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वन अधिकार अधिनियम

  • 21 Sep 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

लघु वनोत्पाद, वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006,पाँचवीं और छठी अनुसूची 

मेन्स के लिये:

वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 का महत्त्व और चुनौतियाँ 

चर्चा में क्यों?   

हाल ही में जम्मू और कश्मीर सरकार ने वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 को लागू करने का निर्णय लिया है, जो आदिवासियों एवं खानाबदोश समुदायों की 14 लाख की आबादी के एक बड़े हिस्से की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ऊपर उठाने का कार्य करेगा।

प्रमुख बिंदु 

  • FRA के बारे में:
    • वर्ष 2006 में अधिनियमित FRA वन में निवास करने वाले आदिवासी समुदायों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन संसाधनों के अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है, जिन पर ये समुदाय आजीविका, निवास तथा अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों सहित विभिन्न आवश्यकताओं के लिये निर्भर थे।
    • यह वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य पारंपरिक वनवासी (OTFD) जो पीढ़ियों से ऐसे जंगलों में निवास कर रहे हैं, को वन भूमि पर उनके वन अधिकारों को मान्यता देता है ।
    • यह FDST और OTFD की आजीविका तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए वनों के संरक्षण की व्यवस्था को मज़बूती प्रदान  करता है।
    • ग्राम सभा को व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) या सामुदायिक वन अधिकार (CFR) या दोनों जो कि FDST और OTFD को दिये जा सकते हैं, की प्रकृति एवं सीमा निर्धारित करने हेतु प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है।
  • वन अधिकार अधिनियम के तहत मिलने वाले अधिकार:
    •  स्वामित्व अधिकार:
      • यह FDST और OTFD को अधिकतम 4 हेक्टेयर भू-क्षेत्र पर आदिवासियों या वनवासियों द्वारा खेती की जाने वाली भूमि पर स्वामित्व का अधिकार देता है। 
      • यह स्वामित्व केवल उस भूमि के लिये है जिस पर वास्तव में संबंधित परिवार द्वारा खेती की जा रही है, इसके अलावा कोई और नई भूमि प्रदान नहीं की जाएगी।
    • अधिकारों का प्रयोग:
      • वन निवासियों के अधिकारों का विस्तार लघु वनोत्पाद, चराई क्षेत्रों आदि तक है।
    • राहत और विकास से संबंधित अधिकार:
      • वन संरक्षण के लिये प्रतिबंधों के अधीन अवैध बेदखली या जबरन विस्थापन और बुनियादी सुविधाओं के मामले में पुनर्वास का अधिकार शामिल है।
    • वन प्रबंधन अधिकार:
      • इसमें किसी भी सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनः उत्थान या संरक्षण या प्रबंधन का अधिकार शामिल है, जिसे वन निवासियों द्वारा स्थायी उपयोग के लिये पारंपरिक रूप से संरक्षित एवं सुरक्षित किया जाता है।
  • महत्त्व:
    • संवैधानिक प्रावधान का विस्तार:
      • यह संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के जनादेश का विस्तार करता है जो भूमि या जंगलों जिनमें वे स्वदेशी समुदाय निवास करते हैं, पर उनके दावों को संरक्षण प्रदान करता है ।
    • सुरक्षा संबंधी चिंताएँ:
      • जनजातियों का अलगाव नक्सल आंदोलन के कारकों में से एक था, जिसने छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों को प्रभावित किया।
    • वन शासन:
      • इसमें सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को मान्यता देकर वन शासन को लोकतांत्रिक बनाने की क्षमता है।
      • यह सुनिश्चित करेगा कि लोग अपने जंगलों का प्रबंधन स्वयं करें, यह अधिकारियों के माध्यम से वन संसाधनों के दोहन को नियंत्रित करेगा जिससे वन शासन में सुधार होगा और आदिवासी अधिकारों का बेहतर प्रबंधन करेगा।
  • चुनौतियाँ:
    • प्रशासनिक उदासीनता:
      • चूँकि अधिकांश राज्यों में आदिवासी एक बड़ा वोट बैंक नहीं हैं, इसलिये सरकारों को वित्तीय लाभ के पक्ष में FRA को हटाना या इस बारे में बिल्कुल भी परेशान नहीं करना सुविधाजनक लगता है।
      • वन अधिकारियों ने आदिवासियों हेतु कल्याणकारी उपाय के बजाय अतिक्रमण को नियमित करने के लिये एक साधन के रूप में FRA की गलत व्याख्या की है।
      • कॉरपोरेट्स को डर है कि वे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों तक सस्ती पहुँच को खो सकते हैं।
    • अधिनियम का कमज़ोर पड़ना:
      • पर्यावरणविदों के कुछ वर्ग इस बात पर चिंता जताते हैं कि FRA व्यक्तिगत अधिकारों के पक्ष में अधिक लचीला है जो सामुदायिक अधिकारों हेतु न्यूनतम कार्यक्षेत्र प्रदान करता है।
    • संस्थागत मार्ग बाधा:
      • ग्राम सभा द्वारा समुदायिक और व्यक्तिगत दावों के सामान्य नक्शे तैयार किये जाते हैं, जिनमें कभी-कभी तकनीकी ज्ञान की कमी देखी जाती है और ये शैक्षिक अक्षमता से ग्रसित होते हैं।
    •  FRA का दुरुपयोग :
      • FRA का दुरुपयोग होने के कारण समुदायों ने दावा दाखिल करने के लिये प्रयास किया है। पार्टी लाइनों के राजनेताओं ने FRA को भूमि वितरण अभ्यास के रूप में व्याख्यायित किया है तथा इसके संदर्भ में ज़िलों के लिये लक्ष्य निर्धारित किये हैं।

आगे की राह 

  • यह महत्त्वपूर्ण है कि FRA को लागू करने हेतु मिशन मोड आधारित परियोजनाओं के तहत केंद्र और राज्य स्तर पर सरकारों को मानव तथा वित्तीय संसाधनों के साथ मज़बूत किया जाए।
  • FRA के कार्यान्वयन की निगरानी और मानचित्रण के लिये आधुनिक तकनीक का लाभ उठाने के अलावा ग्राम सभाओं को सेवा प्रदाता के रूप में सुविधा देने के लिये वन नौकरशाही में भी सुधार किया जाना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू

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