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भूस्खलन और बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली

  • 04 Oct 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली 

मेन्स के लिये:

भारत में भूस्खलन और बाढ़ संबंधी मुद्दे

चर्चा में क्यों?

वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (CSIR-NGRI) ने हिमालयी क्षेत्र के लिये 'भूस्खलन और बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली' विकसित करने हेतु एक 'पर्यावरण भूकंप विज्ञान' (Environmental Seismology’ Group) समूह की शुरुआत की है।

  • NGRI के वैज्ञानिकों ने GFZ, पॉट्सडैम में जर्मन वैज्ञानिकों के सहयोग से इस प्रणाली को लॉन्च किया है।

प्रमुख बिंदु

  • पूर्व चेतावनी प्रणाली के संदर्भ में:
    • यह प्रणाली उपग्रह डेटा, संख्यात्मक मॉडलिंग और भू-आकृति विश्लेषण सहित घने भूकंपीय नेटवर्क के साथ वास्तविक समय की निगरानी पर आधारित होगी।
    • ब्रॉडबैंड भूकंपीय नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह ध्रुवीकरण और बैक-ट्रेसिंग दृष्टिकोण का उपयोग करके पूरे आपदा अनुक्रम की संपूर्ण स्थानिक ट्रैकिंग को सक्षम बनाता है।
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ आपदा से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने और चोटों या मौतों की संख्या को कम करने में मदद करती हैं, साथ ही ऐसी जानकारी प्रदान करके व्यक्तियों और समुदायों को जीवन तथा संपत्ति की रक्षा करने में सक्षम बनाती हैं।
  • भूस्खलन (Landslide): 
    • परिचय: भूस्खलन को सामान्य रूप से शैल, मलबा या ढाल से गिरने वाली मिट्टी के बृहत संचलन के रूप में परिभाषित किया जाता है।
      • यह एक प्रकार का वृहद् पैमाने पर अपक्षय है, जिससे गुरुत्वाकर्षण के प्रत्यक्ष प्रभाव में मिट्टी और चट्टान समूह खिसककर ढाल से नीचे गिरते हैं।
      • भूस्खलन शब्द में ढलान संचलन के पाँच तरीके शामिल हैं: गिरना (Fall), लटकना (Topple), फिसलना (Slide), फैलाव (Spread) और प्रवाह (Flow)।
    • कारक: ढलान संचलन तब होता है जब नीचे की ओर (मुख्य रूप से गुरुत्वाकर्षण के कारण) कार्य करने वाले बल ढलान निर्मित करने वाली पृथ्वी जनित सामग्री से अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं।
      • भू-स्खलन तीन प्रमुख कारकों के कारण होता है: भू-विज्ञान, भू-आकृति विज्ञान और मानव गतिविधि।
    • भूस्खलन संभावित क्षेत्र: संपूर्ण हिमालय पथ, उत्तर-पूर्वी भारत के उप-हिमालयी क्षेत्रों में पहाड़ियाँ/पहाड़, पश्चिमी घाट, तमिलनाडु कोंकण क्षेत्र में नीलगिरि भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र हैं।
    • उठाए गए कदम: भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने देश के 042 मिलियन वर्ग किमी भूस्खलन प्रवण क्षेत्रों को कवर करने के उद्देश्य से भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्रण मैक्रो स्केल (1:50,000) पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया है।
  • बाढ़:
    • परिचय: यह एक प्रकार की बारंबार उत्पन्न होने वाली प्राकृतिक आपदा है, बाढ़ तब आती हैं जब पानी का एक अतिप्रवाह भूमि को जलमग्न कर देता है, यह भूमि आमतौर पर सूखी रहती है।
      • यह प्रायः भारी वर्षा, तेज़ी से हिमपात या तटीय क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय चक्रवात या सुनामी से तूफान के कारण होता है।
    • प्रकार: बाढ़ के 3 सामान्य प्रकार हैं:
      • फ्लैश फ्लड की स्थिति तेज़ी से और अत्यधिक वर्षा के कारण उत्पन्न होती है जिससे जल की ऊँचाई में तेज़ी से वृद्धि होती है और बाढ़ का पानी नदियों, नालों, चैनलों के ओवरफ्लो होने के कारण सड़कों पर बहने लगता है।
        • ये उच्च जल स्तर के साथ छोटी अवधि की अत्यधिक स्थानीयकृत घटनाएँ हैं और आमतौर पर वर्षा तथा चरम बाढ़ की घटना के बीच का समय छह घंटे से भी कम होता है।
      • नदी की बाढ़ की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब लगातार बारिश हो या बर्फ पिघलती है जिससे नदी अपनी क्षमता से ऊपर बहने लगती है।
      • तटीय बाढ़ की स्थिति उष्णकटिबंधीय चक्रवातों और सूनामी से जुड़े तूफानों के कारण उत्पन्न होती है।
    • सुभेद्यता: भारत में प्रमुख बाढ़ प्रवण क्षेत्र पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तरी बिहार और पश्चिम बंगाल, ब्रह्मपुत्र घाटी, तटीय आंध्र प्रदेश एवं ओडिशा और दक्षिणी गुजरात सहित गंगा के अधिकांश मैदान हैं।
      • वर्तमान केरल और तमिलनाडु में भी बाढ़ का कहर छाया हुआ है।
    • उठाए गए कदम:
      • भारत में फ्लड-प्लेन ज़ोनिंग शुरू की गई थी जो बाढ़ क्षेत्रों या मैदानों के सर्वेक्षण और सीमांकन के लिए शुरू की गई थी। यह ऐसे क्षेत्रों में अंधाधुंध विकास और मानव गतिविधियों को रोकती है।
      • राष्ट्रीय जल नीति परियोजना नियोजन, सतही और भूजल विकास, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण के प्रावधानों पर प्रकाश डालती है।
      • भारत में बाढ़ की भविष्यवाणी और चेतावनी का उत्तरदायित्व केंद्रीय जल आयोग (CWC) को सौंपा गया है।

आगे की राह:

  • चूँकि ग्लेशियर पिघलने और ग्लेशियर पीछे हटने की वजह से अचानक आई बाढ़ के कारण बर्फ के क्षरण में तेज़ी लाने में जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख कारक है, इसलिये बहु-जोखिम प्रवण हिमालयी क्षेत्र में नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिये बड़े प्रयासों की आवश्यकता है।
  • सरकारों द्वारा निर्मित बाँधों, बिजली संयंत्रों और अन्य परियोजनाओं के बुनियादी ढाँचे के विकास की योजना पर भी इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, जो कि देश के लिये रणनीतिक और सामाजिक महत्त्व के हैं।

स्रोत: द हिंदू

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