हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

लोकसभा और राज्यसभा टीवी डिबेट

सामाजिक न्याय

द बिग पिक्चर: व्यभिचार और विवाह

  • 19 Jul 2018
  • 14 min read

परिचर्चा में शामिल प्रमुख बिंदु

  • क्या है धारा 497?
  • क्या यह धारा अनुच्छेद 14, 15 या 21 का अतिक्रमण करती है?
  • इसे क्यों निरस्त कर देना चाहिये?
  • अन्य देशों में इससे संबंधित विधान 
  • निष्कर्ष

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का ही मिलन नहीं होता अपितु दो परिवारों का आपसी संबंध होता है, अतः पश्चिमी समाज की तुलना में भारतीय समाज में विवाह का मुद्दा अधिक संवेदनशील है। किंतु भारतीय संविधान में विवाह से संबंधित कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो हमेशा सवालों के घेरे में रहते हैं। इसी संदर्भ में देश की शीर्ष अदालत ने इस वर्ष जनवरी में संवैधानिक पीठ को इटली में रहने वाले एक प्रवासी भारतीय जोसेफ शाइन द्वारा दायर की गई व्यभिचार कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को संदर्भित किया था।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने पहले इस जनहित याचिका पर केंद्र के रुख की मांग की थी, जिसमें बताया गया था कि केवल पुरुषों को किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ यौन संबंध रखने हेतु व्यभिचार के अपराध के लिये दंडित किया जा सकता है।हाल ही में दायर किये गए अपने जवाब में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी से विवाहेत्तर यौन संबंध स्थापित करने पर सज़ा का प्रावधान करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को निरस्त करने से वैवाहिक संस्था ही नष्ट हो जाएगी।
  • गृह मंत्रालय ने धारा 497 की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने का अनुरोध करते हुए कोर्ट से कहा कि यह धारा वैवाहिक संस्था का समर्थन और उसका संरक्षण करती है।
  • जबकि याचिका में कहा गया है कि पहली दृष्टि में धारा 497 असंवैधानिक है क्योंकि यह पुरुषों के साथ भेदभाव करती है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है।

क्या है धारा 497?

  • भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 के तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी शादीशुदा महिला के साथ रज़ामंदी से शारीरिक संबंध बनाता है तो उस महिला का पति व्यभिचार (एडल्टरी) के नाम पर इस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज कर सकता है लेकिन वह अपनी पत्नी के खिलाफ किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है। 
  • साथ ही, इस मामले में शामिल पुरुष की पत्नी भी महिला के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं करवा सकती है। इसमें यह भी प्रावधान है कि विवाहेतर संबंध में शामिल पुरुष के खिलाफ केवल उसकी साथी महिला का पति ही शिकायत दर्ज कर कार्रवाई करा सकता है।
  • अगर किसी पुरुष पर अवैध संबंध का आरोप साबित हो जाता है तो इसे अधिकतम पाँच साल की सज़ा होती है। इस तरह के मामले की शिकायत किसी पुलिस स्टेशन में नहीं हो सकती बल्कि मजिस्ट्रेट के सामने की जाती है और उसी के सामने सारे सबूत पेश करने होते हैं। सबूत पेश होने के बाद संबंधित व्यक्ति को समन भेजा जाता है।

केंद्र सरकार का पक्ष

  • सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आईपीसी की धारा 497 (व्यभिचार) के लिये दंड के प्रावधान को सही बताते हुए कहा है कि इस प्रावधान को कमज़ोर या फीका करने से वैवाहिक बंधन की पवित्रता पर असर पड़ेगा। 
  • साथ ही मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और आपराधिक दंड संहिता की धारा 198(2) को खत्म करना भारतीय समाज के चरित्र व मूल्यों के लिये हानिकारक होगा।
  • हलफनामे के अनुसार, मौजूदा याचिका में कानून के जिन प्रावधानों को चुनौती दी गई है उन्हें विधायिका ने भारतीय समाज के विशिष्ट ढाँचे और संस्कृति को ध्यान में रखते हुए अपने विवेक से विवाह को संरक्षण प्रदान करने और उसकी पवित्रता की संरक्षा के लिये बनाया है।
  • केंद्र ने हलफनामे में अपराध न्याय व्यवस्था में सुधार पर न्यायमूर्ति मलिमथ समिति की रिपोर्ट का भी हवाला दिया है जिसमें धारा 497 को लैंगिक भेदभाव मुक्त बनाने का सुझाव दिया गया था।
  • हलफनामे के अनुसार, विधि आयोग भी इस समय व्यभिचार (एडल्टरी) से संबंधित मुद्दों पर विचार कर रहा है और उसने कुछ पहलुओं की पहचान की है जिन पर विचार के लिये उप समूहों का गठन किया है।

मलिमथ समिति की रिपोर्ट

  • न्याय प्रणाली में सुधार के विभिन्न पहलुओं पर विचार के लिये न्यायमूर्ति वी.एस. मलिमथ की अध्यक्षता में नवंबर 2000 में यह समिति गठित की गई थी।  
  • समिति ने वर्ष 2003 में अपनी रिपोर्ट उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को उनके कार्यकाल के दौरान प्रस्तुत की थी। इसमें समिति ने विभिन्न आपराधिक मामलों में सज़ा आदि से संबंधित कुल 158 सुझाव दिये।  
  • इसमें अंतर्राज्यीय व अंतर्राष्ट्रीय अपराधों से निपटने के लिये संघीय कानून लाने, बलात्कारियों के लिये मृत्युदंड की बजाय आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान करने, महिलाओं पर अत्याचार संबंधी अपराधों को जमानती अपराध की श्रेणी में रखने व नए पुलिस कानून के लिये राष्ट्रीय पुलिस आयोग गठित करने आदि सिफारिशें शामिल हैं।
  • व्यभिचार कानून में संशोधन की सिफारिश करते हुए समिति ने कहा था कि जब किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ यौन संबंध रखने के लिये दंडित किया जा सकता है, तो महिला को भी दंड के लिये उत्तरदायी होना चाहिये। 

(टीम दृष्टि इनपुट)

इस क़ानून के विरोध में तर्क

  • याचिकाकर्त्ता के अनुसार, यह कानून 150 वर्ष पुराना है, जब महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक स्थिति बहुत कमज़ोर थी, इसलिये व्यभिचार के मामले में महिला को पीड़ित की तरह माना गया था। 
  • आज महिलाओं की स्थिति इतनी कमज़ोर नहीं है। यदि वे अपनी इच्छा से दूसरे पुरुष से संबंध बनाती हैं, तो मुकदमा सिर्फ उस पुरुष पर नहीं चलना चाहिये। ऐसे मामले में महिला को छूट देना समानता के अधिकार के विपरीत है।
  • इस दलील की सहमति में संवैधानिक पीठ ने कहा कि ‘‘आपराधिक कानून लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता लेकिन यह धारा एक अपवाद है। इस पर विचार की ज़रूरत है।’’ 
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि पति की सहमति से किसी और से संबंध बनाने पर इस धारा का लागू न होना भी यह दिखाता है कि औरत को एक संपत्ति की तरह लिया गया है।
  • न्यायालय में यह भी प्रश्न उठाया गया कि आईपीसी की धारा 497 के तहत पति तो अपनी पत्नी के व्यभिचार की शिकायत कर सकता है परंतु पति के ऐसे संबंधों की शिकायत पत्नी नहीं कर सकती। न्यायालय ने माना कि ये कानून कहीं पुरुष तो कहीं महिला से भेदभाव करता है। 
  • इससे पहले भी वर्ष 1954, वर्ष 2004 और वर्ष 2008 में आए निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय आईपीसी की धारा 497 में किसी भी तरह के बदलाव की मांग को ठुकरा चुका है।
  • ध्यातव्य है कि पूर्व में इस पर निर्णय लेने वाली सभी संवैधानिक पीठों में तीन या चार न्यायाधीश होते थे। इसी कारण से इस बार संवैधानिक पीठ में पाँच न्यायाधीशों को सम्मिलित किया गया।

अन्य देशों में व्यभिचार के कानून की स्थिति

  • भारत में व्यभिचार कानून का निर्माण अंग्रेज़ों द्वारा किया गया, लेकिन खुद ब्रिटेन में व्यभिचार को अपराध नहीं माना जाता है। यद्यपि वहाँ तलाक के लिये इसे एक कारण माना गया है, लेकिन किसी को इस बात की सज़ा नहीं दी जा सकती कि उसने किसी विवाहित महिला से शारीरिक संबंध स्थापित किये हैं।
  • अमेरिका के 21 राज्यों में व्यभिचार दंडनीय अपराध है, लेकिन वर्ष 2003 में जब से अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बने यौन संबंध अपराध नहीं है, तब से व्यभिचार के कानून के तहत किसी को आरोपी नहीं बनाया जा रहा है।
  • यूरोप में अधिकांशतः देश व्यभिचार को अपराध नहीं मानते हैं, किंतु यह ध्यान देने योग्य है कि इसे तलाक के आधार के तौर पर एक कारण ज़रूर माना जाता है।
  • कुल मिलाकर, विकसित देशों मे स्थिति यह है कि या तो वहाँ व्यभिचार का कोई कानून नहीं है, या फिर जहाँ कानून है भी तो वहाँ इसका इस्तेमाल न के बराबर होता है। कुछ देशों में कानून की किताबों में व्यभिचार सिर्फ इस वज़ह से है, क्योंकि यह तलाक का आधार है। 
  • विकसित देशों में यह मान लिया गया है कि दो वयस्कों के बीच सहमति से होने वाला यौन संबंध गलत या अनैतिक तो हो सकता है, लेकिन इसे अपराध के तौर पर शामिल नहीं किया जा सकता।

(टीम दृष्टि इनपुट)

आगे की राह

  • इस बात से इनकार नहीं किया जा रहा है कि आईपीसी की धारा 497 के भीतर अस्पष्टताएँ मौजूद हैं। किसी अविवाहित महिला के साथ विवाहित पुरुष द्वारा संबंध बनाने पर तथा विवाहेतर समलैंगिक संबंधों पर इस कानून की औचित्यता स्पष्ट नहीं है।
  • यह धारा केवल उस व्यक्ति के खिलाफ लागू होती है जो इस तरह के अपराध करता है, जबकि स्वेच्छा से शामिल महिला को इस कानून से मुक्ति मिल जाती है। इस तरह के कानून का लाभ उस पत्नी को नहीं दिया गया है जिसका पति किसी और महिला के साथ इस तरह के अपराध में संलग्न है। हालाँकि, अंततः एक संशोधन के माध्यम से इस समस्या को हल किया जा सकता है।
  • यदि संशोधन के पश्चात् इस कानून के तहत संलिप्त महिला को भी अपराधी माना जाए तो इसके परिणामस्वरूप पीड़ित पत्नियाँ भी अपने पतियों के व्यभिचार के लिये उस महिला पर मुकदमा कर पाएंगी। विवाह संस्था को इससे मज़बूती मिलेगी, लेकिन इस वज़ह से महिलाओं की बड़ी संख्या में मुकदमेबाज़ी में फँसने की आशंका है।
  • यह विवादित धारा इस तर्क की पुष्टि नहीं करती कि यह विवाह को बचाने के लिये है क्योंकि यदि एक पुरुष अपनी पत्नी को किसी दूसरे मर्द के साथ संबंध बनाने की अनुमति देता है तब यह किस प्रकार विवाह को बचा सकता है।

निष्कर्ष: वर्ष 2006 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने व्यभिचार को गैर-आपराधिक बनाए जाने की उचित ढंग से सिफारिश की। वर्तमान में जब दुनिया भर के कई देशों ने व्यभिचार को अपराध मानने वाले कानूनों को निरस्त कर दिया है, तब हम भारत में अभी भी इस पर विचार कर रहे हैं कि इसे गैर-आपराधिक बनाना है या नहीं। भारत को भी अन्य विकसित देशों का अनुगमन करते हुए व्यभिचार को अपराध मानना बंद कर देना चाहिये और धारा 497 को निरस्त कर देना चाहिये।

एसएमएस अलर्ट
 

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

प्रोग्रेस सूची देखने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

आर्टिकल्स को बुकमार्क करने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close