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कृषि निर्यात के 'टर्म ऑफ रेफरेंस' पर रिपोर्ट

  • 01 Aug 2020
  • 7 min read

प्रीलिम्स के लिये:

वित्त आयोग, कृषि निर्यात

मेन्स के लिये:

भारत में कृषि निर्यात 

चर्चा में क्यों?

'पंद्रहवें वित्त आयोग' (Fifteenth Finance Commission) के कृषि निर्यात पर स्थापित 'उच्च स्तरीय समूह' (High Level Group- HLEG) द्वारा हाल ही में आयोग को अपनी रिपोर्ट पेश की गई।

प्रमुख बिंदु:

  • वित्त आयोग द्वारा HLEG की स्थापना, कृषि निर्यात को प्रोत्साहित करने तथा उच्च आयात को प्रतिस्थापन करने में सक्षम फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने तथा इस दिशा में राज्यों के लिये ‘मापने योग्य प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन’ (Measurable Performance Incentives) प्रणाली अपनाने के लिये सिफारिश करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • गहन अनुसंधान करने तथा विभिन्न हितधारकों से इनपुट लेने के बाद HLEG ने अपनी सिफारिशें वित्त आयोग को पेश की हैं। 

'टर्म ऑफ रेफरेंस' (Terms of Reference- ToR) 

  • बदलते अंतर्राष्ट्रीय व्यापार परिदृश्य में भारतीय कृषि उत्पादों (वस्तुओं, अर्द्ध-प्रसंस्कृत और प्रसंस्कृत) के निर्यात और आयात प्रतिस्थापन अवसरों का आकलन करना और निर्यात को स्थिरतापूर्वक बढ़ाने और आयात निर्भरता को कम करने की दिशा में सुझाव देना।
  • कृषि उत्पादकता बढ़ाने, उच्च मूल्य संवर्द्धन तथा कृषि अवशिष्ट में कमी को सुनिश्चित करने और कृषि से संबंधित लॉजिस्टिक अवसंरचना को मज़बूत करने की दिशा में आवश्यक सुझाव देना।  
  • कृषि मूल्य श्रृंखला में निजी क्षेत्र के निवेश के समक्ष बाधाओं की पहचान करना तथा तीन ऐसे नीतिगत उपायों और सुधारों का सुझाव देना ताकि इस क्षेत्र में निवेशों को आकर्षित किया जा सके।
  • वर्ष 2021-22 से वर्ष 2025-26 की अवधि के लिये राज्य सरकारों के लिये उपयुक्त 'प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन' प्रदान करने के लिये सुझाव देना तथा कृषि क्षेत्र में तेज़ी से सुधारों को अपनाने की दिशा में अन्य नीतिगत उपायों को लागू करना।

HLEG की सिफारिशें:

कृषि मूल्य श्रंखला:

  • 22 प्रमुख फसलों की मूल्य श्रृंखलाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है तथा मांग संचालित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
  • मूल्य श्रंखला क्लस्टरों (Value Chain Clusters-VCC) के संबंध में एकीकृत दृष्टिकोण को अपनाए जाने की आवश्यकता है तथा कृषि उत्पादों के 'मूल्य संवर्द्धन’ (Value Addition) पर मुख्यत: ध्यान देने की आवश्यकता है।

निजी क्षेत्र की भूमिका:

  • निजी क्षेत्र को मांग अभिविन्यास को सुनिश्चित करने और मूल्य संवर्द्धन पर ध्यान केंद्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिये। 
    • मांग अभिविन्यास वह विधि है, जिसमें किसी उत्पाद की कीमत उसकी मांग के अनुसार बदल दी जाती है
  • निजी क्षेत्र कृषि क्षेत्र में निर्यात की व्यवहार्यता, कार्यान्वयन, वित्त पोषण, प्रौद्योगिकी की उपलब्धता आदि के माध्यम से अपनी भूमिका निभा सकता है।

राज्य आधारित निर्यात योजना:

  • विभिन्न हितधारकों की भागीदारी के साथ राज्यों के नेतृत्त्व में विशेष 'कृषि निर्यात योजनाएँ' बनाई जानी चाहिये। 

राज्य आधारित निर्यात योजना (State-led Export Plan):

  • यह किसी फसल की मूल्य श्रृंखला में वृद्धि की दिशा में क्लस्टर आधारित व्यावसायिक योजना होगी। 
  • यह मूल्य श्रृंखला आधारित निर्यात की मांग को पूरा करने के लिये आवश्यक अवसर, पहल और निवेश को पूरा करने की दिशा में कार्य करेगी। 
  • योजना क्रिया-उन्मुख, समयबद्ध और परिणाम-केंद्रित होंगी।
  • योजना में निजी क्षेत्र को एंकर के रूप में तथा केंद्र को एक समर्थकारी (Enabling) के रूप में अपनी भूमिका निभानी चाहिये।
  • योजना के कार्यान्वयन और सहायता के लिये संस्थागत तंत्र को मज़बूत किया जाना चाहिये।
  • योजना का वित्तपोषण मौजूदा योजनाओं, वित्त आयोग के आवंटन और निजी क्षेत्र के निवेश के अभिसरण (Convergence) के माध्यम से किया जाना चाहिये।

कृषि निर्यात के समक्ष चुनौतियाँ:

आयात के कठोर मानदंड:

  • ताजे फल और सब्जियों के साथ ही अन्य सेनेटरी तथा फाइटोसेनेटरी मानदंडों को अनेक देशों द्वारा कठोर बनाया जा रहा है। 
  • आयातक देशों के मानदंडों का पालन करने के लिये केवल पंजीकृत किसानों से ही उपज की खरीद करना आवश्यक है। 

अवसंरचना संबंधी:

  • कृषि उत्पाद जल्दी ही खराब हो जाते हैं अत: फसल कटाई के समय बंदरगाहों पर कंटेनरों की उपलब्धता होना महत्त्वपूर्ण है। कृषि निर्यात के लिये बंदरगाहों पर कोई समर्पित स्थान नहीं होता है। 

फल-सब्जियों की गुणवत्ता:

  • गुणवत्ता के लिहाज से (शेल्फ लाइफ, रंग, आकार, सुगंध, आदि) के अनुसार, कुछ भारतीय फल वैश्विक बाज़ार में गैर-प्रतिस्पर्द्धी हैं। कुछ फलों की किस्म निर्यात के लिये उपयुक्त  नहीं है। 

कृषि निर्यात संभावना (Potential):

  • भारत का कृषि निर्यात में कुछ वर्षों में 40 बिलियन डॉलर से बढ़कर 70 बिलियन डॉलर हो सकता है, यदि इस दिशा में आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाएँ। 
  • कृषि निर्यात में वृद्धि से न केवल किसानों की आय बढ़ेगी अपितु अतिरिक्त निर्यात से अनुमानित 7-10 मिलियन नौकरियाँ पैदा होने की संभावना भी है।
  • इसके लिये कृषि निर्यात में अनुमानित 8-10 बिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता है ताकि बुनियादी ढाँचे, खाद्य प्रसंस्करण और मांग पूर्ति क्षमता का निर्माण किया जा सके। 

स्रोत: द हिंदू

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