestic Product-GDP) पर क्या प्रभाव पड़ता है? इस विषय पर हुए एक शोध के माध्यम से यह पता चला कि यदि हम Agri-R&E पर 1 रुपए का निवेश करते हैं तो कृषि GDP में 11.2 रुपए की वृद्धि होती है। यदि हम Agri-R&E पर 10 लाख रुपए का निवेश करते हैं तो इससे 328 लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला जा सकता है।
  • चीन अपने कृषि-सकल मूल्य वर्धन (Agri-Gross Value Added) का 0.35 प्रतिशत Agri-R&E पर खर्च करता है जबकि भारत में यह खर्च 0.8 प्रतिशत है।
  • R&D पर किये गए उच्च निवेश से निर्मित बीजों के लिये अधिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। वर्ष 2016 में चीन में उर्वरक की खपत 503 किग्रा./हेक्टेयर थी, जबकि भारत के लिये यह खपत उसी वर्ष 166 किग्रा./हेक्टेयर की थी।
  • अतः कृषि संबंधी उत्पादन में वृद्धि के लिए भारत को Agri-R&E पर निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।

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2. कृषि बाज़ारों में सुधार के माध्यम से किसानों को अधिक लाभ प्रदान करना:

  • चीन, उत्पादक सहायता अनुमान (Producer Support Estimates-PSEs) द्वारा किसानों को प्रोत्साहन राशि प्रदान करता है। इस मामले में चीन की स्थिति भारत से बेहतर है।
  • PSE संकल्पना विश्व के उन 52 देशों द्वारा अपनाई गई है जिनका विश्व के कुल कृषि उत्पादन में तीन-चौथाई का योगदान है। इसके तहत कृषि उपज से प्राप्त उस निर्गत मूल्य (Output Price) की गणना की जाती है जो कि किसान को मुक्त व्यापार की स्थिति में प्राप्त होती। इसमें किसानों द्वारा प्राप्त की गई लागत सब्सिडी (Input Subsidy) को भी शामिल किया जाता है।
  • चीन के किसानों के लिये PSE, उनके सकल फार्म प्राप्तियों (Gross Farm Receipts) के तीन वर्षों के औसत (Triennium Average Ending-TE) का 2018-19 में 15.3 प्रतिशत था। वहीं भारतीय किसानों के परिप्रेक्ष्य में इसी अवधि के दौरान -5.7 प्रतिशत था। इसका अर्थ यह है कि भारत का किसान, उसे प्राप्त होने वाली सब्सिडी से अधिक कर देता है।
  • निगेटिव PSE का अर्थ है कि भारतीय किसानों को प्रतिबंधित बाज़ार तथा व्यापार नीतियों के कारण उनकी उपज की सही कीमत नहीं प्राप्त होती जो उन्हें मुक्त बाज़ार की परिस्थितियों में प्राप्त होती।
  • कृषि बाज़ार से संबंधित इन कमियों को दूर करने के लिये भारत को बृहत् पैमाने पर कृषि उत्पाद बाज़ार समिति (Agricultural Produce Market Committee-APMC) तथा अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) में सुधार करने की आवश्यकता है।

3. प्रत्यक्ष आय सहायता योजना

(Direct Income Support Scheme):

  • चीन ने अपनी कई महत्वपूर्ण लागत सब्सिडियों को एक एकल योजना में समायोजित कर दिया है। जिसके तहत किसानों को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रत्यक्ष भुगतान किया जाता है तथा फसल उगाने में हुई कुल लागत को बाज़ार मूल्यों के आधार पर तय किया जाता है। इस क्षेत्र में चीन ने वर्ष 2018-19 के दौरान 20.7 बिलियन डॉलर का निवेश किया।
  • वहीं भारत ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi: PM-KISAN) योजना के तहत प्रत्यक्ष आय सहायता में मात्र 3 बिलियन डॉलर का निवेश किया।
  • इसके विपरीत उर्वरक, विद्युत, सिंचाई, बीमा तथा ऋणों पर दी जाने वाली सब्सिडी पर 27 बिलियन डॉलर का निवेश किया। इस प्रकार का निवेश न सिर्फ इन सब्सिडियों के प्रयोग की अक्षमता को दिखाता है बल्कि इससे पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।
  • चीन के तर्ज पर भारत को भी सभी लागत सब्सिडियों को समेकित कर देना चाहिये तथा उसके बदले में किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता देनी चाहिये। इससे भारतीय किसानों में क्षमता विकास तथा कृषि उत्पादन जैसे क्षेत्र में दूरगामी परिणाम होंगे।

स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस

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