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मलेरिया के लिये नए बायोमार्कर की पहचान

  • 25 Jun 2019
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research’s- ICMR) के जबलपुर स्थित राष्ट्रीय जनजाति स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान (National Institute of Research in Tribal Health- NIRTH) के शोधकर्त्ताओं ने मलेरिया परजीवी के शरीर में एक आनुवांशिक अनुक्रम की पहचान की है।

  • इसके माध्यम से बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील नैदानिक/चिकित्सकीय परीक्षण विकसित करने में सहायता प्राप्त हो सकती है।

प्रमुख बिंदु

  • वर्तमान में मलेरिया के निदान के लिये एक जीन, हिस्टिडीन-समृद्ध प्रोटीन 2 (Histidine-rich Protein 2- HRP2) पर आधारित परीक्षण का उपयोग किया जाता है। हालाँकि यह जीन अक्सर मलेरिया परजीवी के कुछ स्ट्रेन में अनुपस्थित होता है।
  • NIRTH के वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लूटामेट डिहाइड्रोजनेज़ (Glutamate Dehydrogenase) नामक एक एंजाइम का प्रयोग मलेरिया के निदान हेतु एक संभावित बायोमार्कर के रूप में किया जा सकता है।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रत्येक परजीवी में अनेक विशिष्ट जीन उपस्थित होते हैं जिन्हें परजीवी को पहचानने या समाप्त करने के लिये लक्षित किया जा सकता है। हालाँकि ये जीन एक परजीवी के सभी स्ट्रेन्स (Strains) में समान रूप में उपस्थित नहीं होते।
  • नैदानिक या चिकित्सकीय उद्देश्यों हेतु जीन या प्रोटीन की पहचान करते समय वैज्ञानिक किसी ऐसे विशेष जीन या प्रोटीन का चयन करते हैं जो किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित रहता है ताकि इसका उपयोग किसी एक क्षेत्र में व्यापक रूप से किया जा सके। इस तरह के जीन को अच्छी तरह से संरक्षित माना जाता है।

जैवसूचक (Biomarker)

  • जैवसूचक/बायोमार्कर एक प्रमुख आणविक या कोशिकीय घटनाएँ हैं जो किसी विशिष्ट पर्यावरणीय आवरण को स्वास्थ्य के लक्षणों से जोड़ते हैं।
  • पर्यावरणीय रसायनों के संपर्क में आने, पुरानी मानव बीमारियों के विकास और रोग के लिये बढ़ते खतरे के बीच उपसमूहों की पहचान करने में जैवसूचक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Biomarker

परीक्षण

  • वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में तीन जीनों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया-

1. ग्लूटामेट डिहाइड्रोजनेज (Glutamate dehydrogenase)

2. लैक्टेट डिहाइड्रोजनेज (Lactate dehydrogenase)

3. प्लास्मोडियम फाल्सीपेरियम के एल्डोलेज (Aldolase of Plasmodium falciparium)

ये सभी जानलेवा मलेरिया परजीवी की एक किस्म हैं।

  • आठ राज्यों जहाँ मलेरिया एक स्थानिक बीमारी है, से मलेरिया-संक्रमित 514 रोगियों के रक्त के नमूने एकत्र किये। नमूनों में उपस्थित तीनों जीनों में ग्लूटामेट डिहाइड्रोजनेज की न्यूक्लियोटाइड संरचना लगभग समान थी।
  • इस जीन की प्रोटीन संरचना के विश्लेषण के अनुसार, रक्त के नमूनों की प्रोटीन संरचना में एक समान परिवर्तन पाया गया, तथा निष्कर्ष निकाला गया कि यह मलेरिया के लिये एक संभावित बायोमार्कर/जैवसंकेतक (Biomarker) हो सकता है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद

(Indian Council of Medical Research’s- ICMR)

  • जैव चिकित्सा अनुसंधान के निर्माण, समन्वय एवं संवर्धन के लिये भारत का यह शीर्ष निकाय दुनिया के सबसे पुराने चिकित्सा अनुसंधान निकायों में से एक है।
  • यह नई दिल्ली में स्थित है।
  • इसे भारत सरकार द्वारा स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (Department of Health Research, Ministry of Health & Family Welfare) के माध्यम से वित्त पोषित किया जाता है।

राष्ट्रीय जनजाति स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान

(National Institute of Research in Tribal Health- NIRTH)

  • यह भारत सरकार के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, परिवार कल्याण मंत्रालय (Department of Health Research, Ministry of Health of Family Welfare) के तहत भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) का एक स्थायी संस्थान है।
  • इसकी स्थापना 1 मार्च, 1984 को जबलपुर में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा किया गया।
  • इसका मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य में सुधार लाना एवं परिचालन अनुसंधान के माध्यम से आदिवासियों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना है।
  • इस संस्थान को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा स्वदेशी जनसंख्या के स्वास्थ्य के लिये सहयोगी केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • इस संस्थान में मलेरिया, फाइलेरिया, तपेदिक, डायरिया, वायरोलॉजी, फ्लोरोसिस और सामाजिक विज्ञान आदि पर महत्त्वपूर्ण शोध किये जाते हैं।

स्रोत- डाउन टू अर्थ

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