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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार एवं इसका महत्त्व

  • 07 Dec 2017
  • 9 min read

संदर्भ

हाल ही में भारत के दलवीर भंडारी को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में उनके दूसरे कार्यकाल (2018-2027) के लिये चुना गया है। यह भारत की एक कूटनीतिक जीत मानी जा रही और कहा जा रहा है कि इससे भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (united nation security council-UNSC) में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी।  साथ ही सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधारों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।

क्या है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद?

  • सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है, जिसका गठन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1945 में हुआ था।
  • सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य  हैं अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, रूस और चीन।
  • सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार होता है। इन देशों की सदस्यता दूसरे विश्व युद्ध के बाद के शक्ति संतुलन को प्रदर्शित करती है। 
  • गौरतलब है कि इन स्थायी सदस्य देशों के अलावा 10 अन्य देशों को दो साल के लिये अस्थायी सदस्य के रूप में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाता है।
  • स्थायी और अस्थायी सदस्य बारी-बारी से एक-एक महीने के लिये परिषद  के अध्यक्ष बनाए जाते हैं।
  • अस्थायी सदस्य देशों को चुनने का उदेश्य सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय संतुलन कायम करना है। इस अस्थाई सदस्यता के लिये सदस्य देशों में चुनाव होता है।
  • इसमें पाँच सदस्य एशियाई या अफ्रीकी देशों से, दो दक्षिण अमेरिकी देशों से, एक पूर्वी यूरोप से और दो पश्चिमी यूरोप या अन्य क्षेत्रों से चुने जाते हैं।

सुरक्षा परिषद में सुधार आवश्यक क्यों?

  • द्वितीय विश्व युद्ध के समय की भू-राजनीतिक संरचना
    ► संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वर्तमान समय में भी द्वितीय विश्व युद्ध के समय की भू-राजनीतिक संरचना को दर्शाती है।
    ► परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, रूस और चीन को 7 दशक पहले केवल एक युद्ध जीतने के आधार पर किसी भी परिषद के प्रस्ताव या निर्णय पर वीटो का विशेषाधिकार प्राप्त है।
  • व्यापक विस्तार का अभाव:
    ► विदित हो कि सुरक्षा परिषद का विस्तार वर्ष 1963 में 4 गैर-स्थायी सदस्यों को इसमें शामिल करने हेतु किया गया था।
    ► तब 113 देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य थे लेकिन आज इनकी संख्या 193 तक बढ़ गई है, फिर भी आज तक इसका विस्तार नहीं किया गया है।
  • शक्ति-संतुलन की अनुचित व्यवस्था:
    ► परिषद की वर्तमान संरचना कम से कम 50 वर्ष पहले की शक्ति संतुलन की व्यवस्था पर बल देती है।
    ► उदाहरण के लिये यूरोप जहाँ कि दुनिया की कुल आबादी का मात्र 5 प्रतिशत ही निवास करती है, का परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर सर्वाधिक प्रतिनिधित्व है।
  • अन्य कारण: 
    ► गौरतलब है कि अफ्रीका का कोई भी देश सुरक्षा परिषद का  स्थायी सदस्य नहीं है।
    ► जबकि संयुक्त राष्ट्र का 50 प्रतिशत से अधिक कार्य अकेले अफ्रीकी देशों से संबंधित है।
    ► पीस कीपिंग अभियानों (peacekeeping operations) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावज़ूद मौजूदा सदस्यों द्वारा उन देशों के पक्ष को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है। इसका जीता जागता उदाहरण है भारत।

भारत को क्यों मिलनी चाहिये सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता?

  • भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिये, क्योंकि :
    ► भारत 1.3 बिलियन की आबादी और एक ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक की अर्थव्यवस्था वाला एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है।
    ► यह संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग अभियानों में सर्वाधिक योगदान देने वाला देश है।
    ► जनसंख्या, क्षेत्रीय आकार, जीडीपी, आर्थिक क्षमता, संपन्न विरासत और सांस्कृतिक विविधता इन सभी पैमानों पर भारत खरा उतरता है।
    ► यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
    ► भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से विश्व शांति को बढ़ावा देने वाली रही है।

विभिन्न समूहों की मांग

  • जी-4 समूह (G4):
    ► भारत, जर्मनी, ब्राज़ील और जापान ने मिलकर जी-4 (G4) नामक समूह बनाया है।
    ► ये देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यता के लिये एक-दूसरे का समर्थन करते हैं।
    ► जी-4 समूह का मानना है कि सुरक्षा परिषद को और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, न्यायसंगत व प्रभावी बनाने की ज़रूरत है।
  • एल69 समूह:
    ► भारत, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के करीब 42 विकासशील देशों के एक समूह की अगुवाई कर रहा है, जिसे एल69 समूह के नाम से संबोधित किया जा रहा है।
    ► एल69 समूह ने यूएनएससी सुधार मोर्चा पर तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
  • अफ्रीकी समूह:
    ► अफ्रीकी समूह, जिसमें 54 देश शामिल हैं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में  सुधारों की वकालत करने वाला दूसरा प्रमुख समूह है।
    ► इस समूह की मांग है कि अफ्रीका के कम से कम दो राष्ट्रों को वीटो की शक्तियों के साथ सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया जाए।

आगे की राह

  • संयुक्त राष्ट्र के नियमों में कहा गया है कि 5 सदस्यों की स्थायी परिषद की संरचना को बदलने के लिये पहले संयुक्त राष्ट्र का चार्टर बदलना होगा।
  • चार्टर में बदलाव हेतु सुरक्षा परिषद के वर्तमान 5 स्थायी सदस्यों सहित संयुक्त राष्ट्र महासभा के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होगी और यह एक बड़ी बाधा है।
  • अन्य विकल्पों पर बात करें तो प्रसिद्ध राजनयिक किशोर महबूबानी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के लिये 7-7-7 फॉर्मूला की वकालत की थी। इस फॉर्मूले के तहत सात स्थायी सदस्य, सात अर्द्ध-स्थायी सदस्य और सात गैर-स्थायी सदस्य रखने की बात की गई है।
  • 2004 में तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव, कोफी अनान के आदेश पर सुरक्षा परिषद में सुधार का एक खाका तैयार किया गया था।
  • जिसमें सुझाव दिया गया था कि बिना वीटो पावर के छह नए स्थायी सदस्यों को और तीन गैर-स्थायी सदस्यों को जोड़ा जाए। इस तरह के विकल्प आजमाए जाने चाहिये।

स्थायी सदस्यता से भारत को मिलने वाले लाभ

निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता भारत को वैश्विक राजनीति के स्तर पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, चीन और रूस के समकक्ष ला खड़ा कर देगा।
सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनते ही भारत पड़ोसी देशों श्रीलंका (गृह युद्ध अपराध), म्याँमार (रोहिंगा मुस्लिम), अफगानिस्तान (लिंग असमानता) के मानवाधिकारों से संबंधित मामलों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ध्यान में ला सकता है।
हिंद महासागर को "शांति का क्षेत्र" घोषित किया जा सकता है और यह चीन को उसकी विस्तारवादी नीतियों का माकूल जवाब होगा।
अतः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये भारत को गंभीर प्रयास करने चाहिये।

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