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झारखंड

स्थानीय नीति को लेकर प्रदर्शन

  • 23 Mar 2022
  • 2 min read

चर्चा में क्यों

21 मार्च, 2022 को ब्रिटिश हुकूमत के दौरान सन् 1932 में कराए गए भूमि सर्वे के आधार पर स्थानीय नीति (डोमिसाइल पॉलिसी) तय करने के मुद्दे पर आदिवासी-मूलवासी संगठनों से जुड़े हज़ारों युवाओं ने राँची में प्रदर्शन किया।

प्रमुख बिंदु 

  • आंदोलनकारियों का कहना है कि अलग झारखंड राज्य का निर्माण इस उद्देश्य के तहत हुआ था कि यहाँ के आदिवासियों और मूल निवासियों को सरकारी नौकरियों, संसाधनों और सुविधाओं में प्राथमिकता मिलेगी। किंतु, झारखंड बनने के लगभग दो दशक बाद भी ऐसा नहीं हो पा रहा है, क्योंकि यहाँ के संसाधनों और नौकरियों में दूसरे प्रदेशों से झारखंड में आकर बसे लोगों का प्रभुत्व कायम हो गया है।
  • इस आधार पर ही यह मांग हो रही है कि झारखंड का ‘स्थानीय व्यक्ति’(डोमिसाइल) सिर्फ उन लोगों को माना जाए, जिनके पास यह प्रमाण हो कि उनके पूर्वजों के नाम 1932 में ज़मीन संबंधी सर्वे के कागज़ात (खतियान) में शामिल हैं।
  • गौरतलब है कि 2016 में झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यकाल में परिभाषित स्थानीय नीति के अनुसार वर्ष 1985 से झारखंड में रहने वाले लोगों को झारखंड का स्थानीय निवासी माना गया है, किंतु वर्तमान सरकार ने इस नीति को व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी कर दिया है।
  • इस संदर्भ में बजट सत्र के दौरान पूछे गए सवाल पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि 1932 के खतियान के आधार पर पूर्व में बाबूलाल मरांडी की सरकार द्वारा बनाई गई नीति को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था, इसलिये इस मामले में वैधानिक परामर्श के बाद ही उनकी सरकार निर्णय लेगी।
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