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जैव विविधता और पर्यावरण

इको सेंसिटिव ज़ोन पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

  • 04 Jun 2022
  • 15 min read

प्रिलिम्स के लिये:

इको सेंसिटिव ज़ोन, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना, राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, संरक्षित वन। 

मेन्स के लिये:

जैवविविधता और इसका संरक्षण, इको सेंसिटिव ज़ोन, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना। 

चर्चा में क्यों?  

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि देश भर में प्रत्येक संरक्षित वन, राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य में उनकी सीमांकित सीमाओं से कम-से-कम एक किमी. का अनिवार्य  इको सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) होना चाहिये। 

  • यह फैसला तमिलनाडु के नीलगिरि ज़िले में वन भूमि की सुरक्षा के लिये दायर एक याचिका पर आया है। 

फैसले की मुख्य विशेषताएंँ: 

  • केंद्र ने फरवरी 2011 में ESZ पर दिशा-निर्देश ज़ारी करते हुए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर 10 किलोमीटर की सीमा निर्धारित की थी। 
    • न्यायालय इस तथ्य से अवगत था कि सभी राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के लिये एक समान ESZ संभव नहीं होगा क्योंकि इसने मुंबई में संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान और चेन्नई में गिंडी राष्ट्रीय उद्यान जैसे विशेष मामलों का उल्लेख किया जो महानगर के बहुत करीब स्थित हैं। 
  • यदि मौजूदा ESZ 1 किमी. बफर ज़ोन से अधिक होता है या यदि कोई वैधानिक संस्था उच्च सीमा निर्धारित कराती है, तो ऐसी विस्तारित सीमा मान्य होगी। 
  • राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के भीतर खनन की अनुमति नहीं होगी। 
  • निर्णय ऐसे सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में लागू होगा जहांँ न्यूनतम ESZ सीमा निर्धारित नहीं है। 
  • व्यापक जनहित में ESZ की न्यूनतम चौड़ाई को कम किया जा सकता है। 
    • संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश न्यायालय द्वारा नियुक्त केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) और MOEFCC (पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) से संपर्क करेंगे और ये दोनों निकाय इस न्यायालय को संबंधित राय या सिफारिशें देंगे जिसके आधार पर न्यायालय उचित आदेश पारित करेगा। 
  • न्यायालय ने प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) को निर्देश दिया कि वह प्रत्येक राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य के ESZ में जारी गतिविधियों की सूची प्रदान करते हुए न्यायालय को तीन महीने में रिपोर्ट प्रस्तुत करे। 
  • न्यायालय ने मामले को PCCF को यह सुनिश्चित करने के लिये सौंपा कि ESZ के भीतर कोई नया स्थायी ढाँचा नहीं बने और जो पहले से ही कोई गतिविधि कर रहे हैं उन्हें छह महीने के भीतर PCCF से अनुमति हेतु नए सिरे से आवेदन करना होगा। 

इको सेंसिटिव ज़ोन: 

  • परिचय:  
    • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना (2002-2016) ने निर्धारित किया कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत राज्य सरकारों को राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं के 10 किमी. के भीतर आने वाली भूमि को इको सेंसिटिव ज़ोन या पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) घोषित करना चाहिये।    
  • उद्देश्य: 
    • इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आस-पास कुछ गतिविधियों को विनियमित करना है ताकि संरक्षित क्षेत्रों के निकटवर्ती संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र पर ऐसी गतिविधियों के नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।
    • ये क्षेत्र उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्रों से कम सुरक्षा वाले क्षेत्रों में संक्रमण क्षेत्र के रूप में कार्य करेंगे। 
  • निषिद्ध गतिविधियाँ:  
    • वाणिज्यिक खनन, आरा मिलें, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग, प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं  की स्थापना, लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग। 
    • पर्यटन गतिविधियाँ जैसे- राष्ट्रीय उद्यान के ऊपर गर्म हवा के गुब्बारे, अपशिष्टों का निर्वहन या कोई ठोस अपशिष्ट या खतरनाक पदार्थों का उत्पादन। 
  • विनियमित गतिविधियाँ:  
    • पेड़ों की कटाई, होटलों और रिसॉर्ट्स की स्थापना, प्राकृतिक जल का व्यावसायिक उपयोग, बिजली के तारों का निर्माण, कृषि प्रणाली में भारी परिवर्तन, जैसे- भारी प्रौद्योगिकी, कीटनाशकों आदि को अपनाना, सड़कों को चौड़ा करना। 
  • अनुमति प्राप्त गतिविधियाँ:  
    • संचालित कृषि या बागवानी प्रथाएँ, वर्षा जल संचयन, जैविक खेती, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग, सभी गतिविधियों के लिये हरित प्रौद्योगिकी को अपनाना। 
  • महत्त्व:  
    • विकास गतिविधियों के प्रभाव को कम करना: 
      • शहरीकरण और अन्य विकासात्मक गतिविधियों के प्रभाव को कम करने के लिये संरक्षित क्षेत्रों से सटे क्षेत्रों को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित किया गया है। 
    • इन-सीटू संरक्षण:  
      • ESZ इन-सीटू संरक्षण में मदद करते हैं, जो अपने प्राकृतिक आवास में लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण से संबंधित है, उदाहरण के लिये काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, असम में एक सींग वाले गैंडे का संरक्षण। 
    • वन क्षरण और मानव-पशु संघर्ष को कम करना: 
      • इको-सेंसिटिव ज़ोन वनों की कमी और मानव-पशु संघर्ष को कम करते हैं। 
      • संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन के मूल और बफर मॉडल पर आधारित होते हैं, जिनके माध्यम से स्थानीय क्षेत्र के समुदायों को भी संरक्षित और लाभान्वित किया जाता है। 

इको-सेंसिटिव ज़ोन के लिये चुनौतियाँ:   

  • विकासात्मक गतिविधियाँ: 
    • ESZ में बांँधों, सड़कों, शहरी और ग्रामीण बुनियादी ढांँचे के निर्माण जैसी गतिविधियांँ हस्तक्षेप करती हैं, जो पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं और पारिस्थितिक तंत्र को असंतुलित करती हैं। 
  • शासन और नए कानून: 
    • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 वन समुदायों के अधिकारों की अनदेखी करते हैं तथा जानवरों के अवैध शिकार को रोकने में विफल रहे हैं। ये ESZs में विकास गतिविधियों का समर्थन करते है। 
  • पर्यटन:  
    • पर्यावरण पर्यटन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये वनों की कटाई, स्थानीय लोगों के विस्थापन आदि के माध्यम से पार्कों और अभयारण्यों के आसपास की भूमि को साफ किया जा रहा है। 
  •  विदेशी प्रजातियों का हस्तक्षेप: 
    • यूकेलिप्टस और बबूल औरिक्युलरिस आदि जैसी विदेशी प्रजातियांँ तथा उनका वृक्षारोपण प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले वनों पर एक प्रतिस्पर्द्धी दबाव पैदा करते हैं। 
  • जलवायु परिवर्तन: 
    • जलवायु परिवर्तन ने ESZs पर भूमि, जल और पारिस्थितिक तनाव उत्पन्न किया है। उदाहरण के लिए बार-बार जंगल में आग या असम की बाढ़ जिसने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान तथा उसके वन्यजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। 
  • स्थानीय समुदाय: 
    • झूम खेती, बढ़ती आबादी का दबाव और जलाऊ लकड़ी तथा वनोपज की बढ़ती मांग आदि संरक्षित क्षेत्रों पर दबाव डालते हैं। 

आगे की राह 

  • राज्यों को प्राकृतिक संसाधनों के संबंध में आम जनता के लाभ के लिये एक ट्रस्टी के रूप में कार्य करना चाहिये ताकि दीर्घकालिक विकास किया जा सके। 
  • सरकार को अपनी भूमिका को राज्य के तत्काल उत्थान के लिये आर्थिक गतिविधियों के सूत्रधार की भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहिये। 
  • वनीकरण और अवक्रमित वनों का पुनर्वनीकरण, खोए हुए आवासों का पुनर्जनन, कार्बन फुटप्रिंट को बढ़ावा दिया जा सकता है। 
  • संरक्षण तकनीकों का प्रचार-प्रसार करना और संसाधनों के अत्यधिक दोहन व जनता के बीच इसके प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जागरूकता पैदा करना। 

विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs): 

प्रश्न. भारत में संरक्षित क्षेत्रों की निम्नलिखित में से किस एक श्रेणी में स्थानीय लोगों को बायोमास एकत्र करने और उपयोग करने की अनुमति नहीं है? (2012) 

(a) बायोस्फीयर रिज़र्व 
(b) राष्ट्रीय उद्यान 
(c) रामसर कन्वेंशन के तहत घोषित आर्द्रभूमि 
(d) वन्यजीव अभयारण्य 

उत्तर: B 

व्याख्या: 

  • राष्ट्रीय उद्यान: यह एक ऐसा क्षेत्र है जो अभयारण्य के भीतर स्थित हो या नहीं, राज्य सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय उद्यान के रूप में गठन के लिये अधिसूचित किया जा सकता है, इसका उद्देश्य पारिस्थितिक, जीव, पुष्प, भू-आकृति विज्ञान या प्राणी संघ या महत्त्व को देखते हुए आवश्यक वन्यजीवों या उसके पर्यावरण की रक्षा तथा उनका विकास करना है। राष्ट्रीय उद्यान के भीतर राज्य के मुख्य वन्यजीव वार्डन द्वारा अध्याय IV, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में उल्लिखित शर्तों के तहत प्रदान की गई अनुमति के सिवाय, किसी भी प्रकार के मानवीय गतिविधियों की अनुमति नहीं है। 
  • बायोस्फीयर रिज़र्व: ये जैवविविधता के बड़े-बड़े क्षेत्र हैं जहाँ वनस्पतियों और जीवों की रक्षा की जाती है। पर्यावरण संरक्षण के ये क्षेत्र मोटे तौर पर IUCN श्रेणी V संरक्षित क्षेत्रों के अनुरूप हैं। भारत के बायोस्फीयर रिज़र्व में प्रायः एक या एक से अधिक राष्ट्रीय उद्यान या अभयारण्य शामिल होते हैं, साथ ही बफर ज़ोन भी होते हैं जो कुछ आर्थिक गतिविधियों के लिये खुले होते हैं। यह संरक्षण न केवल संरक्षित क्षेत्र के वनस्पतियों और जीवों को प्रदान किया जाता है, बल्कि उन मानव समुदायों को भी प्रदान किया जाता है जो इन क्षेत्रों में रहते हैं।  
  • वन्यजीव अभयारण्य: इसे राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना के माध्यम से परिभाषित किया गया है। वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने के लिये राज्य विधानसभा द्वारा कानून पारित करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। राज्य विधायिका संकल्प के माध्यम से सीमा का निर्धारण और प्रत्यावर्तन कर सकती है। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की मंजूरी के बिना वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है। अभयारण्य में सीमित मानवीय गतिविधियों की अनुमति है। 
  • रामसर कन्वेंशन के तहत अनुसूचित आर्द्रभूमि के स्थानीय लोगों को आर्द्रभूमि से बायोमास इकट्ठा करने से नहीं रोका जाता हैं बल्कि वे स्थानीय लोगों को आर्द्रभूमि के संरक्षण में भागीदार बनाते हैं। अतः विकल्प B सही है। 

स्रोत: द हिंदू 

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