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प्रमोटरों को ‘पर्सन इन कंट्रोल’ में बदलने का प्रस्ताव: SEBI

  • 13 May 2021
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने प्रमोटरों की अवधारणा को दूर करके इसे ‘पर्सन इन कंट्रोल’ में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया है। 

  • इसने प्रमोटरों हेतु एक सार्वजनिक मुद्दा और ‘इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग’ (IPO) के शेयरधारकों के लिये न्यूनतम लॉक-इन अवधि को कम करने का भी सुझाव दिया है।

सेबी:

  • SEBI, अप्रैल 1992 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के अनुसार स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड का मूल कार्य प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की रक्षा करना और प्रतिभूति बाज़ार को बढ़ावा देना और विनियमित करना है।

प्रमुख बिंदु:

प्रमोटर:

  • 'प्रवर्तक' और 'प्रवर्तक समूह' का अर्थ कंपनी अधिनियम, 2013 और SEBI (ICDR) विनियम, 2018 में परिभाषित किया गया है।
  • आमतौर पर एक प्रमोटर किसी स्थान पर एक विशेष व्यवसाय स्थापित करने के एक विचार की कल्पना करता है और कंपनी शुरू करने के लिये आवश्यक विभिन्न औपचारिकताओं को पूरा करता है।
  • प्रमोटर समूह में सम्मिलित हैं-
    • कोई भी कॉरपोरेट निकाय जिसमें व्यक्तियों या कंपनियों का एक समूह या कॉन्सर्ट का संयोजन होता है, जो उस कॉरपोरेट निकाय और इक्विटी शेयर पूंजी का 20% या उससे अधिक हिस्सा रखता है।
    • ऐसे व्यक्तियों या कंपनियों या उनके संयोजनों के समूह के पास जारीकर्त्ता की इक्विटी शेयर पूंजी का 20% या उससे अधिक हिस्सा होता है।
      • जारीकर्ता एक कानूनी इकाई होती है जो अपने संचालन के वित्तपोषण करने के लिये प्रतिभूतियों का विकास, पंजीकरण और बिक्री करती है।

प्रमोटरों को ‘पर्सन इन कंट्रोल’ में बदलने की अवधारणा:

  • आवश्यकता:
    • भारत में बदलते निवेशक परिदृश्य में बदलाव की आवश्यकता है, जहाँ निजी इक्विटी और संस्थागत निवेशकों जैसे नए शेयरधारकों के उद्भव के कारण, प्रमोटरों या प्रमोटर समूह के स्वामित्व और नियंत्रण अधिकार पूरी तरह से निहित नहीं होते हैं।
    • बोर्ड और प्रबंधन की गुणवत्ता पर निवेशकों का ध्यान बढ़ा है, जिससे प्रमोटर संबंधी अवधारणा की प्रासंगिकता कम हो गई है।
    • वर्तमान परिभाषा व्यक्तियों या इनके सामान्य समूह द्वारा ‘होल्डिंग्स’ पर कब्ज़ा करने पर केंद्रित है और प्रायः आम वित्तीय निवेशकों के साथ असंबंधित कंपनियों को कैप्चर करने के परिणाम से संबंधित है।
  • महत्त्व:
    • यह कदम फर्मों हेतु प्रकटीकरण के बोझ को हल्का करेगा।
    • स्वामित्व की प्रकृति में परिवर्तन उन स्थितियों को जन्म दे सकता है, जहाँ नियंत्रित अधिकार और अल्पसंख्यक हिस्सेदारी रखने वाले व्यक्तियों को एक प्रवर्तक के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
    • प्रमोटर कहलाने के कारण ऐसे व्यक्ति अपने आर्थिक हितों के लिये सूचीबद्ध संस्था को अधिक प्रभावित कर सकते हैं, जो सभी हितधारकों के हित में नहीं होता है।

संक्रमणकालीन अवधि:

  • इस अवधारणा में प्रमोटर से ‘पर्सन इन कंट्रोल’ में जाने के लिये तीन वर्ष की संक्रमण अवधि का सुझाव दिया गया है।

IPO की ‘लॉकिंग’ अवधि कम करना:

  • यदि इस मुद्दे के उद्देश्य में परियोजना हेतु पूंजीगत व्यय के अलावा बिक्री या वित्तपोषण संबंधी एक प्रस्ताव शामिल है तो IPO में आवंटन की तारीख से एक वर्ष के लिये न्यूनतम 20% प्रवर्तकों के योगदान को लॉक-इन किया जाना चाहिये।
    • वर्तमान में लॉक-इन अवधि तीन वर्ष है।

इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग:

  • ‘IPO’ प्राथमिक बाज़ार में प्रतिभूतियों की बिक्री हेतु जारी किया जाता है।
    • प्राथमिक बाज़ार पहली बार जारी की जा रही नई प्रतिभूतियों से संबंधित है। इसे ‘न्यू इश्यू मार्किट’ के रूप में भी जाना जाता है।
    • यह द्वितीयक बाज़ार से अलग है, जहाँ मौजूदा प्रतिभूतियों को खरीदा और बेचा जाता है। इसे शेयर बाज़ार या स्टॉक एक्सचेंज के रूप में भी जाना जाता है।
  • जब एक असूचीबद्ध कंपनी या तो प्रतिभूतियों का एक ताज़ा मुद्दा बनाती है या अपनी मौजूदा प्रतिभूतियों की बिक्री के प्रस्ताव को पहली बार जनता के सामने पेश करती है।
    • असूचीबद्ध कंपनियाँ वे हैं जो स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं।
  • यह आमतौर पर उन नई और मध्यम आकार की फर्मों द्वारा जारी किया जाता है जो अपने व्यवसाय को विकसित करने और विस्तार करने के लिए धन की तलाश में हैं।

IPO लॉकिंग अवधि:

  • किसी कंपनी के सार्वजनिक हो जाने के बाद कुछ समय के लिये यह जारी करना एक चेतावनी है, जब प्रमुख शेयरधारकों को अपने शेयरों को बेचने से प्रतिबंधित किया जाता है।

ऑफर फॉर सेल:

  • इस पद्धति के तहत प्रतिभूतियों को सीधे जनता के लिये जारी नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें बिचौलियों के माध्यम से जारी किया जाता है।

स्रोत- इंडियन एक्सप्रेस

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