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फसल बीमा

  • 27 Aug 2021
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2.0

मेन्स के लिये:

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के क्रियान्वयन से संबंधित चुनौतियाँ एवं समाधान 

चर्चा में क्यों?   

सामान्य घरेलू बीमा कंपनियांँ उच्च दावों (High Claims) के कारण अपने नुकसान को कम करने के लिये प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) में अपने जोखिम को धीरे-धीरे कम कर रही हैं, जबकि केंद्र ने इस योजना को वैकल्पिक बना दिया है और इसमें दिये जाने वाले योगदान को भी कम कर दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के बारे में:
    • वर्ष 2016 में PMFBY को लॉन्च किया गया तथा कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रशासित किया जा रहा है।
      • राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (NAIS) और संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (MNAIS) को परिवर्तित कर दिया गया।
    • उद्देश्य: फसल के खराब होने की स्थिति में एक व्यापक बीमा कवर प्रदान करना जिससे किसानों की आय को स्थिर करने में मदद मिले।
    • क्षेत्र/दायरा: वे सभी खाद्य और तिलहनी फसलें तथा वार्षिक वाणिज्यिक/बागवानी फसलें, जिनके लिये पिछली उपज के आँकड़े उपलब्ध हैं।
    • बीमा किस्त: इस योजना के तहत किसानों द्वारा दी जाने वाली निर्धारित बीमा किस्त/प्रीमियम- खरीफ की सभी फसलों के लिये 2% और सभी रबी फसलों के लिये 1.5% है। वार्षिक वाणिज्यिक तथा बागवानी फसलों के मामले में बीमा किस्त 5% है। 
      • किसानों की देयता के बाद बची बीमा किस्त की लागत का वहन राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा सब्सिडी के रूप बराबर साझा किया जाता है।
      • हालाँकि पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में केंद्र सरकार द्वारा इस योजना के तहत बीमा किस्त सब्सिडी का 90% हिस्सा वहन किया जाता है।
    • कार्यान्वयन: पैनल में शामिल सामान्य बीमा कंपनियों द्वारा। कार्यान्वयन एजेंसी (आईए) का चयन संबंधित राज्य सरकार द्वारा बोली के माध्यम से किया जाता है।
    • PMFBY 2.0: PMFBY को वर्ष 2020 के खरीफ सीज़न में नया रूप दिया गया था। इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
      • पूर्ण रूप से स्वैच्छिक: वर्ष 2020 के खरीफ सीज़न से यह सभी किसानों हेतु वैकल्पिक है।
        • इससे पहले अधिसूचित फसलों के लिये फसल ऋण/किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) खाते का लाभ उठाने वाले ऋणी किसानों के लिये यह योजना अनिवार्य थी। 
      • केंद्रीय सब्सिडी की सीमा: कैबिनेट ने इस योजना के तहत प्रीमियम दरों को असिंचित क्षेत्रों/फसलों के लिये 30% और सिंचित क्षेत्रों/फसलों हेतु 25% तक सीमित करने का निर्णय लिया है। उल्लेखनीय है कि इन प्रीमियम दरों के आधार पर ही केंद्र सरकार द्वारा 50% सब्सिडी का वहन किया जाता है।
      • राज्यों को अधिक नम्यता: सरकार ने राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को PMFBY को लागू करने की छूट दी है और उन्हें किसी भी संख्या में अतिरिक्त जोखिम कवर/सुविधाओं का चयन करने का विकल्प दिया है।
      • IEC गतिविधियों में निवेश: बीमा कंपनियों को सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियों पर एकत्रित कुल प्रीमियम का 0.5% खर्च करना होता है।
  • पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना:
    • इस योजना को वर्ष 2006 में लॉन्च किया गया था तथा इसे कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रशासित किया जा रहा है।
    • उद्देश्य: वर्षा, तापमान, हवा, आर्द्रता आदि से संबंधित प्रतिकूल मौसम की स्थिति के परिणामस्वरूप प्रत्याशित फसल हानि के कारण वित्तीय नुकसान की संभावना के प्रति बीमित किसानों की कठिनाई को कम करना।
    • मानक: WBCIS मौसम के मापदंडों का उपयोग फसल की पैदावार के लिये "प्रॉक्सी" के रूप में करता है ताकि किसानों को फसल के नुकसान की भरपाई की जा सके।

कार्यान्वयन में चुनौतियाँ    

  • स्थिरता : बीमा बाजारों हेतु काम करने के लिये आवश्यक है - कम जोखिम और उन लोगों के बीच जोखिम में न्यून सहसंबंध।
    • चूँकि कार्यक्रम का उद्देश्य सूखे और बाढ़ के जोखिम को कवर करना है, इसलिये दोनों धारणाएँ गलत होने की संभावना है। 
    • ऐसा इसलिये है क्योंकि जब खराब मौसम प्रघात करता है, तो सभी क्षेत्रीय किसान प्रभावित होते हैं (उच्च सहसंबंध) और खराब मौसमी घटनाएँ उच्च होती हैं ( 5-7 साल में एक बार यानी 14% - 20% की हानि की संभावना होती है)।
    • PMFBY  के प्रीमियम दरों में 1.5-2% बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि शेष सरकार द्वारा सब्सिडी दी जा रही है। यह लंबी अवधि के लिये अनुकूल नहीं है और विशेष रूप से कम एमएसपी वाली फसलों के लिये जोखिम भरा है। 
  • स्थानीय  प्राधिकारियों की अक्षमता : इस योजना में फसल के नुकसान के आकलन के मामलों में कमी आई है, क्योंकि कई मामलों में ज़िला या ब्लॉक स्तर के कृषि विभाग के अधिकारी ज़मीन स्तर पर इस तरह के नमूने का संचालन नहीं करते हैं और केवल कागज़ पर औपचारिकताओं को पूरा नहीं करते हैं।
    • राज्य सरकारें बीमा मुआवज़े हेतु समय पर धन जारी करने में नाकाम रही हैं। यह इस योजना के व्यापक उद्देश्य को नुकसानपहुँचाता है जो कृषक समुदाय को समय पर वित्तीय सहायता प्रदान करना है। 
  • जागरूकता और शिकायत निवारण की कमी: किसानों में फसल बीमा योजनाओं के संदर्भ जागरूकता नहीं है। किसानों की शिकायतों के शीघ्र निपटान के लिये एक सुलभ शिकायत निवारण प्रणाली और निगरानी तंत्र ( केंद्र और राज्य सरकारों दोनों स्तर पर) की कमी है।
  • पहचान संबंधी मुद्दे: वर्तमान में PMFBY योजना बड़े और छोटे किसानों के बीच अंतर नहीं करती है और इस प्रकार पहचान के मुद्दे को भी सामने लाती है। छोटे किसान सर्वाधिक कमज़ोर वर्ग हैं।
  •  दावा निपटान संबंधी मुद्दे : बीमा कंपनियों की भूमिका और शक्ति महत्त्वपूर्ण है। कई मामलों में यह स्थानीयकृत आपदा के कारण हुए घाटे की जाँच नहीं करता था और इसलिये दावों का भुगतान नहीं किया जाता था।

आगे की राह:

  • जागरूकता बढ़ाना: जागरूकता पैदा करना योजना के सुचारू कार्यान्वयन की प्रमुख चुनौतियों में से एक है।
    • सरकार फसल बीमा योजनाओं के संदर्भ में किसानों में जागरूकता पैदा करने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचार अभियान/जागरूकता कार्यक्रमों के संचालन हेतु सभी हितधारकों विशेषकर राज्यों और बीमा कंपनियों को सक्रिय रूप से शामिल करने की मांग कर रही है।
  • व्यावहारिक परिवर्तन लाना: बीमा की लागत के संबंध में व्यावहारिक परिवर्तन लाने के लिये बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
  • छूट और सेवा वितरण को युक्तिसंगत बनाना: अनिवार्य आधार लिंकेज के साथ राज्य सरकारों द्वारा घोषित ऋण माफी योजनाओं को अधिक-से-अधिक कवरेज के साथ PMFBY को सक्षम करने के लिये युक्तिसंगत बनाया जाना चाहिये।
  • प्रौद्योगिकी की भूमिका: यदि स्थानीय मौसम पूर्वानुमान, सूखा जोखिम, रोग जोखिम, मिट्टी विश्लेषण डेटा जो अब प्रौद्योगिकी के साथ बहुत आसानी से उपलब्ध है, किसानों को उपलब्ध कराया जाता है, तो वे जोखिम से निपटने के लिये पहले से तैयार हो जाते हैं और बेहतर योजना बना सकते हैं, इस प्रकार उनके नुक्सान को कम किया जा सकता है।
    • यह डेटा स्थानीय स्तर पर आपदा विवादों को निपटाने में भी मदद कर सकता है, यह कार्य कभी-कभी मुश्किल हो सकता है।
    • प्रौद्योगिकी, बीमा कंपनियों को बेहतर तरीके से कार्य करने और प्रीमियम तथा निपटान कार्य को अधिक कुशलता से संभालने में सक्षम बना सकती है।
  • बीड मॉडल: सरकार फसल बीमा योजना के 'बीड मॉडल' को लागू करने पर विचार कर सकती है। इस योजना के तहत बीमाकर्त्ता का संभावित नुकसान सीमित होता है।
    • बीमा फर्म को सकल प्रीमियम के 110 प्रतिशत से अधिक के दावों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती है। बीमाकर्त्ता को नुकसान (पूल राशि) से बचाने के लिये एकत्र किये गए प्रीमियम के 110 प्रतिशत से अधिक मुआवज़े की लागत राज्य सरकार को वहन करनी होगी।
    • हालाँकि यदि मुआवज़ा एकत्रित प्रीमियम से कम है, तो बीमा कंपनी इस राशि का 20% हैंडलिंग शुल्क के रूप में अपने पास रखेगी और शेष राशि की राज्य सरकार (प्रीमियम अधिशेष) को प्रतिपूर्ति करेगी।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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