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सामाजिक न्याय

भारत में बहुविवाह

  • 13 May 2023
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारत में बहुविवाह, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, NFHS, भारतीय दंड संहिता, 1860, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम, 1937

मेन्स के लिये:

भारत में धार्मिक समूहों के बीच बहुविवाह

चर्चा में क्यों?

हाल ही में असम के मुख्यमंत्री ने कहा है कि राज्य सरकार "विधायी कार्रवाई" के माध्यम से बहुविवाह की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने हेतु कदम उठाएगी और इस मुद्दे की जाँच के लिये "विशेषज्ञ समिति" का गठन किया जाएगा।

बहुविवाह (Polygamy):  

  • परिचय: 
    • बहुविवाह (Polygamy) दो शब्दों से बना है: ‘बहु’ जिसका अर्थ है ‘बहुत’ और ‘गामोस’ जिसका अर्थ है ‘विवाह’। नतीजतन बहुविवाह उन विवाहों से संबंधित है जिसमें व्यक्ति द्वारा एक से अधिक विवाह किये जाते हैं।
      • इस प्रकार बहुविवाह में किसी भी महिला या पुरुष के एक ही समय में एक से अधिक वैवाहिक साथी हो सकते हैं।
    • भारत में परंपरागत तौर पर बहुविवाह के तहत मुख्यतः एक से अधिक पत्नियों वाले पुरुष की स्थिति व्यापक रूप से प्रचलित थी। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया।
    • विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act- SMA), 1954 व्यक्तियों को अंतर-धार्मिक विवाह करने की अनुमति देता है, लेकिन इसमें बहुविवाह की मनाही है। अधिनियम का उपयोग कई मुस्लिम महिलाओं द्वारा बहुविवाह प्रथा को रोकने में मदद हेतु किया गया है।
  • प्रकार: 
    • बहुपत्‍नीत्व (Polygyny): 
      • यह एक वैवाहिक संरचना है जिसमें एक पुरुष की कई पत्नियाँ होती हैं। इस रूप में बहुविवाह अधिक सामान्य अथवा व्यापक है।
      • माना जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता में राजाओं और सम्राटों की कई पत्नियाँ होती थीं।
    • बहुपतित्व प्रथा (Polyandry): 
      • यह एक प्रकार का विवाह है जिसमें एक महिला के कई पति होते हैं।
      • ऐसी घटनाएँ अत्यंत असामान्य हैं। 
    • द्विविवाह (Bigamy): 
      • जब कोई व्यक्ति पहले से ही मान्य रूप से विवाहित होते हुए भी किसी और के साथ विवाह करता है, इसे द्विविवाह के रूप में जाना जाता है और ऐसा करने वाले व्यक्ति को द्विविवाही कहा जाएगा।
      • इसे भारत सहित कई देशों में एक अपराध माना जाता है। दूसरे शब्दों में यह किसी व्यक्ति के साथ मान्य विवाह में होते हुए भी किसी अन्य व्यक्ति के साथ विवाह करने की क्रिया है। 
  • भारत में प्रचलन: 
    • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (वर्ष 2019-20) में पाया गया है कि बहुविवाह का प्रचलन ईसाइयों में 2.1%, मुसलमानों में 1.9%, हिंदुओं में 1.3% और अन्य धार्मिक समूहों में 1.6% था।
    • आँकड़ों से पता चला है कि बहुपत्नीत्व विवाहों का सबसे अधिक प्रसार जनजातीय आबादी वाले पूर्वोत्तर राज्यों में था।
    • उच्चतम बहुपत्नीत्व दर वाले 40 ज़िलों की सूची में उच्च जनजातीय आबादी वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक थी।

भारत में विवाह से संबंधित विभिन्न धार्मिक कानून:

  • हिंदू: 
    • वर्ष 1955 में लागू हुए हिंदू विवाह अधिनियम ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिंदू बहुविवाह को समाप्त कर दिया जाएगा और इसे अपराध बना दिया जाएगा।
    • अधिनियम 1955 की धारा 11 में बहुविवाह को अमान्य घोषित किया गया है, अर्थात् अधिनियम एकल विवाह को मान्यता प्रदान करता है।
    • ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 17 के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 और 495 के तहत दंडित किया जाता है।
      • क्योंकि बौद्ध, जैन और सिख सभी हिंदू माने जाते हैं और उनके अपने कानून नहीं हैं, इसलिये हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान इन तीनों धार्मिक संप्रदायों पर भी लागू होते हैं।
  • पारसी: 
    • पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 ने पहले ही द्विविवाह को गैरकानूनी घोषित कर दिया था।
    • कोई भी पारसी, व्यक्ति अपने पति या पत्नी के जीवनकाल में इस अधिनियम या किसी किसी अन्य विधि के अधीन तब तक विवाह नहीं करेगा जब तक कि उसने अपनी पत्नी या पति से विधिपूर्ण तलाक नहीं ले लेता। पत्नी या पति द्वारा कानूनी रूप से तलाक दिये बिना या उसकी पिछली शादी को अमान्य या भंग घोषित किये बिना भारतीय दंड संहिता द्वारा प्रदान किये गए दंड के अधीन है। 
  • मुस्लिम: 
    • मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम [The Muslim Personal Law (Shariat) Application Act] 1937 के तहत अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा प्रदत्त खंड भारत में मुसलमानों पर लागू होते हैं।
    • बहुविवाह मुस्लिम कानून में निषिद्ध नहीं है क्योंकि इसे एक धार्मिक प्रथा के रूप में मान्यता प्राप्त है, इसलिये वे इस प्रथा को संरक्षित और स्वीकार करते हैं।
    • फिर भी यह स्पष्ट है कि यदि यह तरीका संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो इसे बदला जा सकता है।
      • जब भारतीय दंड संहिता और व्यक्तिगत कानूनों के बीच असहमति होती है, तो व्यक्तिगत कानूनों को लागू किया जाता है क्योंकि यह एक कानूनी सिद्धांत है कि एक विशिष्ट कानून सामान्य कानून का स्थान लेता है।

बहुविवाह से संबंधित न्यायिक दृष्टिकोण:

  • परयांकंडियाल बनाम के. देवी और अन्य (1996):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि एक विवाह वाले रिश्ते हिंदू समाज के मानक और विचारधारा थे, जो दूसरे विवाह की निंदा और उसका तिरस्कार करते थे।
    • धर्म के प्रभाव के कारण बहुविवाह को हिंदू संस्कृति का अंग नहीं बनने दिया गया।
  • बॉम्बे राज्य बनाम नरसु अप्पा माली (1951):
    • बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि बॉम्बे (हिंदू द्विविवाह रोकथाम) अधिनियम, 1946 भेदभावपूर्ण नहीं था।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि एक राज्य विधायिका के पास लोक कल्याण और सुधार उपायों को लागू करने का अधिकार है, भले ही वह हिंदू धर्म या रीति-रिवाजों का उल्लंघन करता हो।
  • जावेद और अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य (2003):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि स्वतंत्रता, सामाजिक सद्भाव, गरिमा और कल्याण अनुच्छेद 25 के अंतर्गत आते हैं।
    • मुस्लिम कानून चार महिलाओं से विवाह की अनुमति प्रदान करता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।
    • यह चार महिलाओं से शादी नहीं करने के लिये धार्मिक प्रथा का उल्लंघन नहीं होगा। 

भारतीय समाज और संवैधानिक दृष्टिकोण में बहुविवाह:   

  • बहुविवाह का भारतीय समाज पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव है, इसकी वैधता के लिये विशेष रूप से इस्लाम और हिंदू जैसे- धर्मों के संबंध में संवैधानिक दृष्टिकोण से परिचर्चा की गई है। 
  • भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहाँ किसी भी धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ या अधीनस्थ नहीं माना जाता है, प्रत्येक धर्म को विधि के तहत समान माना जाता है। 
  • भारतीय संविधान सभी नागरिकों को मौलिक अधिकारों की सुनिश्चितता प्रदान करता है, इन अधिकारों के विपरीत किसी भी कानून को असंवैधानिक माना जाता है।
  • संविधान का अनुच्छेद 13 निर्दिष्ट करता है कि संविधान के भाग III का उल्लंघन करने वाला कोई भी कानून अमान्य होगा।
    • आर.सी. कूपर बनाम भारत संघ (1970) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सैद्धांतिक दृष्टिकोण के घटक और राज्य का हस्तक्षेप, सुरक्षा की गंभीरता प्रकट करते हैं जो कि एक वंचित समूह के लिये संवैधानिक रूप से असंगत हो सकता है, जिसका उद्देश्य साधारण नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा प्रदान करना है।
  • संविधान का अनुच्छेद 14 भारत के राज्यक्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को कानून के तहत समान उपचार और सुरक्षा की गारंटी देता है।
  • अनुच्छेद 15(1) के अनुसार, राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध उसके  धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा ।

इन देशों में बहुविवाह वैध है:

  • भारत, सिंगापुर, मलेशिया जैसे देशों में बहुविवाह विशेष रूप से केवल मुसलमानों के लिये अनुमत तथा वैध है।
  • वर्तमान में अल्जीरिया, मिस्र तथा कैमरून जैसे देशों में बहुविवाह मान्यता प्राप्त और प्रचलित है। केवल ये ही विश्व के ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ बहुविवाह वैध है।

निष्कर्ष:

  • यह सच है कि भारतीय समाज में बहुविवाह लंबे समय से अस्तित्त्व में है और वर्तमान समय में अवैध होने के बावजूद कुछ क्षेत्रों में इसका प्रचलन है।
  • बहुविवाह की प्रथा केवल किसी एक धर्म या संस्कृति से संबंधित नहीं है बल्कि अतीत में इसे विभिन्न कारणों से उचित ठहराया गया है।
  • हालाँकि समाज के विकास के साथ बहुविवाह का कोई औचित्य नहीं रह गया है और इस प्रथा का त्याग कर दिया जाना चाहिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न: भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने के किसी व्यक्ति के अधिकार को संरक्षण देता है?

(a) अनुच्छेद 19
(b) अनुच्छेद 21
(c) अनुच्छेद 25
(d) अनुच्छेद 29

उत्तर: (b) 

व्याख्या: 

  • विवाह का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक घटक है, जिसमें कहा गया है कि "कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा"।
  • लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में वर्ष 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विवाह के अधिकार को जीवन के अधिकार के एक घटक के रूप में देखा।

अतः विकल्प (b) सही उत्तर है।


मेन्स: 

प्रश्न: रीति-रिवाजों एवं परंपराओं द्वारा तर्क को दबाने से प्रगतिविरोध उत्पन्न हुआ है। क्या आप इससे सहमत हैं? (2020)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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