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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-अफगान संबंधों में चुनौतियाँ

  • 21 May 2019
  • 13 min read

संदर्भ

भारत और अफगानिस्तान के संबंध बेहद मज़बूत और मधुर हैं। अफगानिस्तान जितना अपने तात्कालिक पड़ोसी पाकिस्तान के निकट नहीं है, उससे कहीं अधिक निकटता उसकी भारत के साथ है। भारत अफगानिस्तान में अरबों डॉलर लागत वाले कई मेगा प्रोजेक्ट्स पूरे कर चुका है और कुछ पर अभी भी काम चल रहा है। इसके विपरीत पाकिस्तान पर अफगानिस्तान अपने यहाँ आतंकवाद को प्रायोजित करने का आरोप लगाता रहता है। अफगानिस्तान के शीर्ष नेता समय-समय पर भारत दौरे पर आते रहते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में गर्मजोशी का पता चलता है। लेकिन समय-असमय ऐसी गतिविधियाँ भी होती रहती हैं जो दोनों देशों के संबंधों में चुनौती सी प्रतीत होती हैं।

अमेरिका के अपने हित हैं अफगानिस्तान में

कुछ समय पहले भारत-अफगान संबंध उस समय फिर चर्चा में आ गए थे जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान में भारत की भूमिका और उसके कार्यों पर उपहासात्मक टिप्पणी की थी। इसके अलावा, अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाने की बात कहकर वहाँ की खराब स्थिति के लिये भारत, रूस और पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया था। तब भारत ने ट्रंप के इस बयान का विरोध किया था।

ऐसे समय में जब अफगानिस्तान में भारत कई बड़ी अवसंरचना परियोजनाएँ और सामुदायिक विकास कार्यक्रम चला रहा है, तब अमेरिका के इस प्रकार के बयान हैरान करते हैं। लेकिन साथ ही सवाल भी उठता है कि अमेरिका के इस प्रकार के बयानों के मायने क्या हैं? सवाल यह भी है कि क्या ट्रंप के बयान को केवल एक हताश नेता के बयान के रूप में देखा जाए या वाकई भारत को अफगानिस्तान में कुछ और भी करने की ज़रूरत है? ट्रंप जब अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से हटाने की बात कहते है तब सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठ खड़े होते हैं। निश्चित ही ऐसी कोई भी स्थिति न केवल अफगानिस्तान, बल्कि भारत के लिये भी चिंता का विषय हो सकती है।

भारत-अफगान संबंध

दरअसल, अफगानिस्तान दक्षिण एशिया में भारत का अहम साथी है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध पारंपरिक रूप से मज़बूत और दोस्ताना रहे हैं। 1980 के दशक में भारत-अफगान संबंधों को एक नई पहचान मिली, लेकिन 1990 के अफगान-गृहयुद्ध और वहाँ तालिबान के सत्ता में आ जाने के बाद से दोनों देशों के संबंध कमज़ोर होते चले गए। इन संबंधों को एक बार फिर तब मजबूती मिली, जब 2001 में तालिबान सत्ता से बाहर हो गया...और इसके बाद अफगानिस्तान के लिये भारत मानवीय और पुनर्निर्माण सहायता का सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रदाता बन गया है।

अफगानिस्तान में भारत के पुनर्निर्माण के प्रयासों से विभिन्न निर्माण परियोजनाओं पर काम चल रहा है। भारत ने अब तक अफगानिस्तान को लगभग तीन अरब डॉलर की सहायता दी है जिसके तहत वहाँ संसद भवन, सड़कों और बांध आदि का निर्माण हुआ है। वहाँ कई मानवीय व विकासशील परियोजनाओं पर भारत अभी भी काम कर रहा है। यही वज़ह है कि मौजूदा वक्त में अफगानिस्तान में सबसे अधिक लोकप्रिय देश भारत को माना जाता है।

अफगानिस्तान के लिये महत्त्वपूर्ण है भारत

जहाँ तक राजनीतिक और सुरक्षा का सवाल है तो, भारत अफगान-संचालित और अफगान-स्वामित्‍व वाली शांति और समाधान प्रक्रिया के लिये अपने सहयोग को बराबर दोहराता रहा है। दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि अफगानिस्तान में शांति और स्थायित्व को प्रोत्साहित करने और हिंसक घटनाओं पर तत्काल लगाम लगाने के लिये ठोस और सार्थक कदम उठाए जाने चाहिये।

अगली पीढ़ी की ‘नई विकास भागीदारी’ पर काम करने की सहमति

  • भारत रणनीतिक भागीदारी के रूप में द्विपक्षीय विकास सहयोग को मान्यता देते हुए सामाजिक, आर्थिक, अवसंरचना और मानव संसाधन विकास के लिये अफगानिस्तान की भरपूर सहायता कर रहा है।
  • इन सहायताओं के अंतर्गत क्रियान्वित परियोजनाओं के सकारात्मक प्रभावों के मद्देनज़र दोनों देश एक महत्त्वाकांक्षी और दूरदर्शी अगली पीढ़ी की 'नई विकास भागीदारी' पर काम कर रहे हैं।

भारत द्वारा चलाई जाने वाली प्रमुख परियोजनाएँ

  • इस संदर्भ में दोनों देश अधिक प्रभाव वाली 116 सामुदायिक विकास परियोजनाओं पर काम करने के लिये सहमत हुए हैं जिन्हें अफगानिस्तान के 31 प्रांतों में क्रियान्वित किया जाएगा।
  • इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, पेयजल, नवीकरणीय ऊर्जा, खेल अवसंरचना और प्रशासनिक अवसंरचना के क्षेत्र भी शामिल हैं।
  • इसके तहत काबुल के लिये शहतूत बांध और पेयजल परियोजना (सिंचाई में भी सहायक) पर काम शुरू किया जाएगा।
  • अफगान शरणार्थियों के पुनर्वास को प्रोत्साहित करने के लिये नानगरहर प्रांत में कम लागत पर घरों का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है।
  • इनके अलावा, बामयान प्रांत में बंद-ए-अमीर तक सड़क संपर्क, परवान प्रांत में चारिकार शहर के लिये जलापूर्ति नेटवर्क और मजार-ए-शरीफ में पॉलीटेक्नीक के निर्माण में भी भारत सहयोग दे रहा है।
  • कंधार में अफगान राष्ट्रीय कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ANASTU) की स्थापना के लिये भी भारत ने सहयोग का भरोसा दिलाया है।
  • मई, 2017 में प्रक्षेपित दक्षिण एशियाई उपग्रह में अफगानिस्तान की भागीदारी से भारत रिमोट सेंसिंग प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों में अफगानिस्तान की और अधिक मदद कर रहा है।

इससे पता चलता है कि भारत कैसे अफगानिस्तान में मानवीय और विकासशील परियोजनाओं के विकास के लिये प्रतिबद्ध है, लेकिन सुरक्षा के मसलों पर क्या कुछ किया जा सकता है, यह अभी भी भारत के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

भारत के समक्ष सुरक्षा चुनौतियाँ

विकास के मोर्चे पर भारत अफगानिस्तान की लगातार मदद कर रहा है, लेकिन सुरक्षा के मोर्चे पर भारत ने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है। अमेरिकी सेना का अफगानिस्तान में रहना वहाँ की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। अमेरिकी सेना यदि अफगानिस्तान से चली जाती है तो वहाँ तालिबानियों का प्रभुत्व कायम हो जाने की आशंका है। ऐसे में भारत को अपने द्वारा वित्तपोषित विकास परियोजनाओं की भी चिंता होना स्वाभाविक है।

ऐसा माना जा रहा है कि अगर अफगानिस्तान की सेना कमज़ोर पड़ती है और तालिबान प्रभावी हो जाता है तो अफगानिस्तान में भारत की सारी मेहनत बेकार चली जाएगी। तब बड़ा सवाल यह उठेगा कि अपने हितों की सुरक्षा के लिये भारत को अफगानिस्तान की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ सकती है। और तब क्या भारत के लिये अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजना मुनासिब रहेगा? क्या भारत चाहेगा कि एक ऐसे देश में जहाँ वह विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देकर सबसे ज़्यादा लोकप्रिय बन चुका है, वहाँ अपनी सेना भेजकर अफगानिस्तान की अवाम के बीच किसी आशंका को जन्म दे?

जाहिर है इस मसले पर भारत को समझदारी से कदम उठाने की ज़रूरत है।

आगे की राह

  • गौरतलब है कि क्षेत्रीय सहयोग के लिये अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देश में शांति कायम होना बेहद जरूरी है। साथ ही यह भी जरूरी है कि एक पड़ोसी के रूप में भारत को अफगानिस्तान का साथ मिलता रहे। इसके लिये अफगानिस्तान में विकास कार्यों के अलावा भारत को अफगानिस्तान सहित अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने की ज़रूरत है।
  • जहाँ तक प्रश्न अफगानिस्तान की सुरक्षा का है तो भारत को चाहिये कि वह इस मुद्दे पर रूस और चीन से संवाद करने का प्रयास करे। एक अन्य उपाय यह हो सकता है कि यदि भारत चाहे तो संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से भी अफगानिस्तान में अपनी सेना भेज सकता है, लेकिन इसके लिये संयुक्त राष्ट्र को नेतृत्व की कमान संभालनी होगी।
  • भारत यह भी जानता है कि अफगानिस्तान में उसकी भूमिका को कम करने की नीति पर पाकिस्तान लंबे समय से काम कर रहा है। इसीलिये भारत पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिये सार्क के बजाय BIMSTEC, BBIN और IORA (Indian Ocean Rim Association) जैसे क्षेत्रीय समूहों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिये भारत को इसी तरह कूटनीतिक स्तर पर अपनी सक्रियता बनाए रखनी होगी।
  • कुछ समय पहले अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने रायसीना डायलॉग को संबोधित करते हुए कहा भी था कि रूस और अमेरिका की अगुवाई में शुरू की गई शांति प्रक्रिया में भारत को और सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है। भारत को सिर्फ इन दो देशों के साथ ही नहीं, बल्कि अपने स्तर पर भी अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिये कोशिश करनी चाहिये। भारत के सहयोग के बिना वहाँ कोई भी शांति प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती।
  • दूसरी तरफ यदि भारत चाहे तो तालिबान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे भी बढ़ा सकता है। नवंबर, 2018 में भारत की तरफ से दो रिटायर्ड राजनयिकों का तालिबान से बातचीत के लिये मास्को जाना इसी का एक पहलू है। इससे अफगानिस्तान की स्थायी सरकार में तालिबान की भूमिका तय की जा सकती है। लेकिन इस मुद्दे पर भारत को कोई भी कदम बेहद सोच-समझ कर उठाना होगा।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि जिस प्रकार अफगानिस्तान में पाकिस्तान का स्थायी एजेंडा वहाँ अपनी सामरिक पहुँच बनाना है, ठीक उसी प्रकार भारत के स्थायी लक्ष्य भी स्पष्ट हैं- अफगानिस्तान के विकास में लगे करोड़ों डॉलर व्यर्थ न जाने पाएँ, काबुल में मित्र सरकार बनी रहे, ईरान-अफगान सीमा तक निर्बाध पहुँच रहे और वहाँ के पाँचों वाणिज्य दूतावास बराबर काम करते रहें। इस एजेंडे की सुरक्षा के लिये भारत को अपनी कूटनीति में कुछ बदलाव करने भी पड़ें तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिये, क्योंकि यही समय की मांग है।

अभ्यास प्रश्न: अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने पर सुरक्षा के लिहाज से क्या-क्या चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं? क्या भारत को अपनी कूटनीति में बदलाव करने की ज़रूरत है? टिप्पणी कीजिये।

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