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संघवाद से संबंधित नई चुनौतियाँ

  • 09 Jul 2021
  • 10 min read

यह एडिटोरियल दिनांक 07/07/2021 को द हिंदू में प्रकाशित लेख “Fresh stirrings on federalism as a new politics” पर आधारित है। यह भारत में संघवाद से संबंधित उभरती नई चुनौतियों पर प्रकाश डालता है।

संघवाद शासन की कई संघटक इकाइयों के बीच साझा संप्रभुता और क्षेत्रीयता में विश्वास करता है। भारत में संघवाद भारत की विभिन्न भाषायी, धार्मिक और जातीय पहचानों को समायोजित करने का एक उपकरण है।

वर्तमान में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कोविड-19 महामारी के कारण सरकार की संघीय प्रणाली मुसीबतों का सामना कर रही है। हालाँकि महामारी से बहुत पहले से ही भारत में संघीय सिद्धांतों पर लचीले संघवाद की राजनीतिक संस्कृति का सह-निर्माण करने का दबाव रहा है।

प्रायः केंद्र और राज्य अक्सर टीके, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी), मुख्य सचिव की नियुक्ति तथा कई अन्य मुद्दों पर परस्पर विरोधी रुख अपनाते रहे हैं। इस बढ़ते तनाव को तीसरे मोर्चे की सरकार (कई क्षेत्रीय दलों के गठबंधन से बनी केंद्र सरकार) के फिर से उभरने की संभावना के रूप में भी देखा जा सकता है।

हालाँकि भारत में संघवाद की हमेशा की तरह अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता है जिसे संरक्षित करने की आवश्यकता है।

संघवाद से संबंधित प्रावधान:

  • राष्ट्रों को 'संघीय' या 'एकात्मक' के रूप में वर्णित किया जाता है जिसके तहत शासन का क्रियान्वयन किया जाता है।
  • ‘संघवाद’ का अनिवार्य रूप से अर्थ है कि केंद्र एवं राज्यों दोनों को एक दूसरे के साथ समन्वय से अपने आवंटित क्षेत्रों में कार्य करने की स्वतंत्रता है।
  • ‘एकात्मक’ प्रणाली में सरकार की सभी शक्तियाँ केंद्र सरकार में केंद्रीकृत होती हैं।
  • पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ (1962) में उच्चतम न्यायालय ने माना कि भारतीय संविधान संघीय नहीं है।
  • हालाँकि एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में उच्चतम न्यायालय के 9 न्यायाधीशों की पीठ ने संघवाद को भारतीय संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा माना है।
  • इसमें कहा गया है कि सातवीं अनुसूची में न तो विधायी प्रविष्टियाँ हैं और न ही संघ द्वारा राजकोषीय नियंत्रण जो संविधान के एकात्मक होने का निर्णायक है। राज्यों एवं केंद्र की संबंधित विधायी शक्तियों का अनुच्छेद 245 से 254 तक अनुरेखण किया जा सकता है।
  • उच्चतम न्यायालय ने देखा कि भारतीय संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका से काफी भिन्न है। भारतीय संसद के पास नए राज्यों के प्रवेश की अनुमति देने (अनुच्छेद 2), नए राज्य बनाने, उनकी सीमाओं एवं उनके नामों में परिवर्तन करने और राज्यों को मिलाने या विभाजित करने की शक्ति है (अनुच्छेद 3)।
  • हाल ही में जम्मू एवं कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में परिवर्तित किया गया- जम्मू एवं कश्मीर व लद्दाख।
  • राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के गठन एवं उनके निर्माण के लिये राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं है।
  • इसके अलावा उच्चतम न्यायालय ने संविधान के कई प्रावधानों की मौजूदगी पर ध्यान दिया जो केंद्र को राज्यों की शक्तियों को अधिभावी या रद्द करने की अनुमति देते हैं जैसे- समवर्ती सूची के विषय पर कानून बनाना।
  • भले ही राज्य अपने निर्धारित विधायी क्षेत्र में संप्रभु हैं और उनकी कार्यकारी शक्ति उनकी विधायी शक्तियों के साथ सह-व्यापक हैं किंतु यह स्पष्ट है कि राज्यों की शक्तियों का संघ के साथ समन्वय नहीं है। यही कारण है कि भारतीय संविधान को अक्सर 'अर्द्ध-संघीय' रूप में वर्णित किया जाता है।

भारत में संघवाद के लिये नई चुनौतियाँ  

  • संघवाद और विकास : देश के विकास में तेज़ी लाने के लिये भारत सरकार ने कई योजनाएँ और दृष्टिकोण प्रस्तावित किये हैं जो संघीय सिद्धांत को कमज़ोर कर सकते हैं।
  • राज्यों को कमज़ोर करना: वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर को एक पूर्ण राज्य से केंद्रशासित प्रदेश में परिवर्तित करना या हाल ही में दिल्ली के एनसीटी (संशोधन) अधिनियम, 2021 की अधिसूचना केंद्र सरकार की केंद्रीकरण प्रवृत्तियों को दर्शाती है।
    • इसी तरह केंद्र सरकार ने महामारी से निपटने के लिये शक्तियों को केंद्रीकृत करते हुए महामारी रोग अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू किया था।
    • हालाँकि केंद्र द्वारा दिये गए इस विधायी जनादेश हेतु केंद्र को राज्य से परामर्श करना चाहिये किंतु केंद्र द्वारा राज्यों को बाध्यकारी कोविड-19 दिशा-निर्देश जारी किये गए  हैं।
  • अंतर-राज्यीय विचलन/असमानता: अमीर (दक्षिणी और पश्चिमी) और गरीब राज्यों (उत्तरी एवं पूर्वी) के बीच बढ़ता अंतर अंतर-राज्यीय संबंधों में तनाव का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है जो राज्यों के बीच सामूहिक कार्रवाई के लिये एक वास्तविक बाधा बन सकता है।
    • इसने एक ऐसा संदर्भ तैयार किया है जहाँ राज्यों के बीच सामूहिक कार्रवाई करनी कठिन हो जाती है क्योंकि भारत के गरीब क्षेत्र अर्थव्यवस्था में बहुत कम योगदान करते हैं लेकिन उन्हें अपनी आर्थिक कमज़ोरियों को दूर करने के लिये अधिक वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
  • साइलेंट फिस्कल क्राइसिस: भारत की समिष्टि-राजकोषीय स्थिति की वास्तविकताएँ राज्य की वित्त संबंधी नाजुकता को बढ़ा रही हैं।
    • कमज़ोर राजकोषीय प्रबंधन ने केंद्र सरकार को उस कगार पर ला खड़ा किया है जिसे अर्थशास्त्री रथिन रॉय ने मौन राजकोषीय संकट कहा है।
    • इस संदर्भ में संघ की प्रतिक्रिया सेस बढ़ाकर राज्यों के राजस्व कम करने की रही है।

आगे की राह  

  • अंतर-राज्य मंच: एक अंतर-राज्य मंच जो राज्यों को राजकोषीय संघवाद के मामलों पर नियमित बातचीत के लिये एक साथ लाता है, विश्वास और एक आम एजेंडा बनाने के लिये शुरुआती बिंदु हो सकता है।
    • इस संदर्भ में अंतर्राज्यीय परिषद को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
    • उदारीकरण के बाद से आर्थिक विकास प्रक्षेप वक्र बढ़ते स्थानिक विचलन की विशेषता है।
  • एफआरबीएम मानदंडों में ढील: राज्यों द्वारा बाज़ार उधारी के संबंध में एफआरबीएम अधिनियम द्वारा लगाई गई सीमाओं में ढील सही दिशा में एक कदम होगा।
    • हालाँकि केंद्र सरकार द्वारा संप्रभु गारंटी के माध्यम से इन उधारों का समर्थन किया जा सकता है।
    • इसके अलावा केंद्र सरकार राज्यों को धन मुहैया करा सकती है ताकि वे राज्य स्तर पर संकट से निपटने के लिये आवश्यक कार्रवाई कर सकें।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति: संघवाद को कायम रखने के लिये राजनीतिक परिपक्वता और संघीय सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। संघवाद की मज़बूती के लिये राजनेताओं को राष्ट्रवाद को लेकर बयानबाजी पर काबू पाने की आवश्यकता होगी जो संघवाद को राष्ट्रवाद और विकास के खिलाफ खड़ा करती है।

निष्कर्ष

COVID-19 महामारी की दूसरी लहर के साथ भारत ने यह अनुभव किया कि एक गंभीर राष्ट्रीय संकट के प्रबंधन के लिये केंद्र और राज्यों के बीच स्वस्थ सहयोग की आवश्यकता होती है।

 प्रश्न: वर्तमान समय में संघवाद को कायम रखने के लिये राजनीतिक परिपक्वता और संघीय सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। चर्चा कीजिये।

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