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भारत में लैंड यूज़ पैटर्न और लैंड-होर्डिंग की समस्या

  • 08 Jan 2018
  • 9 min read

संदर्भ:

लैंड (Land) यानी भूमि एक दुर्लभ संसाधन है और सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिये इसकी तय आपूर्ति की व्यवस्था की गई है। साथ ही यह भी सत्य है कि लगातार बढ़ती आबादी और अधिकाधिक आर्थिक वृद्धि की आकांक्षाओं के कारण लैंड की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। दरअसल, मनुष्य जिस भूमि पर रहता है उस भूमि के उपयोग के विभिन्न तरीकों को लैंड यूज़ पैटर्न कहा जाता है।

लैंड यूज़ पैटर्न में आए बदलाव के कई कारणों में से सरकारी ज़मीन का समुचित उपयोग न हो पाना एक महत्त्वपूर्ण कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार द्वारा की जा रही लैंड-होर्डिंग (land-hoarding) की वज़ह से हमें कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है।

कैसे आया लैंड यूज़ पैटर्न में बदलाव?

  • मानव एवं धरती के बीच परस्पर क्रियाएँ मानव सभ्यता के आरंभ होने के साथ ही शुरू हो गई थीं, लेकिन लैंड यूज़ पैटर्न में सर्वप्रथम व्यापक बदलाव तब महसूस किये गए, जब घुमंतू और शिकारी समूह के रूप में विचरण करने वाले मानवों ने कृषि करना आरंभ किया।
  • होलोसीन के आरंभ में यानी आज से लगभग 11,500 साल पहले कुछ पौधों की खेती करने का सिलसिला शुरू हुआ, जल्दी ही लोगों के सामाजिक जीवन में बदलाव आया, तकनीक उन्नत हुई और तब विश्व के प्रथम शहरों का निर्माण हुआ।
  • जब तक मानव अपनी ज़रूरतें पूरी करता रहा लैंड यूज़ पैटर्न में बदलाव से कोई विघटनकारी प्रभाव देखने को नहीं मिला, लेकिन जल्दी ही मानवों में स्वयं को विकसित, और विकसित करने की होड़ मच गई और जंगलों की अंधाधुंध कटाई शुरू हो गई।
  • यही कारण है कि शहर बढ़ते गए और जंगल छोटे होते गए। दरअसल, मानवों ने धरती को रबर की गेंद समझा और भूमि को जैसे चाहा वैसे खींच-खींचकर बढ़ाते रहे।
  • धीरे-धीरे लैंड यूज़ पैटर्न में बदलाव देखा जाने लगा और आज यह जलवायु परिवर्तन से लेकर बेतरतीब शहरीकरण का एक बड़ा कारण बन गया है।

भारत में लैंड यूज़ पैटर्न

लैंड यूज़ पैटर्न में बदलाव और सरकार द्वारा लैंड-होर्डिंग में अंतर्संबंध

  • भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से एक कृषि अर्थव्यवस्था रही है यही कारण है कि पारंपरिक रूप से भूमि का उपयोग कृषि गतिविधियों तक सीमित रहा है।
  • हालाँकि पिछले दो से तीन दशकों में  आर्थिक गतिविधियों में व्यापक बदलाव आया है खनन, विनिर्माण, और सेवा क्षेत्र द्वारा बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग में लाई जा रही है।
  • भारत एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है जहाँ उत्पादन कार्यों की ज़िम्मेदारी निजी और सार्वजानिक दोनों को ही संभालनी होती है।
  • अतः सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण किया गया, जबकि पहले से ही काफी ज़मीनों पर सरकार का मालिकाना अधिकार रहा है।
  • इस तरह से सरकार की विभिन्न संस्थाओं के अंतर्गत इतनी बड़ी मात्रा में ज़मीन आ गई है कि मानों हम फिर से ज़मींदारी काल में चले आएँ हैं और अब सरकार नई जमींदार है जिसके पास हज़ारों बीघा ज़मीन हैं।

सरकार द्वारा किये जा रहे लैंड होर्डिंग के प्रभाव

  • बेतरतीब शहरीकरण को बढ़ावा:

⇒ गौरतलब है कि अधिकांश भारतीय शहर ‘नगरीय नियोजन’ (urban planning) के मूलभूत सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं।
⇒ विभिन्न सरकारी निकायों के अंतर्गत बड़ी मात्रा में अप्रयुक्त भूमि फ्लोर स्पेस इंडेक्स (floor space index) को प्रभावित करती है।
⇒ किसी शहरी क्षेत्र में यदि किसी एक-मंज़िला इमारत द्वारा एक निश्चित भूमि क्षेत्र का 50 प्रतिशत अधिग्रहित किया गया है तो उसका फ्लोर स्पेस इंडेक्स ½ कहा जाएगा।
⇒ वहीं यदि इसी इमारत को चार-मंज़िला बना दिया जाए तो फ्लोर स्पेस इंडेक्स ½ का चौगुना हो जाएगा।
⇒ लेकिन लैंड-होर्डिंग के कारण फ्लोर स्पेस इंडेक्स बेहतर नहीं हो पाता है और यह बेतरतीब शहरीकरण को बढ़ावा देता है।

  • रियल-स्टेट उद्योग में महँगाई का कारण:

⇒ लैंड-होर्डिंग से भूमि की उपलब्धता लगातार घटती जा रही है। यही कारण है कि रियल-स्टेट क्षेत्र में ज़मीन की कीमत आसमान छू रही है।
⇒ यदि सरकार द्वारा अनुपयुक्त पड़ी ज़मीनों का हाऊसिंग प्रोजेक्ट्स के लिये इस्तेमाल किया जाए तो निश्चित ही स्थिति सुधर सकती है।

  • औद्योगिक और विकास परियोजनाएँ प्रभावित:

⇒ विदित हो कि रेलवे और रक्षा मंत्रालय के पास क्रमशः 43,000 हेक्टेयर और 32,780 हेक्टेयर भूमि खाली पड़ी है, जबकि सरकार की ही कई परियोजनाएँ भूमि की अनुपलब्धता के कारण आरंभ नहीं हो पा रही हैं।
⇒ अधिक चिंतनीय यह है कि इन ज़मीनों पर कोई परियोजना प्रस्तावित भी नहीं है, फिर भी इनका एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय या फिर एक विभाग से दूसरे विभाग के हवाले किया जाना एक जटिल कार्य है।
⇒ इन परिस्थितियों में औद्योगिक और विकास परियोजनाएँ निश्चित ही प्रभावित होती हैं।

  • भ्रष्टाचार को बढ़ावा:

⇒ कई बार ऐसा देखा गया है कि बेकार पड़ी ज़मीन को प्राइवेट बिल्डर्स को बेच दिया जाता है और इस प्रकार के सौदों में प्रायः भष्टाचार की खबरें आती रहती हैं।
⇒ चाहे आदर्श घोटाला हो या श्रीनगर एयरफील्ड परियोजना या फिर कांडला पोर्ट ट्रस्ट इनके सन्दर्भ में कथित तौर पर निजी कॉर्पोरटर्स और सरकारी प्रतिनिधियों की मिली-भगत रही है।

क्या है वर्तमान स्थिति?

  • दरअसल, सरकार को यह ज्ञात नहीं है कि कितनी ज़मीनों पर उसका मालिकाना हक है।
  • सरकारी भूमि सूचना प्रणाली (Government Land Information System-GLIS) द्वारा प्राप्त आँकड़ों के अनुसार केन्द्रीय मंत्रालय केवल 13,50,500 हेक्टेयर भूमि के मालिक होने की बात स्वीकार करते हैं।
  • हालाँकि सरकारी भूमि सूचना प्रणाली द्वारा प्रस्तुत आँकड़े अधूरे हैं और यह इससे कई गुना अधिक है।
  • कैग (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह बताया है कि कोई भी सरकारी एजेंसी स्वयं के स्वामित्व संबंधी पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं रखती है।

आगे की राह

  • भूमि और यूज़ पैटर्न की एक व्यापक सूची का निर्माण:

⇒ आज पहली आवश्यकता यह है कि सभी सरकारी संस्थाओं के भूमि संसाधनों और उनके उपयोग के पैटर्न की एक व्यापक सूची बनाई जाए।
⇒ इसमें प्रत्येक प्रॉपर्टी के स्थान, इसकी भविष्यगत उपयोग की संभावनाओं, कानूनी दावों, वर्तमान या नियोजित उपयोग आदि से संबंधित जानकारियाँ शामिल होनी चाहियें।

  • अधिशेष भूमि का उपयोग:

⇒ अधिशेष भूमि का उपयोग सेवाओं की बढ़ती मांगों, जैसे कि पानी और अपशिष्ट निपटान, सरकार प्रायोजित आवास और परिवहन परियोजनाओं के लिये भी किया जाना चाहिये।
⇒अधिशेष भूमि बेचने के प्रलोभन से बचना और इसे किराए पर देना अधिक महत्त्वपूर्ण है, ताकि सरकार की भविष्यगत आवश्यकताओं को भी पूरा किया जा सके।

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