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वैवाहिक बलात्कार और भारतीय न्याय प्रणाली

  • 23 Dec 2020
  • 11 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में भारत में वैवाहिक बलात्कार और ऐसे मामलों में न्यायिक चुनौतियों के साथ इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ:

भारत में घरेलू हिंसा एक गंभीर समस्या रही है और हाल के वर्षों में इसमें वृद्धि देखी गई है। ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ (NCRB) द्वारा जारी ‘भारत में अपराध-2019’ (Crime in India-2019) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 70% महिलाएँ घरेलू हिंसा की शिकार हैं। 

वैवाहिक बलात्कार भी घरेलू हिंसा का ही एक रूप है। वैवाहिक बलात्कार से आशय पत्नी की सहमति के बगैर उसे यौन संबंध बनाने के लिये विवश करने से है। ऐसे कृत्य अन्यायपूर्ण होते हैं परंतु फिर भी महिलाओं को नीचा दिखाने और अपमानित करने के ऐसे मामले असामान्य नहीं हैं। 

वर्तमान में विश्व के लगभग 100 से अधिक देशों में  वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किया गया है, परंतु दुर्भाग्य से भारत विश्व के उन 36 देशों में से एक है जहाँ वैवाहिक बलात्कार को आज भी अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है।

हालाँकि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिये आपराधिक कानूनों में कई बड़े संशोधन किये गए हैं परंतु वैवाहिक बलात्कार का अपराध की श्रेणी में न होना महिलाओं की गरिमा और उनके मानवाधिकारों का अवमूल्यन करता है।

भारत में वैवाहिक बलात्कार की स्थिति:   

  • भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत निर्धारित बलात्कार की परिभाषा में एक महिला के साथ गैर-सहमति संभोग से जुड़े सभी प्रकार के यौन हमलों को शामिल किया गया है।
  • भारत में वैवाहिक बलात्कार का गैर-अपराधीकरण IPC की धारा 375 के अपवाद (Exception) 2 से संबंधित है।
  •  IPC की धारा 375 के अपवाद 2 के तहत पंद्रह वर्ष से अधिक की आयु के पति और पत्नी के बीच अनैच्छिक यौन संबंधों को धारा 375 के तहत निर्धारित "बलात्कार" की परिभाषा से बाहर रखा गया है तथा इस प्रकार यह ऐसे कृत्यों के अभियोजन को रोक देता है।
  • भारत में वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को "निहित सहमति" के प्रतिमान के रूप में देखा जा सकता है। यहाँ एक पुरुष और एक महिला के बीच विवाह का अर्थ है कि दोनों ने संभोग के लिये सहमति दी है और इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं है।

वैवाहिक बलात्कार: कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के विरूद्ध: 

  • पति-आश्रय (कोवर्चर) का सिद्धांत: भारत में वैवाहिक बलात्कार के गैर-अपराधीकरण की प्रकृति ब्रिटिश काल से निर्गत होती है। वैवाहिक बलात्कार काफी हद तक ‘पति (की पहचान) के साथ महिला की पहचान के  विलय होने’ के सिद्धांत से प्रभावित और व्युत्पन्न है।
    • वर्ष 1860 के दशक में जब IPC का मसौदा तैयार किया गया था, उस समय तक एक विवाहित महिला को स्वतंत्र कानूनी इकाई नहीं माना जाता था।
    • IPC के तहत बलात्कार की परिभाषा के वैवाहिक अपवाद को विक्टोरियन युग के  पितृसत्तात्मक मानदंडों के आधार पर तैयार किया गया था जो पुरुषों व महिलाओं को बराबरी के रूप में मान्यता नहीं देता था और न ही विवाहित महिलाओं को संपत्ति के स्वामित्त्व की अनुमति देता था तथा इसमें पति-आश्रय (कोवर्चर) के सिद्धांत के तहत पति एवं पत्नी की पहचान का विलय कर दिया गया था। 
  • अनुच्छेद 14 का उल्लंघन:  वैवाहिक बलात्कार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्राप्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
    • धारा-375 के तहत शामिल अपवाद महिलाओं के दो वर्गों (उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार) का निर्माण करता है और पुरुषों को अपनी पत्नियों के खिलाफ किये गए कृत्यों से प्रतिरक्षा प्रदान करता है।
    • ऐसे में यह अपवाद एक ही समय में अविवाहित महिलाओं की समान अपराधों के लिये रक्षा करते हुए विवाहित महिलाओं के मामले में उनकी वैवाहिक स्थिति के अलावा बगैर अन्य किसी कारण के अत्याचार का शिकार होने की संभवनाओं को बढ़ाता है।
  • IPC की धारा 375 की मूल भावना के विपरीत: IPC की धारा 375 का उद्देश्य महिलाओं की रक्षा करना और बलात्कार जैसी अमानवीय गतिविधि में लिप्त व्यक्तियों को दंडित करना है।
    • हालाँकि पति को सज़ा से छूट देना पूरी तरह से इस उद्देश्य के विपरीत है, क्योंकि बलात्कार के परिणाम समान ही होते हैं चाहे फिर महिला विवाहित हो या अविवाहित।
    • इसके अलावा वास्तव में विवाहित महिलाओं के लिये घर पर अपमानजनक परिस्थितियों से बचना अधिक कठिन हो सकता है क्योंकि वे कानूनी और आर्थिक रूप से पति से जुड़ी/बँधी होती हैं। 
  • अनुच्छेद-21 का उल्लंघन: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्याख्या के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद-21 में निहित अधिकारों में स्वास्थ्य, गोपनीयता, गरिमा, सुरक्षित रहने की स्थिति और सुरक्षित वातावरण आदि अधिकार शामिल हैं।
    • कर्नाटक राज्य बनाम कृष्णप्पा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यौन हिंसा एक अमानवीय कृत्य के अलावा महिला के निजता और पवित्रता के अधिकार का गैर-कानूनी उल्लंघन/घुसपैठ है।
      • उसी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि गैर-सहमति से किया गया संभोग शारीरिक और यौन हिंसा के समान है।
    • सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यौन गतिविधि से जुड़े विकल्प को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता, गरिमा और शारीरिक अखंडता के अधिकारों के समान बताया।  
    • न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टुस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हिस्सा बताया।
  • इन सभी निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार के रूप में सभी महिलाओं (भले ही उनकी वैवाहिक स्थिति कोई भी हो) के  यौन गतिविधि से दूर रहने के अधिकार को रेखांकित किया है।
  • अतः बलपूर्वक किया गया यौन सहवास संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।     

आगे की राह: 

  •  महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा के तहत महिलाओं के खिलाफ हिंसा की दी गई परिभाषा के अनुसार, "लैंगिक-आधारित हिंसा का कोई भी कार्य (सार्वजनिक या निजी जीवन में), जिसके परिणामस्वरूप (या संभवतः) शारीरिक, यौन या मानसिक क्षति या पीड़ा पहुँचती हो, जिसमें ऐसे कृत्यों की धमकी, दबाव या स्वतंत्रता से वंचित करने का प्रयास आदि शामिल है। 
  • वर्ष 2013 में ‘महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र समिति’ (UN Committee on Elimination of Discrimination Against Women- CEDAW) ने भारत सरकार को  वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में लाने का सुझाव दिया था।
  • 16 दिसंबर, 2012 के निर्भया बलात्कार मामले के कारण देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद गठित जेएस वर्मा समिति ने भी सरकार को यही सुझाव दिया था।  
  • इस कानून को हटाने से महिलाएँ अपने अत्याचारी पति से सुरक्षित रहेंगी और वैवाहिक बलात्कार से उबरने के लिये आवश्यक सहायता प्राप्त कर सकेंगी। साथ ही वे स्वयं को घरेलू हिंसा और यौन शोषण से बचा सकेंगी।

निष्कर्ष:  भारतीय कानून अब पति और पत्नियों को अलग तथा स्वतंत्र कानूनी पहचान देता है, साथ ही आधुनिक युग में अधिकांश न्यायिक सिद्धांत  स्पष्ट रूप से महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित हैं। ऐसे में यह सही समय है कि विधायिका को इस कानूनी कमज़ोरी का संज्ञान लेना चाहिये और IPC की धारा 375 (अपवाद 2) को समाप्त करते हुए वैवाहिक बलात्कार को कानून के दायरे में लाना चाहिये।

Discrimination-against-women

अभ्यास प्रश्न:  भारत में वैवाहिक बलात्कार का गैर-अपराधीकरण महिलाओं की गरिमा और मानवाधिकारों पर एक बड़ा धब्बा है। टिप्पणी कीजिये। 

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