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डेली न्यूज़

  • 15 Jan, 2019
  • 29 min read
जीव विज्ञान और पर्यावरण

रेल दुर्घटनाओं में 49 हाथियों की मृत्यु

चर्चा में क्यों?


हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change- MoEFCC) ने राज्यसभा में एक सांसद द्वारा पूछे गए प्रश्न का जवाब देते हुए संसद को बताया कि पिछले तीन वर्षों में 49 हाथी रेल दुर्घटनाओं में मारे गए।

क्या कहते हैं आँकड़े?

  • MOEFCC द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015-16 में 9, 2016-17 में 21 और 2017-18 में कुल 19 हाथियों की मौत रेल दुर्घटनाओं में हुई।
  • इन्ही तीन वर्षों के दौरान तीन बाघों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में, जबकि आठ बाघों की मौत रेल दुर्घटनाओं में हुई।
  • दिसंबर 2018 में गुजरात के अमरेली ज़िले में एक ट्रेन दुर्घटना में तीन शेरों की मौत हो गई थी। इससे पहले 2016-2018 के बीच रेलवे और सड़क दुर्घटनाओं में 10 शेरों की मौत हो गई थी।

fatal crossing

पश्चिम बंगाल और असम में हुई सर्वाधिक मौतें

  • ट्रेन की पटरियों पर मारे गए हाथियों की कुल संख्या 49 में से 37 हाथियों की मौत केवल दो राज्यों पश्चिम बंगाल और असम में हुई।
  • एक ओर जहाँ पश्चिम बंगाल में इस अवधि के दौरान रेल दुर्घटनाओं में हाथियों के मारे जाने की संख्या में कमी आई है वहीं असम में इस संख्या में वृद्धि हुई है।
रेल दुर्घटनाओं में मारे गए हाथियों की संख्या
वर्ष पश्चिम बंगाल असम
2015-16 05 03
2016-17 03 10
2017-18 02 14


मंत्रालय द्वारा किये गए प्रयास और उनका प्रभाव

  • 2016 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change- MOEFCC) ने ‘रैखिक-अवसंरचना के प्रभावों को कम करने के लिये पर्यावरण के अनुकूल उपाय ’ (Eco-friendly Measures to Mitigate Impacts of Linear Infrastructure) जारी किये, जो मानव-पशु संघर्षों को कम करने के लिये एक सलाहकारी दस्तावेज़ है।
  • मंत्रालय के अलावा कई अन्य संरक्षणवादियों और संगठनों द्वारा जारी किये गए दस्तावेज़ों के बावजूद भी सड़क और रेल दुर्घटनाओं में जंगली जानवरों की मौत बेरोक-टोक जारी हैं।
  • मंत्रालय के अनुसार, ट्रेन दुर्घटनाओं से होने वाली हाथियों की मौत की संख्या को कम करने के लिये एहतियाती उपाय लागू करने के उद्देश्य से एक के बाद एक कई नोटिस जारी किये गए हैं जिसमें 28 दिसंबर, 2016 को जारी मुख्य वन्यजीव वार्डन (Chief Wildlife Wardens) नोटिस भी शामिल है।

निष्कर्ष : जोस लुईस, वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (Wildlife Trust of India-WTI) के संरक्षणविद, जिसने सडकों पर होने वाली मौतों की निगरानी के लिये एक मोबाइल एप विकसित किया है, के अनुसार, जब रेल और सड़क बुनियादी ढाँचा विकसित किया गया था उस समय कभी नहीं सोचा गया होगा कि यह इतने जानवरों की मृत्यु का कारण बन सकता है।


स्रोत : द हिंदू


जीव विज्ञान और पर्यावरण

जल अलवणीकरण संयंत्र पर्यावरण के लिये हानिकारक : UN

चर्चा में क्यों?


हाल ही में UN (United Nation) की एक रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया भर में संचालित अलवणीकरण संयंत्रों (Desalination Plants) से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचा रहा है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • हाल ही में UN की एक रिपोर्ट में पाया गया कि दुनिया भर में संचालित लगभग 16,000 अलवणीकरण संयंत्रों से निकलने वाले अत्यधिक लवणीय अपशिष्ट जल और विषाक्त रसायन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचा रहे हैं।
  • रिपोर्ट के अनुसार, अलवणीकरण संयंत्र (Desalination Plants) प्रतिदिन 142 मिलियन क्यूबिक मीटर लवण (पिछले अनुमानों की तुलना में 50% अधिक शुद्ध जल प्राप्त करने के लिये) का उत्पादन करते हैं।
  • उच्च लवणीय जल को अधिकतर समुद्र में प्रवाहित किया जाता है, जो समुद्र में एक वर्ष में लगभग एक फीट की तेज़ी से इकठ्ठा हो रहे हैं। इसके फलस्वरूप वहाँ शुष्क क्षेत्रों का निर्माण हो रहा है।
  • कनाडा स्थित ‘इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरमेंट एंड हेल्थ’ (Institute for Water, Environment and Health) के अध्ययन के अनुसार सऊदी अरब (Saudi Arabia), संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) और कतर (Qatar) में समुद्री जल को संशोधित करने वाले विलवणीकरण संयंत्रों से लगभग 55% ब्राइन (Brine-खारा जल) का उत्पादन होता है।
  • ब्राइन में लगभग 5% नमक एवं विषैले पदार्थ जैसे - क्लोरीन और तांबा इत्यादि होते हैं, जो अलवणीकरण में उपयोग किये जाते हैं। इसके विपरीत वैश्विक समुद्री जल में मात्र 3.5% (के लगभग) नमक/लवण पाया जाता है।
  • रिपोर्ट के अनुसार, ब्राइन समुद्री मछलियों, केकड़ों और अन्य समुद्री जीवों एवं वनस्पतियों के लिये अत्यंत हानिकारक है, क्योंकि इससे समुद्री जल में विद्यमान ऑक्सीजन का स्तर भी कम हो सकता है, जिसका खाद्य श्रृंखला पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है।
  • पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना बढ़ती आबादी के लिये ताज़े पानी को सुरक्षित करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है जिसके सम्बन्ध में पर लगातार शोधकार्य किये जा रहे हैं।

अलवणीकरण प्रक्रिया


इस प्रक्रिया में लवणीय जल से लवण एवं अन्य खनिज पदार्थों/घटकों को अलग करके शुद्ध जल प्राप्त किया जाता है।


स्रोत – द हिंदू


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

यूएई खाद्य की मांग को पूरा करने हेतु फसल उगाएगा भारत

चर्चा में क्यों?


भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) खाद्य सुरक्षा से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये ‘कृषि-से-बंदरगाह’ (farm-to-port) विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन ज़ायद की भारत यात्रा के दौरान जारी एक संयुक्त बयान में दोनों देशों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि खाद्य सुरक्षा दोनों पक्षों के लिये उच्च प्राथमिकता क्षेत्र है।

  • प्रमुख बिंदु
  • हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु ने घोषणा की कि UAE और सऊदी अरब ने अपनी खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिये भारत को एक आधार के रूप में उपयोग करने का फैसला किया है।
  • पहली बार भारत की निर्यात नीति के अंतर्गत बागवानी, डेयरी, वृक्षारोपण और मत्स्य पालन के साथ-साथ कृषि क्षमता की पहचान की गई है।

फार्म-टू-पोर्ट प्रोजेक्ट

  • फ़ार्म-टू-पोर्ट प्रोजेक्ट एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के समान होगा। इसके तहत UAE बाज़ार को ध्यान में रखते हुए एक सामूहिक एवं संगठित कृषि की शैली में विशिष्ट फसलों को उगाया जाएगा।
  • इस अवधारणा को दोनों देशों की सरकारों ने स्वीकार किया है।
  • खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना दोनों देशों के लिये उच्च प्राथमिकता का क्षेत्र रहा है, जिसमें 2015 से सुधार जारी है।
  • इसके अतिरिक्त UAE में खाद्य सुरक्षा पार्कों की स्थापना संबंधी एक प्रस्ताव भी पेश किया गया है, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य प्रसंस्करण हेतु बुनियादी ढाँचे का विकास, एकीकृत कोल्ड चेन का निर्माण, मूल्य संवर्द्धन, संरक्षण प्रौद्योगिकी, खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विपणन आदि शामिल है।

लाभ

  • निर्यात नीति से महाराष्ट्र के नासिक में अंगूर, रत्नागिरी/सिंधुदुर्ग में आम, नागपुर में संतरे तथा लासलगाँव में प्याज का निर्यात होने से वहाँ के किसानों को विशेष रूप से लाभ प्राप्त होगा।
  • इससे दोनों देशों के मध्य संबंधों में मज़बूती आएगी। साथ ही निर्यात में वृद्धि होने से किसानों के साथ-साथ देश की आर्थिक संवृद्धि में भी इज़ाफा होगा।

भारत में निवेश के संदर्भ में वैश्विक रूझान

  • पिछले कुछ समय से अर्जेंटीना, उत्तरी अमेरिका, यूरोप, एशिया और कोरिया आदि कई देशों ने भारतीय लॉजिस्टिक क्षेत्र में निवेश करने में अपनी रुचि दिखाई है।
  • जहाँ एक ओर विश्व की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ भारत में निवेश करना चाहती हैं, वहीँ दूसरी ओर भारत मध्य अफ्रीकी राष्ट्र अंगोला में निवेश की योजना बना रहा है।
  • जैसा कि हम जानते हैं कि अंगोला खनिज भंडार में समृद्ध है। ऐसे में अंगोला में अपनी स्थिति को मज़बूत आधार प्रदान करने के लिये भारत एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक ऑफ इंडिया के ज़रिये यहाँ निवेश की योजना बना रहा है। ऐसे में यह पहल देश के आर्थिक विकास में सहायक होगा।
  • भारत निर्यात के लिये तैयार है। खाड़ी क्षेत्र से बड़ी खरीदारी संभव है। UAE जैविक और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में निवेश करना चाहता है। यहाँ किसानों को उत्पादन लागत का 150% न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में पहले से ही मिल रहा है। यदि कोई किसान निर्यात करता है तो वह बहुत अधिक लाभ प्राप्त करेगा।

स्रोत : द हिंदू


सामाजिक न्याय

देवदासी प्रथा अब भी प्रचलित

चर्चा में क्यों?


हाल ही में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU), मुंबई और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (TISS), बेंगलुरु द्वारा ‘देवदासी प्रथा’ पर दो नए अध्ययन किये गए। ये अध्ययन देवदासी प्रथा पर नकेल कसने हेतु विधायिका और प्रवर्तन एजेंसियों के उदासीन दृष्टिकोण की एक निष्ठुर तस्वीर पेश करते हैं।


प्रमुख बिंदु

  • कर्नाटक देवदासी (समर्पण का प्रतिषेध) अधिनियम, 1982 (Karnataka Devadasis (Prohibition of Dedication) Act of 1982) के 36 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा इस कानून के संचालन हेतु नियमों को जारी करना बाकी है जो कहीं-न-कहीं इस कुप्रथा को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
  • देवी/देवताओं को प्रसन्न करने के लिये सेवक के रूप में युवा लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करने की यह कुप्रथा न केवल कर्नाटक में बनी हुई है, बल्कि पड़ोसी राज्य गोवा में भी फैलती जा रही है।
  • अध्ययन के अनुसार, मानसिक या शारीरिक रूप से कमज़ोर लड़कियाँ इस कुप्रथा के लिये सबसे आसान शिकार हैं। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के अध्ययन की हिस्सा रहीं पाँच देवदासियों में से एक ऐसी ही किसी कमज़ोरी से पीड़ित पाई गई।
  • NLSIU के शोधकर्त्ताओं ने पाया कि सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिये पर स्थित समुदायों की लड़कियाँ इस कुप्रथा की शिकार बनती रहीं हैं जिसके बाद उन्हें देह व्यापार के दल-दल में झोंक दिया जाता है।
  • TISS के शोधकर्त्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि देवदासी प्रथा को परिवार और उनके समुदाय से प्रथागत मंज़ूरी मिलती है।

प्रथा खत्म क्यों नहीं होती?

  • व्यापक पैमाने पर इस कुप्रथा के अपनाए जाने और यौन हिंसा से इसके जुड़े होने संबंधी तमाम साक्ष्यों के बावजूद हालिया कानूनों जैसे कि-यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 और किशोर न्याय (JJ) अधिनियम, 2015 में बच्चों के यौन शोषण के एक रूप में इस कुप्रथा का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है।
  • भारत के अनैतिक तस्करी रोकथाम कानून या व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018 में भी देवदासियों को यौन उद्देश्यों हेतु तस्करी के शिकार के रूप में चिह्नित नहीं किया गया है।
  • अध्ययन ने यह रेखांकित किया है कि समाज के कमज़ोर वर्गों के लिये आजीविका स्रोतों को बढ़ाने में राज्य की विफलता भी इस प्रथा की निरंतरता को बढ़ावा दे रही है।

देवदासी प्रथा है क्या?

  • प्राचीन समय से ही हमारे समाज में तमाम कुरीतियों और अंधविश्वासों का बोलबाला रहा है जो समय के साथ व्यापक वैज्ञानिक चेतना के विकसित होने से धीरे-धीरे लुप्त होते गए। किंतु हमारे समाज में आज भी कुछ ऐसी कुरीतियों और अंधविश्वासों का अभ्यास व्यापक पैमाने पर किया जाता है जो 21वीं सदी के मानव समाज के लिये शर्मसार करने वाली हैं। इन्हीं कुरीतियों में से एक है- देवदासी प्रथा।
  • इस प्रथा के अंतर्गत देवी/देवताओं को प्रसन्न करने के लिये सेवक के रूप में युवा लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करना होता है।
  • इस प्रथा के अनुसार, एक बार देवदासी बनने के बाद ये बच्चियाँ न तो किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर सकती है और न ही सामान्य जीवन व्यतीत कर सकती है।

स्रोत- द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

गरज/बिजली के लिये ‘एंड-टू-एंड’ भविष्यवाणी प्रणाली

चर्चा में क्यों?


हाल ही में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department-IMD) द्वारा अप्रैल 2019 तक गरज/बिजली अवलोकन नेटवर्क को मज़बूत बनाने के लिये ‘एंड-टू-एंड’ भविष्यवाणी प्रणाली लागू करने का प्रस्ताव दिया गया है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा बताया गया है कि पिछले वर्ष मानसून से पहले आए आंधी तूफान एवं बारिश से हुए जान-माल की हानि को देखते हुए जल्द ही एक ऐसे उपकरण का प्रयोग किया जाएगा जो मौसम की सटीक जानकारी देगा।
  • इसे पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Tropical Meteorology-IITM) और नई दिल्ली स्थित भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा विकसित किया जा रहा है।
  • IITM पुणे ने देश में पहले से ही बिजली के 48 सेंसर लगाए हैं, जो वास्तविक समय (Real Time) पर आंधी/बिजली की गतिविधियों का पता लगा सकते हैं।
  • IITM पुणे ने क्षेत्र पर होने वाली बिजली गतिविधि पर चेतावनी देने के लिये ‘DAMINI’ नामक एक मोबाइल ऐप भी विकसित किया है।
  • वर्तमान में IITM (पुणे) और IMD (दिल्ली) दोनों मिलकर किसानों और शहर के पूर्वानुमानों के लिये मोबाइल ऐप के साथ एक नई वेबसाइट विकसित कर रहे हैं। ये नए उपकरण IMD को यथा-समय पूर्वानुमान और चेतावनियों को प्रसारित करने में मदद करेंगे।

अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • IMD अवलोकन नेटवर्क को मज़बूत कर रहा है और इस साल के अंत तक, उत्तर-पश्चिम हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर) पर 10 नए एक्स-बैंड (X-band) मौसम रडार स्थापित किये जाने का अनुमान है।
  • भारत के मैदानी इलाकों में 2020 तक अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर एक और लक्षद्वीप द्वीप समूह पर 11 अन्य सी-बैंड (C-Band) रडार लगाए जाएंगे।
  • IITM (पुणे), मुंबईमें IMD और मुंबई नगर निगम की मदद से रेन-गेज नेटवर्क (Rain-Gauge Network) एवं 4 X-Band रडार स्थापित कर रहा है। जिससे 2 किमी रिज़ॉल्यूशन पर होने वाले वर्षा के आँकड़े को तैयार किया जा सके और वास्तविक समय पर जनता को जानकारी उपलब्ध कराया जा सके।
  • इससे पहले मौजूदा 130 कृषि मौसम क्षेत्र इकाइयों (Agro Meteorological Field Units) तथा 8 नए ज़िला कृषि मौसम क्षेत्र इकाइयों (District Agro Meteorological Field Units - DAMUs) को जोड़ा गया है जो स्थापित किये गए हैं और 200 ब्लॉकों में ब्लॉक स्तर पर कृषि मौसम पूर्वानुमान भी शुरू किये गए हैं।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD)

  • IMD, जिसे मौसम विभाग भी कहा जाता है, भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक एजेंसी है। यह मौसम संबंधी गतिविधियों, मौसम की भविष्यवाणी और भूकंपीय विज्ञान की समस्त जानकारियों का पता लगाती है।

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान

  • पुणे अवस्थित यह संस्थान भारत में मौसम विज्ञान और वायु-समुद्र की विशेष गतिविधियों के साथ उष्णकटिबंधीय महासागर, हिंद महासागर में अनुसंधान के विस्तार के लिये एक वैज्ञानिक संस्थान है।

रडार (Radio Detection And Ranging)

  • रडार एक पहचान प्रणाली है जो वस्तुओं की सीमा, कोण या वेग को निर्धारित करने के लिये रेडियो तरंगों का उपयोग करती है।
  • इसका उपयोग विमान, जहाजों, अंतरिक्ष यान, निर्देशित मिसाइलों, मोटर वाहनों, मौसम संरचनाओं एवं इलाके का पता लगाने के लिये किया जा सकता है।

रेन-गेज नेटवर्क( Rain-Gauge Network)


मौसम वैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित अवधि में एकत्रित वर्षा जल की मात्रा को मापने के लिये उपयोग किया जाता है।


स्रोत – PIB


विविध

Rapid Fire करेंट अफेयर्स (15 जनवरी)

  • 15 जनवरी: भारत की थल सेना आज के दिन सेना दिवस मनाती है। इस वर्ष यह 71वाँ सेना दिवस है। 1949 में आज ही के दिन भारतीय सेना पूरी तरह ब्रिटिश सेना के नियंत्रण से मुक्त हुई थी और जनरल के.एम. करिअप्पा देश के पहले सेनाध्यक्ष बने थे। उन्हें बाद में फील्ड मार्शल के रैंक से नवाज़ा गया था। इससे पहले ब्रिटिश मूल के जनरल फ्रांसिस बूचर भारत के सेना प्रमुख थे।
  • चीन की सीमा पर भारतीय सेना की पहुँच आसान बनाने के लिये सरकार ने सीमावर्ती इलाकों में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण 44 सड़कें बनाने का फैसला किया है। भारत-चीन सीमा से लगने वाले पाँच राज्यों- जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम एवं अरुणाचल प्रदेश में ये सड़कें बनाई जाएंगी। इसके अलावा पाकिस्तान से लगने वाली पंजाब और राजस्थान की सीमा पर भी 2100 किलोमीटर की मुख्य एवं संपर्क सड़कों का निर्माण किया जाएगा।
  • कारोबारी सुगमता और बेहतर नियम पालन के लिये कंपनी कानून में संशोधन करने वाला अध्यादेश सरकार ने फिर से जारी किया। कंपनी कानून 2013 संशोधन विधेयक राज्यसभा में लंबित है, जिसे लोकसभा पारित कर चुकी है। पहली बार अध्यादेश 2 नवंबर को जारी किया था, लेकिन शीत सत्र में इसे संसद की मंजूरी नहीं मिल पाने की वज़ह से अध्यादेश जारी करना पड़ा। गौरतलब है कि पिछले वर्ष अगस्त में सरकार द्वारा गठित समिति ने कंपनी कानून में कई संशोधनों का सुझाव दिया था।
  • The Economist मैगज़ीन की Intelligence Unit ने वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक का 2018 संस्करण जारी किया है। इसमें भारत को 41वाँ स्थान मिला है। नॉर्वे, आइसलैंड, स्वीडन, न्यूज़ीलैंड और डेनमार्क टॉप-5 में शामिल हैं। चाड, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, कांगो, सीरिया और उत्तर कोरिया अंतिम 5 में शामिल हैं। यह सूचकांक पाँच श्रेणियों पर आधारित है, जिनमें चुनावी प्रक्रिया और बहुलवाद, नागरिक स्वतंत्रताएँ, सरकार का कामकाज, राजनीतिक भागीदारी और राजनीतिक संस्कृति शामिल है।
  • हाल ही में चीन में ग्लोबल ज़ीरो एमीशन एंड ऑल इलेक्ट्रिकल व्हीकल सम्मलेन का आयोजन हुआ। इसमें भारत ने भी हिस्सा लिया और भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन बाज़ार के विस्तार में चीन के उद्योगों से निवेश और सहभागिता को आमंत्रित किया। भारत ने 2030 तक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का लक्ष्य हासिल करना चाहता है। चीन दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है।
  • विवेक देवराय की अध्यक्षता वाली लॉजिस्टिक्स विकास समिति ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोदी को सौंपी। Key Challenges in Logistics Development & the Associated Commerce –Policy Reforms for Ease of Doing Business/Trade in India नामक इस रिपोर्ट में अलग लॉजिस्टिक्स डिपार्टमेंट बनाने तथा ट्रकों के लिये वन टैक्स-वन परमिट का सुझाव दिया गया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद यह मानती है कि इससे देश में कारोबारी सुगमता में वृद्धि होगी।
  • मध्य प्रदेश में गिद्धों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। हाल ही में प्रदेश भर में एक साथ कराई गई गणना में कुल 7906 गिद्ध पाए गए, जो दो साल पहले गिने गए गिद्धों से 900 ज्यादा हैं। प्रदेश के वन विभाग ने इससे पहले 2017 में गिद्धों की गिनती कराई थी। इस बार प्रदेश के 33 जिलों में एक साथ 886 चयनित स्थानों पर गिनती शुरू की गई थी। 
  • मध्य प्रदेश के पेंच नेशनल पार्क में बड़ी शिकारी बिल्ली की तरह दिखने वाला एशियन पाम सिवेट नज़र आया है। आमतौर पर दक्षिण भारत में पाए जाने वाले निशाचर प्रवृत्ति के इस स्तनपायी वन्यप्राणी को दिन अथवा दोपहर के समय देख पाना बेहद मुश्किल होता है। यह किसी की आहट सुनते ही जमीन की खोह अथवा अपने आवास में छिप जाता है। रात के अंधेरे में शिकार के लिए बाहर निकलता है और छोटे जीवों जैसे- छिपकली, सांप, मेढक व कीड़ों का शिकार करता है। दक्षिण भारत के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका, दक्षिणी चीन में भी यह पाया जाता है।
  • सऊदी अरब में अपने परिवार के जुल्मों से परेशान होकर थाईलैंड पहुँची18 साल की रहाफ मुहम्मद अलकुनान को कनाडा ने अपने यहाँ शरण देकर नागरिकता प्रदान की है। इस घटना से सऊदी अरब और कनाडा के तनावपूर्ण संबंधों के और बिगड़ने का अनुमान है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष अगस्त में दोनों देशों ने विभिन्न मुद्दों को आधार बनाते हुए अपने-अपने राजदूतों को वापस बुला लिया था।
  • जाति और नस्ल सूचक टिप्पणियाँ किये जाने के बाद अमेरिका के नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स वाटसन से उनकी प्रयोगशाला द्वारा दिये गए मानद सम्मान वापस ले लिये गए हैं। जेम्स वाटसन न्यूयॉर्क स्थित कोल्ड स्प्रिंग हार्बर यूनिवर्सिटी से लगभग चार दशकों तक जुड़े रहे हैं और उन्हें DNA Helix का सह-खोजकर्त्ता होने के कारण ह्यूमन जीनोम का पितामह माना जाता है।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रथम फिलिप कोटलर अवार्ड से नवाज़ा गया है। इस पुरस्कार के लिये उनका चयन ‘‘देश को उत्कृष्ट नेतृत्व' प्रदान करने के लिये किया गया है। यह पुरस्कार 3P के आधार पर दिया गया है, जिसमें People, Profit, Planet शामिल हैं। यह पुरस्कार हर साल किसी देश के नेता को दिया जाएगा। फेसर फिलिप कोटलर नॉर्थ-वेस्टर्न यूनिवर्सिटी, केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में इंटरनेशनल मार्केटिंग के विश्व प्रसिद्ध प्रोफेसर हैं।
  • प्रख्यात अंग्रेजी लेखिका नीलम सरन गौड़ को उनकी पुस्तक Requiem in Raga Janaki के लिये 2018 का द हिंदू प्राइज़ फॉर फिक्शन दिया गया है। नॉन-फिक्शन श्रेणी में यह पुरस्कार बंगाली लेखक तथा राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्त्ता मनोरंजन ब्यापारी को उनकी पुस्तक Interrogating My Chandal Life: An Autobiography of the Dalit के लिये दिया गया है। इस पुरस्कार के तहत एक प्रशस्ति-पत्र और पाँच लाख रुपए नकद प्रदान किये जाते हैं।

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