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भारत का समुद्री सिद्धांत

  • 03 Apr 2021
  • 6 min read

यह एडिटोरियल 30/03/2021 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित लेख “It is time to reimagine the Indian Ocean” पर आधारित है। इसमें भारत के समुद्री सिद्धांत की चुनौतियों पर विचार व्यक्त किया गया है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

हाल ही में जो बाइडन के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका के नए रक्षा सचिव ने भारत का दौरा किया। इस यात्रा का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों और अमेरिकी समुद्री बलों के बीच सहयोग बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करना था।

यह अमेरिकी विदेश नीति में विशेष रूप से भारत-प्रशांत संबंधों में भारत के रणनीतिक महत्त्व को रेखांकित करता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से भारत ने हिंद महासागर में मुख्य रूप से अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण एक लाभप्रद स्थिति प्राप्त की है।

इसके अलावा शीत युद्ध की समाप्ति के बाद प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्द्धा में आई कमी ने भारत को अपने सीमित समुद्री दृष्टिकोण के साथ हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी की भूमिका में बने रहने की संभावना को बढ़ाया है, हालाँकि भारत की समुद्री नीति के समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी हैं।

भारत के समक्ष समुद्री नीति संबंधी चुनौतियाँ:

  • हिंद महासागर में साइलो-केंद्रित दृष्टिकोण- भारतीय राजनेताओं ने हिंद महासागर को कई उप-क्षेत्रों में विभाजित किया है।
    • भारत, हिंद महासागर में अपने रणनीतिक सहयोगियों के रूप में मॉरीशस और सेशेल्स के साथ एक परंपरागत काल्पनिक रेखा खींचता है।
    • उप-क्षेत्रों के संदर्भ में भारत की प्राथमिकता उत्तरी (अरब सागर और बंगाल की खाड़ी) और पूर्वी हिंद महासागर (अंडमान सागर और मलक्का जलडमरूमध्य) में है।
    • इसके कारण पश्चिमी हिंद महासागर और अफ्रीका के पूर्वी तट अभी भी भारत की विदेश नीति की समुद्री परिधि में बने हुए हैं।
  • सामरिक चोक पॉइंट की कमज़ोर स्थिति- चीन ने अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा पश्चिमी हिंद महासागर में हॉर्न ऑफ अफ्रीका के जिबूती में स्थापित किया था।
    • रूस ने भी हाल ही में सूडान, स्वेज़ नहर और बाब-अल-मंदेब (हिंद महासागर में) के मध्य लाल सागर तट पर एक रणनीतिक चोक पॉइंट का अधिग्रहण किया है।
    • हालाँकि एंटी-पायरेसी मिशन से परे इस क्षेत्र में भारत की उपस्थिति और अफ्रीकी तट के साथ समुद्री जुड़ाव काफी हद तक इसकी विशेषता रही है।
  • चीनी मुखरता का बढ़ना- समुद्री रेशम मार्ग के माध्यम से चीन महासागर के पार समुद्री तटों (Littorals) और द्वीपों के साथ संलग्नता बनाए हुए है।
    • चीन, हिंद महासागर में पहुँच बढ़ाने के लिये श्रीलंका से कोमोरोस तक अपनी कूटनीतिक, राजनीतिक और सैन्य क्षमता में लगातार सुधार कर रहा है।
  • महाद्वीपीय पूर्वाग्रह- भारतीय नौसेना को लगभग 14% रक्षा बजट आवंटित किया जाना स्पष्ट रूप से रक्षा प्रतिष्ठानों की प्राथमिकता को इंगित करता है। साथ ही यह संकेत भी देता है कि समुद्री मुद्दों की ओर भारत ने अपना ध्यान भली-भाँति केंद्रित नहीं किया है।

आगे की राह:

  • विदेश और रक्षा नीतियों का समन्वय:  वर्ष 2016 में विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs- MEA) के तहत हिंद महासागर प्रभाग की स्थापना यह दर्शाती है कि MEA अधिक सक्रिय दृष्टिकोण अपना रहा है।
    • हालाँकि रक्षा क्षेत्र का विदेश नीति के साथ समन्वय होना आवश्यक है।
  • हिंद महासागर का समग्र दृष्टिकोण: हिंद महासागर क्षेत्र में चीन, भारत के हितों के समक्ष प्रमुख प्रतियोगी के रूप में उभर रहा है।
    • इस प्रकार हिंद महासागर को एक अविरत स्थान (Continuous Space) के रूप में देखने और क्षेत्रीय गतिशीलता को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता है।
  • महत्त्वपूर्ण खिलाड़ियों के साथ सहयोग: भारत को अमेरिका के साथ बहुपक्षीय समूहों के नेटवर्क जैसे कि भारत-ऑस्ट्रेलिया-जापान मंच और फ्राँस तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ त्रिपक्षीय बातचीत के माध्यम से अपनी साझेदारी को बढ़ाना चाहिये।

निष्कर्ष

हालाँकि यह कदम भारत के हालिया महाद्वीपीय मुद्दों जैसे डोकलाम और लद्दाख आदि को सुलझाने के लिये नहीं है, यहाँ समुद्री भूगोल के महत्त्व और भारत के रणनीतिक हितों तथा इस क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा से इसकी संलग्नता को समझने की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न- एक विश्वसनीय समुद्री सिद्धांत को तैयार करने में भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिये।

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