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सामाजिक न्याय

दिव्यांग व्यक्तियों के लिये पदोन्नति में आरक्षण का अधिकार

  • 30 Jun 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये

सुगम्य भारत अभियान, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016, दिव्यांगजन अधिकारों संबंधी अन्य संवैधानिक प्रावधान

मेन्स के लिये

दिव्यांगजनों के लिये पदोन्नति में आरक्षण की आवश्यकता और महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को पदोन्नति में भी आरक्षण का अधिकार है।

  • एक दिव्यांग व्यक्ति तब भी पदोन्नति के लिये आरक्षण का लाभ प्राप्त कर सकता है, जब उसे सामान्य वर्ग में भर्ती किया गया हो या अक्षमता की स्थिति रोज़गार प्राप्त करने के बाद उत्पन्न हुई हो।

प्रमुख बिंदु

मामले के विषय में

  • यह मामला ‘दिव्यांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995’ के तहत प्रस्तुत एक दावे पर आधारित है।
    • इस अधिनियम को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 के साथ प्रतिस्थापित किया गया है।
  • केरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने आवेदक की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि सरकार द्वारा 1995 के अधिनियम की धारा 32 के तहत केरल राज्य में भर्ती के नियम, सामान्य नियम और इससे संबंधी आदेशों में पदोन्नति में किसी भी आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया है।
  • केरल उच्च न्यायालय ने केरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द कर दिया था।

निर्णय का महत्त्व

  • वर्ष 1995 का अधिनियम पदोन्नति में आरक्षण के अधिकार को मान्यता देता है।
  • वर्ष 1995 के अधिनियम की धारा 32 के अनुसार, आरक्षण के लिये पदों की पहचान नियुक्ति हेतु एक पूर्वापेक्षा है; लेकिन पदों की पहचान करने से इनकार करके नियुक्ति के लिये मना नहीं किया जा सकता है।
  • भर्ती नियमों में आरक्षण के प्रावधान की अनुपस्थिति किसी दिव्यांग व्यक्ति के अधिकार को समाप्त नहीं करती है, क्योंकि दिव्यांग व्यक्ति को यह अधिकार कानून से प्राप्त होता है।
  • दिव्यांग व्यक्ति (PwD) को पदोन्नति के लिये आरक्षण दिया जा सकता है, भले ही वह व्यक्ति मूल रूप से PwD कोटे में नियुक्त न हुआ हो।
  • इसके अलावा दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करने का दायित्त्व भर्ती के समय उन्हें आरक्षण देने के साथ समाप्त नहीं होता है।
  • विधायी जनादेश दिव्यांग व्यक्तियों को पदोन्नति समेत संपूर्ण कॅॅरियर में प्रगति के लिये समान अवसर प्रदान करता है।
    • इस प्रकार यदि दिव्यांग व्यक्तियों को पदोन्नति से वंचित किया जाता है और यदि ऐसा आरक्षण सेवा में शामिल होने के प्रारंभिक चरण तक ही सीमित है तो यह विधायी जनादेश की उपेक्षा होगी ।
    • यदि आरक्षण की व्यवस्था नहीं की जाती है तो इसके परिणामस्वरूप दिव्यांग व्यक्ति एक निश्चित पद तक सीमित हो जाएंगे और उनमें मानसिक तनाव बढ़ेगा। 

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016

  • यह  अधिनियम विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ (United National Convention on the Rights of Persons with Disabilities- UNCRPD) के दायित्वों को पूरा करता है, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किये हैं।
  • इस अधिनियम में विकलांगता को एक विकसित और गतिशील अवधारणा के आधार पर परिभाषित किया गया है:
    • अपंगता के मौजूदा प्रकारों को 7 से बढ़ाकर 21 कर दिया गया है।
    • इस अधिनियम में मानसिक बीमारी, ऑटिज़्म, स्पेक्ट्रम विकार, सेरेब्रल पाल्सी, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, पुरानी न्यूरोलॉजिकल स्थितियांँ, बोलने और भाषा की विकलांगता, थैलेसीमिया, हीमोफिलिया, सिकल सेल रोग, बहरापर, अंधापन, एसिड अटैक से पीड़ित व्यक्ति तथा पार्किंसंस रोग सहित कई विकलांगताएंँ शामिल हैं, जिन्हें पूर्व अधिनियम में काफी हद तक नज़रअंदाज कर दिया गया था। 
    • इसके अलावा सरकार को किसी विशेष प्रकार की विकलांगता को अन्य श्रेणी में अधिसूचित करने का अधिकार दिया गया है।
  • यह अधिनियम दिव्यांग लोगों हेतु सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा को 3%-4% और उच्च शिक्षा संस्थानों में 3%-5% तक बढ़ाता है।
  • इस अधिनियम में बेंचमार्क विकलांगता (Benchmark-Disability) से पीड़ित 6 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिये निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गई है।
    • सरकारी वित्तपोषित शैक्षिक संस्थानों और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थानों को दिव्यांग बच्चों को समावेशी शिक्षा प्रदान करनी होगी।
  • सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign) को मज़बूती प्रदान करने एवं निर्धारित समय-सीमा में सार्वजनिक इमारतों (सरकारी और निजी दोनों) में दिव्यांगजनों की पहुँच सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है।
  • दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के लिये मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्त नियामक निकायों के रूप में कार्य करेंगे तथा  शिकायत निवारण एजेंसियांँ, अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी करेंगी।
  • दिव्यांगजनों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिये ‘राष्ट्रीय और राज्य निधि’ (National and State Fund) का निर्माण किया जाएगा।

भारत में दिव्यांगजनों हेतु संवैधानिक ढांँचा:

  • राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों (DPSP) के अनुच्छेद 41 में कहा गया है कि राज्य अपनी आर्थिक क्षमता एवं विकास की सीमा के भीतर काम, शिक्षा और बेरोज़गारी, वृद्धावस्था, बीमारी तथा अक्षमता के मामलों में सार्वजनिक सहायता के अधिकार को सुरक्षित करने हेतु  प्रभावी प्रावधान करेगा।
  • राज्य का विषय: विकलांगों और बेरोज़गारों को राहत' (Relief Of The Disabled and Unemployable’ ) का विषय संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में निर्दिष्ट है।

स्रोत: द हिंदू

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