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कोविड-19 के कारण लैंगिक समानता को खतरा: यूनेस्को अध्ययन

  • 22 Nov 2021
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

यूनेस्को, अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस, ‘नो-टेक’ और ‘लो-टेक’ रिमोट लर्निंग 

मेन्स के लिये:

कोविड-19 के कारण स्कूल बंद होने के लैंगिक प्रभाव 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में यूनेस्को ने ‘व्हेन स्कूल्स शट’ नामक एक नया अध्ययन जारी किया, जिसमें सीखने, स्वास्थ्य और कल्याण पर कोविड-19 के कारण स्कूल बंद होने के लैंगिक प्रभाव को उजागर किया गया है।

इसे वर्ष 2021 में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस (11 अक्तूबर) के अवसर पर जारी किया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस:

  • इतिहास:
    • वर्ष 1995 में बीजिंग में आयोजित महिलाओं पर वैश्विक सम्मेलन में युवा और कमज़ोर लड़कियों पर केंद्रित एक कार्यक्रम की आवश्यकता की पहचान की गई थी।
    • यह पहल युवा महिलाओं के सामने आने वाली चुनौती का समाधान करने के लिये एक गैर-सरकारी अंतर्राष्ट्रीय कार्ययोजना के रूप में शुरू हुई।
    • 11 अक्तूबर को अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस घोषित करने का एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2011 में अपनाया गया था।
    • वर्ष 2020 में इसने बीजिंग घोषणापत्र को अपनाने के 25 साल पूरे कर लिये।
  • लक्ष्य:
    • यह दुनिया भर में युवा लड़कियों की आवाज़ को सशक्त बनाने और बढ़ाने के लिये मनाया जाता है।
  • 2021 की थीम:
    • 'डिजिटल जनरेशन', हमारी जनरेशन'।

प्रमुख बिंदु

  • अध्ययन के बारे में:
    • ‘व्हेन स्कूल्स शट’: कोविड-19 के कारण स्कूल बंद होने के लैंगिक प्रभाव” शीर्षक वाले वैश्विक अध्ययन से पता चलता है कि इसने लड़कियों और लड़कों, युवा महिलाओं व पुरुषों को स्कूल बंद होने की वजह से अलग तरह से प्रभावित किया था।
    • कोविड-19 महामारी के चरम समय पर 190 देशों में 1.6 बिलियन छात्र स्कूल बंद होने से प्रभावित हुए थे।
  • लैंगिक प्रभाव के क्षेत्र: 
    • घरेलू मांग:
      • गरीब परिवारों के संदर्भों में लड़कियों के सीखने का समय घर के बढ़ते कामों के कारण बाधित होता था। सीखने में लड़कों की भागीदारी आय-सृजन गतिविधियों तक सीमित थी।
    • डिजिटल डिवाइड:
      • इंटरनेट-सक्षम उपकरणों तक सीमित पहुँच, डिजिटल कौशल की कमी और तकनीकी उपकरणों के उपयोग को प्रतिबंधित करने वाले सांस्कृतिक मानदंडों के कारण लड़कियों को कई संदर्भों में डिजिटल दूरस्थ आधार पर सीखने के तौर-तरीकों में संलग्न होने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
        • अध्ययन में कहा गया है कि ‘डिजिटल लैंगिक विभाजन’ कोविड-19 संकट से पहले से ही एक चिंता का विषय था।
    • स्कूल वापसी की दर:
      • स्कूल वापसी दरों के बारे में आज तक उपलब्ध सीमित आँकड़े भी लैंगिक असमानताओं को दर्शाते हैं।
        • केन्या में चार काउंटियों में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि 16% लड़कियाँ और 15 से 19 वर्ष की आयु के 8% लड़के वर्ष 2021 की शुरुआत में स्कूल फिर से खुलने के बाद के दो महीनों के दौरान नामांकन करने में विफल रहे।
    • स्वास्थ्य पर प्रभाव:
      • स्कूल बंद होने से बच्चों के स्वास्थ्य पर असर पड़ा है, खासकर उनके मानसिक स्वास्थ्य, भलाई और सुरक्षा पर।
        • दुनिया भर के 15 देशों में लड़कियों ने लड़कों की तुलना में अधिक तनाव, चिंता और अवसाद की सूचना दी। LGBTQ शिक्षार्थियों ने उच्च स्तर के अलगाव और चिंता की सूचना दी।
  • सिफारिशें:
    • नीतियों और कार्यक्रमों में कारक लिंग:
      • इस अध्ययन में शिक्षा समुदाय से आह्वान किया गया है कि वे कमज़ोर और संवेदनशील  समुदायों की घटती भागीदारी और स्कूल में वापसी की कम दरों से निपटने के लिये नीतियों व कार्यक्रमों में लिंग कारक को शामिल करें, जिसमें नकद हस्तांतरण तथा गर्भवती लड़कियों और किशोर उम्र की माताओं को विशिष्ट सहायता शामिल है।
    • ट्रेंड को ट्रैक करना और नीतिगत हस्तक्षेपों का विस्तार:
      • बाल विवाह के साथ-साथ जबरन विवाह को समाप्त करने के लिये रुझानों को ट्रैक करने एवं नीतिगत हस्तक्षेपों का विस्तार करने हेतु निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है तथा ऐसी प्रथाएँ जो लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार को प्रभावित करती हैं तथा उनकी दीर्घकालिक संभावनाओं को कम करती हैं, को जल्द-से-जल्द समाप्त किये जाने की आवश्यकता है।
    • ‘नो-टेक’ और ‘लो-टेक’ रिमोट लर्निंग सॉल्यूशंस:
      • ‘नो-टेक’ और ‘लो-टेक’ रिमोट लर्निंग सॉल्यूशंस, स्कूलों को व्यापक मनोसामाजिक सहायता प्रदान करने हेतु उपायों के साथ-साथ डेटा के माध्यम से भागीदारी की निगरानी करने हेतु आवश्यक है।

स्रोत: द हिंदू

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