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गोवा में नही बनेगा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा

  • 01 Apr 2019
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) द्वारा गोवा में एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिये दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति (Eco Clearance) मंजूरी को निलंबित कर दिया गया।

प्रमुख बिंदु

  • हाल ही में शीर्ष अदालत में गोवा राज्य ने यात्रियों की बढ़ती मात्रा को समायोजित करने के लिये नए हवाई अड्डे बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला था।
  • नए हवाई अड्डे की स्थापना को ‘नीति का विषय’ बताते हुए पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (Environmental Impact Assessment- EIA) प्रक्रिया में छूट देने के लिये अदालत से पर्यावर्णीय नियमों को नज़रंदाज करने का आग्रह किया गया। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने स्वास्थ्य एवं जीवन के अधिकार को संरक्षित करने के लिये पर्यावरणीय स्वीकृति को निलंबित कर दिया।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्णय लेने वालों की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि पर्यावरण के हर महत्त्वपूर्ण पहलू का पर्याप्त अध्ययन किया जाए और प्रस्तावित गतिविधि के प्रभाव का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाए।
  • पर्यावरण के नियमों को मज़बूती प्रदान करने की आवश्यकता को देखते हुए न्यायाधीशों की एक बेंच ने कहा है कि देश के शासन और संस्थानों की प्रत्येक शाखा को पर्यावरणीय नियम एवं कानून को लागू करने का प्रयास करना चाहिये।

विकास बनाम पर्यावरण

  • पर्यावरण संरक्षण और विकास को अक्सर अलग-अलग, यहाँ तक की कई बार एक-दूसरे का विरोधी भी समझा जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इन्हें एक साथ लाए बिना वर्तमान पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना काफी कठिन है। यह बहुत कम बार देखा गया है कि विकासात्मक परियोजनाओं को पारित करने से पहले उसके संभावित पर्यावरणीय पहलुओं पर पर्याप्त संवेदनशीलता से विचार किया गया हो।
  • भारत में वर्ष 2006 में ही पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (Environmental Impact Assesment) को अपनाया गया है। साथ ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) भी अस्तित्व में है। इसके बावजूद विकासात्मक परियोजनाओं को एकांगी दृष्टिकोण से पारित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का गठन वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत किया गया।
  • बहु-अनुशासनात्मक समस्याओं वाले पर्यावरणीय विवादों को सुलझाने के लिये आवश्यक विशेषज्ञता से सुसज्जित यह एक विशिष्ट निकाय है।
  • यह अधिकरण नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत निर्धारित प्रक्रिया द्वारा बाध्य नहीं है बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित है।
  • इसकी स्थापना पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन तथा व्यक्तियों एवं संपत्ति के नुकसान के लिये सहायता और क्षतिपूर्ति देने या उससे संबंधित या जुड़े मामलों सहित, पर्यावरण संरक्षण एवं वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और तेज़ी से निपटारे के लिये की गई है।

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment- EIA)

  • EIA स्थायी विकास के लिये प्राकृतिक संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सुनिश्चित करने के लिये महत्वपूर्ण प्रबंधकीय तकनीक है ।
  • हमारे देश में 1978-79 में नदी घाटी परियोजनाओं के प्रभावपूर्ण मूल्यांकन के साथ इस दिशा में शुरुआत की गई थी और तत्पश्चात् अन्य विकासात्मक क्षेत्रों, जैसे उद्योग, ताप विद्युत परियोजना, खनन स्कीम इत्यादि को शामिल करने के लिये कार्यक्षेत्र का विस्तार किया गया ।
  • पर्यावरण संबंधी आँकड़े एकत्रित करने और प्रबंधन की योजनाएँ तैयार करने की सुविधा प्रदान करने के लिये दिशा-निर्देश तैयार किये गए और उन्हें संबंधित केंद्र एवं राज्य शासन के विभागों में परिचालित किया गया ।
  • EIA को अब पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम,1986 के अंतर्गत विकासात्मक गतिविधियों की उन 29 श्रेणियों के लिये अनिवार्य कर दिया गया है, जिनमें 50 करोड़ रुपए या इससे अधिक का निवेश शामिल हो।

निष्कर्ष

  • मज़बूत कानून होने का प्रत्यक्ष प्रभाव पर्यावरण की सुरक्षा से संबंधित है।
  • पर्यावरण दोहन के खिलाफ एक दृढ़ एवं मज़बूत शासन की बहुत ज़रूरत है क्योंकि एक मज़बूत शासन ही पर्यावरणीय कानून को व्यापक रूप से मज़बूत कर स्थायी, आर्थिक और सामाजिक विकास का समर्थन कर सकेगा फलस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के साथ साथ शांति और सुरक्षा स्थापित की जा सकेगी तथा मानव और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित होगी।
  • उच्चतम न्यायालय के अनुसार, पर्यावरण नियम कानून के मज़बूत प्रवर्तन के लिये पारदर्शिता आवश्यक है। कानून के शासन के लिये एक ऐसे शासन की आवश्यकता होती है जिसमें प्रभावी, जवाबदेह और पारदर्शी संस्थान हों।

स्रोत- द हिंदू

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