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कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ और प्रौद्योगिकी

  • 13 Feb 2021
  • 10 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के कार्यों में प्रौद्योगिकी की भूमिका व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

पुलिस बलों की जनता के बीच कानून व्यवस्था को बनाए रखने की महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी होती है। वे नागरिकों के दैनिक जीवन को बाधित किये बगैर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये उत्तरदायी होते हैं।  पुलिस बलों को अक्सर नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सतर्क रहने और उनके दैनिक जीवन में आने वाली बाधाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। पुलिस के लिये एक बड़ी आबादी के बीच निरंतर संभावित खतरों की निगरानी करना भी एक चुनौती रही है। भारत में जनसंख्या और पुलिस  का अनुपात प्रति 100,000 आबादी पर लगभग 150 से कम है, जबकि संयुक्त राष्ट्र की सिफारिश के अनुसार, यह अनुपात प्रति 100,000 आबादी पर 222 पुलिस बल होना चाहिये।

हालाँकि अधिक पुलिस का अर्थ अपराध में कमी नहीं है, परंतु यह वर्तमान आधुनिक विश्व में प्रौद्योगिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों (LEA) को उनके कर्तव्यों के बेहतर ढंग से निर्वहन और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है। इसके अतिरिक्त उनके दैनिक कार्यों या अभियानों में प्रौद्योगिकी एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सकती है।

कानून प्रवर्तन में प्रौद्योगिकी का लाभ:  

  • नागरिक-अनुकूल पुलिसिंग: भारत में अधिकांश नागरिक पुलिस स्टेशन जाने से बचते हैं। प्रौद्योगिकी पुलिस-नागरिक संबंधों में सुधार लाने में सहायक हो सकती है। उदाहरण के लिये: 
    • डिजिटल पोर्टल नागरिकों को अपनी शिकायतें दर्ज करने, प्रतिक्रिया प्रदान करने और उनकी शिकायत की स्थिति को ट्रैक करने के लिये एक आसान तथा पारदर्शी तंत्र भी प्रदान करते हैं। 
  • सोशल मीडिया का प्रयोग: सोशल मीडिया इंटरैक्शन के सकारात्मक प्रभाव (नागरिकों को पहले ही अलर्ट भेजने में सहायक) और नकारात्मक प्रभाव (नागरिक सोशल मीडिया पेज/हैंडल का उपयोग केवल वही जानकारी प्राप्त करने के लिये करते हैं, जिसे वे देखना या सुनना पसंद करते हैं।) दोनों हो सकते हैं।
    • इसके अतिरिक्त कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा सोशल मीडिया का प्रयोग नागरिकों तक सीधे पहुँचने के लिये किया जा सकता है, जैसे- ट्रैफिक जाम के बारे में जानकारी प्रदान करना, साइबर अपराध से बचाव हेतु जागरूकता, अफवाह रोकने, फेक न्यूज़ का मुकाबला करने आदि के लिये। 
  • अपराध का पता लगाने हेतु: प्रौद्योगिकी अपराधियों के डिजिटल फुटप्रिंट प्राप्त करने में प्रभावी रूप से सहायक हो सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग उँगलियों के निशान और छवियों का मिलान करने, सीसीटीवी फुटेज का विश्लेषण करने तथा वाहन की नंबर प्लेट को पहचानने के लिये किया जा सकता है।
    • विभिन्न स्रोतों जैसे कि सोशल मीडिया टूल्स, वित्तीय संस्थानों, यात्रा रिकॉर्ड, होटल प्रवास, फोन और आपराधिक रिकॉर्ड जैसे डेटा को एकीकृत कर  बिग डेटा के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है।
  • अपराध की रोकथाम: अपराधों की रोकथाम में बिग डेटा एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है क्योंकि इसका उपयोग अपराध पैटर्न और हॉट स्पॉट की पहचान करने के लिये किया जा सकता है। इसी तरह अपराध के प्रकार, समय और स्थान के बीच संबंध स्थापित करने हेतु  कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग किया जा सकता है।
  • दक्षता में सुधार: सुरक्षा एजेंसियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और पोस्टिंग से जुड़े अंतराल को संबोधित करने में आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जा सकता है, जिससे एक अधिक ‘संतुलित’ और ‘प्रभावी’ संगठन की स्थापना सुनिश्चित की जा सकेगी।
    • इसी प्रकार मुख्य प्रदर्शन संकेतकों जैसे कि चार्जशीट दायर करने और शिकायतों को संबोधित करने हेतु लिया गया समय, हल किये गए अपराधों के प्रकार तथा नागरिक प्रतिक्रिया स्कोर का उपयोग बेहतर और तार्किक ढंग से अधिकारियों के प्रदर्शन को निर्धारित करने के लिये किया जा सकता है।
  • रियल टाइम इंटीग्रेशन: ‘पुलिस, अदालत, अभियोजन, जेल और फोरेंसिक’ आपराधिक न्याय प्रणाली के पाँच स्तंभ हैं। इन संस्थानों के बीच फाइलों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में अनगिनत मानव-वर्ष (कार्यदिवस के संदर्भ में) नष्ट हो जाते हैं।
    • इन स्तंभों की सूचना प्रौद्योगिकी प्रणालियों के बीच रियल टाइम इंटीग्रेशन से डुप्लिकेट डेटा प्रविष्टि और त्रुटियों को कम करने में सहायता प्राप्त होगी।
    • यह हमारी कानून प्रवर्तन एजेंसियों की दक्षता में वृद्धि करेगा और साथ ही न्याय प्रदान करने में लगने वाले समय को काफी कम कर देगा।

आगे की राह: 

  • पुलिस सुधार: प्रौद्योगिकी का प्रयोग कानून प्रवर्तन एजेंसियों के कार्य में कई प्रकार से सहायक हो सकता है, परंतु यह इनके मानवीय पहलू को पूरी तरह से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है।
    • अतः  प्रौद्योगिकी को अपनाने के साथ-साथ काफी समय से लंबित पुलिस सुधारों पर भी कार्य किया जाना चाहिये।
  • प्रौद्योगिकी के दुष्प्रभावों से निपटना: प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिये गोपनीयता, पुलिस बनाम समुदाय की चिंताओं, डेटा प्रतिधारण और सार्वजनिक प्रकटीकरण नीतियों तथा वित्तीय निवेश जैसे मुद्दों का सामना करना पड़ता है। 
    • यह सरकार का कर्तव्य है कि वह ‘व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2019’ और ‘डीएनए प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक, 2018’ के अधिनियमन में तेज़ी लाए। 
    • इसके अलावा, इन मुद्दों के बारे में बहस और विचार-विमर्श को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक डोमेन में रखा जाना चाहिये। 
  • डिजिटल ट्रस्ट फ्रेमवर्क: डिजिटल प्रौद्योगिकी को अपनाए जाने के साथ ही डिजिटल नैतिकता को आत्मसात करने की आवश्यकता है, जो कि एक व्यापक ढाँचा/रूपरेखा प्रदान करती  है और जिसके तहत समाज में डिजिटल प्रोद्योगिकी के प्रति विश्वास बनाए रखने के लिये प्रौद्योगिकी का प्रयोग, डेटा पारदर्शिता और डिजिटल नैतिकता शामिल होती है।

Digital-trust

निष्कर्ष:  

नई डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ पुलिस द्वारा नागरिकों को सुरक्षा और सेवा प्रदान करने के तरीकों को बदल रही हैं, ये सुरक्षा एजेंसियों को अपराधों को अधिक प्रभावी ढंग से रोकने तथा तेज़ी से हल करने में सहायता प्रदान करती हैं। वर्तमान में विश्व स्तर पर कानून प्रवर्तन में सहायता करने वाली प्रौद्योगिकियों के साथ तालमेल बनाए रखने के साथ उन्हें अपनाए जाने (भारतीय परिवेश की अनुकूलता के आधार पर) की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न:  वर्तमान में कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाया जाना उनके दैनिक कार्यों में उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है। चर्चा कीजिये।

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