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जैव विविधता और पर्यावरण

भारत ने किगाली संशोधन की पुष्टि करने का निर्णय लिया

  • 20 Aug 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

 रेफ्रिजरेंट हाइड्रोफ्लोरोकार्बन, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और किगाली संशोधन

मेन्स के लिये:

किगाली संशोधन का महत्त्व और भारत के लिये इसके निहितार्थ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने जलवायु-हानिकारक रेफ्रिजरेंट हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) को चरणबद्ध तरीके से कम करने के लिये मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में किगाली संशोधन के अनुसमर्थन को मंज़ूरी दी है।

  • यह संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन जैसे दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों और एचएफसी के उपभोक्ताओं द्वारा लिये गए निर्णयों के समकक्ष है। 122 देशों ने जुलाई 2021 के अंत तक किगाली संशोधन की पुष्टि की थी।

HFCs

प्रमुख बिंदु

परिचय:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और भारत अपने एचएफसी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने और उन्हें जलवायु-अनुकूल विकल्पों के साथ बदलने के लिये अलग-अलग समय सारिणी के साथ अलग-अलग देशों के समूहों में हैं।
  • भारत को वर्ष 2047 तक अपने एचएफसी उपयोग को 80% तक कम करना है, जबकि चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका को क्रमशः वर्ष 2045 एवं वर्ष 2034 तक समान लक्ष्य प्राप्त करना है।
  • भारत वर्ष 2032 से चार चरणों- वर्ष 2032 में 10%, वर्ष 2037 में 20%, वर्ष 2042 में 30% और वर्ष 2047 में 80% के साथ इस लक्ष्य को पूरा करेगा।
  • मौजूदा कानून ढाँचे में संशोधन, किगाली संशोधन के अनुपालन को सुनिश्चित करने हेतु हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के उत्पादन और खपत के उचित नियंत्रण की अनुमति देने वाले ओज़ोन क्षरण पदार्थ (विनियमन और नियंत्रण) नियम वर्ष 2024 के तहत किये जाएंगे।

पृष्ठभूमि:

  • वर्ष 1989 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक जलवायु समझौता नहीं है। इसका उद्देश्य क्लोरोफ्लोरो कार्बन (सीएफसी) जैसे ओज़ोन क्षरण पदार्थों से पृथ्वी की रक्षा करना है, जिनका उपयोग पहले एयर कंडीशनिंग और रेफ्रिजरेंट उद्योग में किया जाता था।
    •  CFCs के व्यापक उपयोग के कारण वायुमंडल की ओज़ोन परत में छेद हो गया था, जिससे कुछ हानिकारक विकिरण पृथ्वी तक पहुँच गए। इन विकिरणों को संभावित स्वास्थ्य खतरा माना जाता था।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने CFCs को हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी) में परिवर्तित कर दिया जो ओज़ोन परत को नष्ट नहीं करते हैं।
  • लेकिन बाद में उन्हें ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने में बेहद शक्तिशाली पाया गया। इस प्रकार आवास वित्त कंपनियों ने एक समस्या का तो समाधान किया, लेकिन वह दूसरी में प्रमुख रूप से योगदान दे रही थी।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के मूल प्रावधानों के तहत इन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता था, जो केवल ओडीएस को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिये था।
  • किगाली संशोधन ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को एचएफसी को अनिवार्य करने में सक्षम बनाया।
    • अक्तूबर 2016 में संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में 197 देशों ने किगाली, रवांडा में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत एचएफसी कटौती को चरणबद्ध करने के लिये  एक संशोधन को अपनाया।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में किगाली संशोधन:

  • किगाली संशोधन का उद्देश्य हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) के उत्पादन और खपत में कटौती कर उसे चरणबद्ध तरीके से कम करना है।
  • इसका लक्ष्य वर्ष 2047 तक HFCs खपत में 80% से अधिक की कमी करना है।
  • ओज़ोन परत के क्षरण पर इसके शून्य प्रभाव को देखते हुए HFCs का उपयोग वर्तमान में एयर कंडीशनिंग, प्रशीतन और फोम इन्सुलेशन में हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (एचसीएफसी) व क्लोरोफ्लोरोकार्बन  के प्रतिस्थापन के रूप में किया जाता है, हालाँकि ये शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं।
  • संशोधन के तहत:
    • विकसित देश वर्ष 2019 से HFCs की खपत कम करेंगे।
    • अधिकांश विकासशील देश वर्ष 2024 में खपत को स्थिर कर देंगे।
    • भारत सहित कुछ विकासशील देश अद्वितीय परिस्थितियों के साथ वर्ष 2028 में खपत को स्थिर कर देंगे।
  • यह योजना कुछ देशों को जलवायु-अनुकूल विकल्पों के संक्रमण में मदद करने हेतु वित्तपोषण भी प्रदान करती है।
  • किगाली संशोधन के साथ मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ और भी अधिक शक्तिशाली साधन बन गया है।

महत्त्व: 

  • पूर्व-औद्योगिक काल से वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को रोकने के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु यह महत्त्वपूर्ण उपकरण है।
  • सामूहिक कार्रवाई से ग्रीनहाउस गैसों के बराबर यानी 105 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के कम होने की उम्मीद है, जो वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को  0.5 डिग्री सेल्सियस तक कम करने में मदद कर सकता है, जबकि इसके बावज़ूद ओज़ोन परत के क्षरण को रोकने हेतु किये जाने वाले उपायों को जारी रखना होगा।
  • चूंँकि HFCs ओजज़ोन-क्षयकारी नहीं थे और वे मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत नियंत्रित पदार्थों में शामिल नहीं थे बल्कि वे समस्याग्रस्त ग्रीनहाउस गैसों का हिस्सा थे जिनके उत्सर्जन को जलवायु परिवर्तन उपकरणों जैसे- वर्ष 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल और वर्ष 2015 के पेरिस समझौते के माध्यम से कम करने की मांँग की गई थी।
    • लेकिन मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जलवायु परिवर्तन के साधनों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और सफल समझौता रहा है। इसके परिणामस्वरूप पहले ही 98.6% ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा चुका है। शेष 1.4% बचे हुए HCFCs पदार्थों को हटाने की प्रक्रिया जारी है।

भारत के लिये महत्त्व:

  • भारत जून 1992 में ओज़ोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का एक पक्ष देश बन गया और तब से भारत ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में होने वाले संशोधनों को अपनी मंज़ूरी दी है। भारत ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अनुसूची के अनुसार सभी ओज़ोन क्षयकारी पदार्थों को हटाने के लक्ष्यों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।
  • भारत वर्ष 2019 में कूलिंग एक्शन प्लान लॉन्च करने वाला विश्व का प्रथम देश है। इस व्यापक योजना का उद्देश्य कूलिंग डिमांड को कम करना, रेफ्रिजरेंट ट्रांज़िशन को सक्षम करना, ऊर्जा दक्षता को बढ़ाना और 20 वर्ष की समयावधि के साथ बेहतर प्रौद्योगिकी विकल्प उपलब्ध कराना है। 
    • किगाली संशोधन पर हस्ताक्षर बाज़ारों का HFCs से क्लीनर गैसों की और तेज़ी से झुकाव का एक संकेत है।
  • यह घरेलू विनिर्माण और रोज़गार सृजन लक्ष्यों को बढ़ावा देगा।
  • यह इस बात की पुष्टि करता है कि भारत ग्लोबल वार्मिंग को रोकने हेतु जलवायु अनुकूल रेफ्रिजरेंट हेतु बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये तैयार है, जो घरेलू नवाचार को बढ़ावा देगा और अंतर्राष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करेगा।
  • यह निर्णय भारत के लिये अपने जलवायु परिवर्तन शमन लक्ष्यों और शीतलन प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करेगा। भारत पेरिस समझौते के तहत अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने वाले देशों के समूह में शामिल है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

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