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जीव विज्ञान और पर्यावरण

द बिग पिक्चर: विकास बनाम पर्यावरण

  • 06 Jul 2018
  • 12 min read

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में दक्षिणी दिल्ली के इलाकों में विकासात्मक गतिविधि को अंजाम देने के लिये लगभग 16,000 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव रखा गया है। हालाँकि आम लोगों द्वारा विरोध किये जाने से अब 5,000 से भी कम पेड़ काटे जाएँगे और 230 पेड़ों का स्थानांतरण किया जाएगा।
  • इससे पूर्व भी देश के अन्य शहरों में सड़क विस्तारीकरण, फ्लाईओवर के निर्माण और औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना के लिहाज़ से पेड़ों की कटाई की गई है।
  • पूर्व के आँकड़ों पर गौर किया जाए तो वर्ष 2008-2017 के बीच बंगलूरू में लगभग 20,000 से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। वर्ष 2016-17 के दौरान केवल हरियाणा के गुरुग्राम में ही लगभग 10,000 पेड़ काटे जा चुके हैं। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक पिछले 30 वर्षों में हरियाणा में अतिक्रमण और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण लगभग दो-तिहाई वन क्षेत्र नष्ट हो चुका है। 

विचारणीय बिंदु:

  • पर्यावरण संरक्षण और धारणीय विकास में संबंध
  • आर्थिक संवृद्धि और पर्यावरण संरक्षण का सह-अस्तित्व
  • शहरी नियोजन और पर्यावरण संरक्षण

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

  • पर्यावरण संरक्षण और विकास को अक्सर अलग-अलग, यहाँ तक कि कई बार एक दूसरे का विरोधी भी समझा जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इन्हें एक साथ लाए बिना वर्तमान पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना काफी कठिन है। यह बहुत कम बार देखा गया है कि विकासात्मक परियोजनाओं को पारित करने से पहले उसके संभावित पर्यावरणीय पहलुओं पर पर्याप्त संवेदनशीलता से विचार किया गया हो।
  • भारत में वर्ष 2006 में ही पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (Environmental impact assesment) को अपनाया गया है। साथ ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) भी अस्तित्व में है। इसके बावजूद विकासात्मक परियोजनाओं को एकांगी दृष्टिकोण से पारित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का गठन वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत किया गया है। यह एक बहु-अनुशासनात्मक समस्याओं वाले पर्यावरणीय विवादों को सुलझाने के लिये आवश्यक विशेषज्ञता से सुसज्जित विशिष्ट निकाय है। यह अधिकरण नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत निर्धारित प्रक्रिया द्वारा बाध्य नहीं है बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित है। इसकी स्थापना पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन तथा व्यक्तियों एवं संपत्ति के नुकसान के लिये सहायता और क्षतिपूर्ति देने या उससे संबंधित या उससे जुड़े मामलों सहित, पर्यावरण संरक्षण एवं वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और तेज़ी से निपटारे के लिये की गई है।

टीम दृष्टि इनपुट

पर्यावरण संरक्षण और धारणीय विकास

भारत के विभिन्न शहरों में जहाँ पर्यावरण प्रदूषण की समस्या सतत् रूप से बढ़ रही है ऐसे में विकासात्मक क्रियाकलाप के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई विरोधाभासी कदम ही प्रतीत होता है। सच तो यह है कि बिना स्वच्छ पर्यावरण के सतत् विकास की अवधारणा बेईमानी है। समुचित विकास के लिये पेड़ एक प्राथमिक घटक है। पेड़ वह कड़ी है जो भौतिक दुनिया और प्राकृतिक दुनिया को जोड़ने का कार्य करती है। यह कार्बन प्रच्छादन, सौर ऊर्जा का उत्पादन, भौतिक जगत के लिये विभिन्न प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराने के साथ-साथ खाद्य शृंखला और जैव विविधता के लिये भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। अतः सतत् विकास के लिये पर्यावरण के अन्य घटकों के साथ-साथ पेड़ों का संरक्षण किया जाना भी अपरिहार्य है।

सतत विकास की अवधारणा

वस्तुतः सतत् विकास जिस संगठित सिद्धांत की ओर इशारा करता है वह समाज एवं अर्थव्यवस्था को अपनी सेवाएँ प्रदान करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र की मज़बूती पर ही बल देता है। यह ऐसी व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण को प्रोत्साहित करता है जहाँ प्राकृतिक संसाधनों की अखंडता और स्थिरता को प्रभावित किये बिना मानवीय आवश्यकता को पूरा किया जाता है। इस तरह सतत् विकास से तात्पर्य ऐसे विकास से है जिसके अंतर्गत वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अपने आने वाली पीढ़ियों की ज़रूरतों से समझौता नहीं किया जाता है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण संरक्षण स्वैच्छिक रूप से किसी-न-किसी मात्रा में विकास की धारणीयता को भी संवर्द्धित करता है। अतः यह स्पष्ट है कि पर्यावरण संरक्षण और धारणीय विकास न केवल पूरक हैं बल्कि दोनों की पृथक् संकल्पना एक अधूरेपन का एहसास कराते हैं।

विकास और पर्यावरण में असंतुलन का कारण

यह अक्सर देखा गया है कि विकास कार्य के दौरान बीच में आने वाले पेड़ों या अन्य पारिस्थितिकी घटकों को दरकिनार कर दिया जाता है। शहरी क्षेत्रों में किये जा रहे विकास कार्य के दौरान यह स्थिति अधिक देखने को मिलती है। इस परिस्थिति पर गौर किया जाए तो इसके निम्नलिखित कारण दिखाई पड़ते हैं-

  • पर्यावरणीय लागत की तुलना में मौद्रिक लागत को अधिक महत्त्व देना।
  • शहरी क्षेत्रों में स्व-स्थाने विकास (In-situ development) पर बल देना।
  • विभिन्न सरकारी एजेंसियों में सह-संयोजन का अभाव।
  • संरक्षण का इरादा (intent to conservation) न होना।

संतुलन की राह

शहरी नियोजन में योजना के अभिविन्यास (lay out of plan) की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। योजना बनाते समय यदि पर्यावरणीय पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाए तो विकास के दौरान होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। उदाहरण के रूप में यदि किसी भवन के निर्माण में या सड़क विस्तारीकरण में कोई वृक्ष बीच में आ रहा है तो वृक्ष को काटने की बजाय हमें योजना में परिवर्तन की संभावना पर विचार करना चाहिये। आज हमारे पास ऐसी तकनीकें भी उपलब्ध हैं जिससे पेड़ों की गहराई, जड़ों की प्रकृति और जीवनकाल आदि के बारे में आसानी से पता किया जा सकता है। यह तकनीक हमें पेड़ों के स्थानांतरण (translocation) की संभवाना को बताने में भी सक्षम है।

शहरी क्षेत्रों में स्व-स्थाने विकास (In-situ development) अर्थात् आंतरिक इलाकों में ही विकास कार्य को संपन्न करने की जिद ने पर्यावरण को काफी नुकसान पहुँचाया है। यदि हम शहरी विस्तारीकरण या औद्योगिक परियोजनाओं को बीआरटी कॉरिडोर, मेट्रो रेल अथवा अन्य कोई भी सुरक्षित और द्रुतगामी परिवहन सुविधा से युक्त कर शहर से कुछ दूरी पर विकसित करें तो हमारी पहुँच आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ स्वस्थ पर्यावरण तक भी संभव हो सकेगी।

विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों में आज जल की अनवरत बर्बादी देखने को मिलती है, ऐसे में निर्माण कार्यों में पुनर्चक्रित जल का उपयोग कर स्वच्छ जल की बर्बादी को नियंत्रित किया जा सकता है जो अंततः पर्यावरण को सुदृढ़ करता है।

भारत में कई बार लाल फीताशाही या नियामक प्राधिकरणों की बहुतायतता ने भी विकास और पर्यावरण को विरोधी बनाया है। वस्तुतः इन एजेंसियों में संयोजन के अभाव से परियोजनाएँ एकांगी दृष्टिकोण का शिकार हो जाती हैं और केवल विकास को ध्यान में रखकर अन्य पहलुओं को अनसुना कर देती हैं। इस तरह परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान करने वाली विभिन्न एजेंसियाँ आपसी संयोजन और परियोजना से संबंधित सभी पक्षों को ध्यान में रखकर कार्य करेंगी तो निश्चित ही पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

विकास और पर्यावरण को एक साथ लाने के लिये सबसे ज़रूरी पहलू है नीति-निर्धारकों की इच्छाशक्ति। इच्छाशक्ति के अभाव में यह देखा गया है कि परियोजना बिना पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (Environmental impact assesment) के ही पारित कर दी जाती है अथवा संभावित लागत की अधिकता से इस मुद्दे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है। जबकि मौद्रिक लागत की तुलना में पर्यावरणीय लागत को उपेक्षित करना दीर्घकालिक दृष्टिकोण से उचित नहीं प्रतीत होता।

निष्कर्ष:बढ़ते शहरीकरण ने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अन्य बुनियादी ज़रूरतों के विस्तारीकरण के लिये बाध्य किया है। इन बढ़ती ज़रूरतों और संवृद्धि की आकांक्षा ने निश्चित रूप से कई प्रकार की चुनौतियों को उत्पन्न किया है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है जिसे सरकारी नीतियों का प्रभावी अनुपालन, सरकारी एजेंसियों का सह-संयोजन, संरक्षण की भावना, परियोजनाओं के अभिविन्यास में पर्यावरण को उचित महत्त्व देने और तकनीकों का तार्किक इस्तेमाल के परिणामस्वरूप सफलतापूर्वक हासिल किया जा सकता है। 

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