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सामाजिक न्याय

जेल में असमानता का मामला : क्षमता से अधिक कैदी

  • 12 Apr 2018
  • 13 min read

चर्चा में क्यों?

दो हफ्ते पहले,सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को जेलों की स्थिति के संबंध में आड़े हाथों लिया। न्यायालय ने कहा कि कैदियों को जानवरों की तरह जेल में नहीं रखा जा सकता है। हाल ही में न्यायमूर्ति एमबी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की खंडपीठ द्वारा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों (जेल) को चेतावनी दी गई कि जेलों में क्षमता से ज़्यादा भीड़ की समस्या से निपटने के लिये न्यायालय के पूर्व के आदेश के अनुसार एक कार्य योजना जमा करने में नाकाम रहने की वज़ह से उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज किया जा सकता है।

देश में जेलों की स्थिति

  • वर्तमान में देश की तकरीबन 1,412 जेलों में अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक (114%) कैदी बंद है, जिसमें 31 दिसंबर, 2016 तक 3.81 लाख से कम की क्षमता वाली जेलों में 4.33 लाख कैदी हैं। यह जानकारी सरकार द्वारा राज्यसभा में उपलब्ध कराई गई।
  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्‍यूरो (National Crime Records Bureau) की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जेलों में क्षमता के मुकाबले 114.4% अधिक कैदी बंद हैं और कुछ मामलों में तो यह तादाद छह सौ प्रतिशत तक है।
  • 2015 के इन आँकड़ों के मुकाबले 2016, 2017 और 2018 में कैदियों की संख्‍या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जबकि जेलों की संख्‍या ज्यों की त्यों बनी हुई है।
  • ऐसे में इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन जेलों में बंद कैदियों की हालत कितनी बदहाल होगी। यदि इस संबंध में राज्‍यों की बात करें तो ज्ञात होता है कि दादरा और नगर हवेली में 276.7% से अधिक कैदी जेलों में बंद हैं।
  • छत्‍तीसगढ़ में यह आँकड़ा 233.9%, जबकि राजधानी दिल्‍ली में 226.9% है।

कारण और उपाय

  • जेलों की क्षमता से अधिक कैदी होने की संख्या के प्राथमिक कारणों में सबसे प्रमुख कारण न्यायालयों में लंबित पड़े मामलें हैं।
  • 31 मार्च, 2016 तक के आँकड़ों के अनुसार देश के विभिन्न न्यायालयों में तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित पाए गए, देश में प्रत्येक तीन जेल कैदियों में से दो ऐसे हैं जिनके केस विचाराधीन (Undertrials) हैं। उदाहरण के लिये, एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक 2015 में 4,19,623 कैदियों में से 2,82,076 कैदियों अर्थात् 67% के मामले विचाराधीन थे।
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जेलों में अमानवीय परिस्थितियों में बंद कैदियों के संबंध में दिये गए अपने ऐतिहासिक फैसले में आठ सूत्री दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया गया, जिनमें विचाराधीन मामले एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। उदाहरण के तौर पर :

♦ हर ज़िले में अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी (Undertrial Review Committee) की प्रत्येक तिमाही पर मुलाकात होनी चाहिये।
♦ समिति को सीआरपीसी की धारा 436 और 436A के प्रभावी कार्यान्वयन से संबंधित पहलुओं पर विचार करना चाहिये ताकि वैसे कैदी जो गरीबी के कारण जमानत अनुबंध को पूरा नहीं कर सकते हैं, केवल इस कारण से कैद में न रहें।
♦ ज़िला कानूनी सेवा समिति सचिव द्वारा संयोजनीय अपराधों में अंडरट्रायल कैदियों की रिहाई के मुद्दे पर विचार किया जाएगा, इसके अंतर्गत संयोजनीय अपराधियों का पता लगाने का प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, न कि ट्रायल शुरू किये जाने की।

जेलों के आधुनिकीकरण हेतु योजना

  • अधिक-से-अधिक कैदियों और फास्ट ट्रैक मामलों को समायोजित करने के बावजूद जेलों में भीड़-भाड़ कम नहीं हो रही है। इन सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2002-03 में गृह मंत्रालय द्वारा जेलों के आधुनिकीकरण हेतु एक गैर-योजना शुरू की गई थी।
  • इसके अंतर्गत बहुत से पक्षों को शामिल किया गया था जिनमें विभिन्न जेलों के निर्माण के साथ-साथ अतिरिक्त बैरकों के निर्माण की कल्पना की गई थी। 27 राज्यों के लिये इस योजना के लिये शुरुआती पाँच साल का परिव्यय 1800 करोड़ रुपए था। 
  • गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2011 तक 119 नए जेल और 1,572 बैरकों का निर्माण किया गया, जिसमें इस योजना के आवंटित धनराशि में से तकरीबन 98% का इस्तेमाल किया गया।
  • 13 मार्च, 2018 को लोकसभा में दिये गए एक प्रश्न के उत्तर में सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार, जेलों में बड़ी संख्या में कैदियों की मौजूदगी का अहम कारण लंबित मामलों की अधिक संख्या का होना है।
  • इस समस्या का समाधान करने के लिये निम्नलिखित उपाय किये गए है जो इस प्रकार है- 

♦ फास्ट-ट्रैक न्यायालयों की स्थापना करना।
♦ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में खुली जेलों की स्थापना करना।
♦ न्याय वितरण और कानूनी सुधार के लिये एक राष्ट्रीय मिशन का शुभारंभ करना।
♦ सीआरपीसी की धारा 265 के ज़रिये याचिका सौदेबाजी (plea bargaining) की अवधारणा को प्रस्तुत करना।
♦ सीआरपीसी की धारा 436 ए का सम्मिलन करना जो किसी कैदी को हिरासत में रखने की अधिकतम अवधि का निर्धारण करता है।
♦ राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (National Legal Services Authority - NALSA) द्वारा सीआरपीसी मापदंडों के तहत याचिका सौदेबाजी का प्रचार करना।
♦ नालसा के कानूनी सेवा क्लीनिकों द्वारा सभी अभियुक्त कैदियों को निःशुल्क कानूनी सेवाएँ प्रदान की जा रही हैं।

अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • एक तरफ जहाँ देश की जेलें क्षमता से अधिक भीड़ की समस्या का सामना कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर इनमें जेल कर्मचारियों की भारी कमी एक अन्य समस्या बनी हुई है।
  • नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (नालसा) की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, देश भर की जेलों में कर्मचारियों की अनुमोदित क्षमता 77,230 है लेकिन इनमें से तकरीबन 24,588 अर्थात् 30% (31 दिसंबर, 2017 तक) से भी अधिक पद खाली हैं।
  • नालसा द्वारा निरंतर कैदियों को कानूनी सहायता उपलब्‍ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
  • गृह मंत्रालय द्वारा नालसा के कॉर्डिनेशन में एक साफ्टवेयर तैयार कराया जा रहा है जिसमें कैदियों के व्यक्तिगत विवरण के साथ-साथ उनकी सजा तथा अपराध से संबंधित पूरा डाटा निहित किया जाएगा।
  • यह कार्य इस उद्देश्य से किया जा रहा है ताकि सजा काटकर बाहर जाने की कोशिश कर रहे कैदियों को कानूनी सहायता पहुँचाने में इसका सहयोग लिया जा सके।
  • हालाँकि, इस साफ्टवेयर से अभी तक केवल 700 जेलों को ही जोड़ा जा सका है। अधिक-से-अधिक जेलों को कंप्‍यूटराइज्‍़ड करने का प्रयास किया जा रहा है।

जेलों का प्रबंधन कैसे किया जाता है?

  • संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule to the Constitution) की लिस्ट II के चौथे खंड के तहत, जेलों को प्रीज़ंस एक्ट (Prisons Act) 1894 और संबंधित राज्य सरकारों के प्रिज़न मैनुअल (Prison Manuals) द्वारा शासित किया जाता है।
  • इस प्रकार, वर्तमान जेल कानूनों, नियमों और विनियमों को परिवर्तित करने के संदर्भ में प्राथमिक भूमिका, ज़िम्मेदारी और अधिकार राज्य सरकारों का है।हालाँकि, केंद्र द्वारा भी समय-समय पर जेलों के आधुनिकीकरण के लिये विभिन्न समितियों की स्थापना की गई है। 2016 में गृह मंत्रालय द्वारा एक मॉडल प्रिज़न मैनुअल (model prison manual) तैयार किया गया तथा कार्यान्वयन के लिये सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को भेजा गया।

वास्तविक स्थिति

  • देश में आधे से अधिक जेल उप-जेल, एक-चौथाई ज़िला जेल और एक दसवें केंद्रीय जेल हैं।
  • आँकड़ों के अनुसार जेलों में सबसे अधिक पुरुष कैदियों की संख्या है। 2016 में देश की जेलों में 26,068 या 71% की क्षमता के मुकाबले 18,498 महिला कैदी थीं, जबकि 3,54,808 की क्षमता के मुकाबले 4,14,505 पुरुष कैदी जेल में बंद थे।
  • हालाँकि, कई राज्य ऐसे भी है जहाँ महिला कैदियों की संख्या क्षमता से अधिक पाई गई। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक महिला कैदी (186%) थी, इसके बाद उत्तराखंड (141%), दिल्ली (138%), गोवा (120%) और उत्तर प्रदेश (117%) का स्थान आता है।
  • इस संदर्भ में गोवा एक अपवाद के रूप में प्रस्तुत होता है। यहाँ महिला कैदियों की संख्या क्षमता से 20% अधिक पाई गईं, जबकि पुरुष कैदियों की क्षमता 36% से कम थी।

कैदियों की स्थिति

  • एक साल में जेलों में 1584 कैदियों ने दम तोड़ा। एक जानकारी के अनुसार, जेलों में अव्‍यवस्‍थाओं के कारण वर्ष 2015 में 1584 कैदियों की मृत्यु हुई। इन मौतों में 1469 प्राकृतिक मौतें हैं, जबकि 115 अप्राकृतिक मौतें हैं।
  • यदि महिला कैदियों की बात करें तो ज्ञात होता है कि इस एक वर्ष के दौरान 51 महिला कैदियों की मृत्यु हुई। इनमें से 48 प्राकृतिक मौतें थी, जबकि तीन महिलाओं की मौत अप्राकृतिक रूप से हुई।

क्या किये जाने की आवश्यकता है?

  • उपरोक्त के संबंध में एक बात तो स्पष्ट है कि देश में जेलों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। ऐसे में जेलों के प्रति अधिक-से-अधिक संवेदनशील होने की ज़रूरत है।
  • किसी व्यक्ति को उसके अपराध के लिये सज़ा देना एक अलग बात है, लेकिन अपराधी के प्रति असंवेदनशील होना और मानवाधिकारों का उल्‍लंघन करना दूसरी बात है।
  • इस संदर्भ में स्पष्ट रूप से इस बात पर विशेष रूप से विचार किया जाना चाहिये कि जेल के अंदर जो व्यक्ति अपराधी के रूप में कैद है वह एक जीवित व्यक्ति है जिसे पूर्ण रूप से सम्मान से जीने का अधिकार प्राप्त है।
  • इसके साथ-साथ जेलों के बुनियादी ढाँचे में भी सुधार किये जाने की आवश्यकता है, खुली जेलें बननी चाहिये। 
  • जेल में बंद कैदियों से सिर्फ पापड़ और अगरबत्‍ती जैसे उत्पादों का निर्माण करवाने की बजाय अन्‍य उपयोगी कार्यों में भी उन्हें संलग्न किया जाना चाहिये ताकि उनके पुनर्वास और सुधार के लिये उपयोगी कदम उठाए जा सकें।
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