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जीव विज्ञान और पर्यावरण

पर्यावरण बनाम विकास परिचर्चा

  • 25 Jan 2021
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (National Highways Authority of India- NHAI) ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में दावा किया है कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 को संसद द्वारा न केवल पर्यावरण संरक्षण बल्कि ‘विदेशी शक्तियों के लिये उदाहरण’ हेतु पारित किया गया था।

प्रमुख बिंदु

पृष्ठभूमि:

  • वर्ष 2013 के केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक नोटिफिकेशन, जिसमें 100 किमी. से अधिक लंबाई के राष्ट्रीय राजमार्गों को 40 मीटर से अधिक चौड़ा करने के लिये पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में छूट मांगी गई थी, के खिलाफ एक एनजीओ ‘यूनाइटेड कंज़र्वेशन मूवमेंट’ (United Conservation Movement) द्वारा याचिका दायर की गई।
  • ‘यूनाइटेड कंज़र्वेशन मूवमेंट’ पर्यावरणीय संस्थाओं का एक समूह है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी घाट, एक टाइगर रिज़र्व और साथ ही एक वन्यजीव क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों के संदर्भ में NHAI परियोजनाओं को चुनौती दी है। 

NHAI का दावा:

  • NHAI ने यह आरोप लगाया है कि कई गैर-सरकारी संगठन विदेशी शक्तियों के इशारे पर अधिनियम के मानदंडों को बनाए रखने के लिये याचिका दायर करते हैं।
    • अपने भारतीय प्रतिरूपों के माध्यम से ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ (Amnesty International) और ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़’ (Peoples Union for Civil liberties) जैसी विदेशी संस्थाओं ने भारत के संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत रिट याचिका दायर की है।
      • संविधान का अनुच्छेद- 32 (संवैधानिक उपचार का अधिकार): यह एक मौलिक अधिकार है, जिसमें कहा गया है कि व्यक्तियों को संविधान द्वारा प्राप्त अन्य मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिये सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार है।
  • NHAI ने आरोप लगाया है कि भारत में कई संगठन, जो पर्यावरणीय कार्रवाई और मानवाधिकारों के क्षेत्र में कार्य करते हैं, सक्रिय रूप से विकास परियोजनाओं का विरोध करने, सरकारी नीतियों को चुनौती देने और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। 
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 एक ऐसा अधिनियम है जो जून 1972 (स्टॉकहोम सम्मेलन) में स्टॉकहोम में आयोजित मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से प्रभावित था।

न्यायालय का निर्णय:

  • उच्च न्यायालय ने NHAI के अध्यक्ष को निर्देश दिया है कि आपत्ति दर्ज करने के तरीके का विश्लेषण करने और पूछताछ के लिये एक वरिष्ठ अधिकारी को नामित किया जाए।
  • उच्च न्यायालय ने ‘यूनाइटेड कंज़र्वेशन मूवमेंट’ से अपने संविधान तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में की गई गतिविधियों से संबंधित विवरण प्रदान करने को भी कहा है।

विकास बनाम पर्यावरण:

पर्यावरण का महत्त्व:

  • पर्यावरण का आर्थिक महत्त्व कुछ पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं से स्पष्ट होता है। इसमें शामिल हैं:
    • प्रावधान सेवाएँ (खाद्य, सिंचाई, पेयजल)।
    • विनियमन सेवाएँ (जलवायु विनियमन, जल गुणवत्ता विनियमन)।
    • सांस्कृतिक सेवाएँ (मनोरंजन और धार्मिक सेवाएँ)।
    • सहायक सेवाएँ (पोषक तत्त्व, रिसाइक्लिंग, मृदा निर्माण)।
  • लाखों परिवार विकासात्मक गतिविधियों, उत्पादन और उपभोग के लिये इन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का उपयोग करते हैं।

विकास के साथ पर्यावरण का संबंध:

  • आर्थिक विकास के वांछित स्तर को प्राप्त करने के लिये तीव्र औद्योगीकरण और शहरीकरण अपरिहार्य है।
  • माना जाता है कि प्रति व्यक्ति आय में पर्याप्त वृद्धि के लिये यह आवश्यक है।
  • हालाँकि इन आय अर्जन करने वाली गतिविधियों की वजह से  प्रदूषण जैसे नकारात्मक पर्यावरणीय परिणाम उत्पन्न होते हैं।
  • व्यापक रूप से बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन और गरीबी में कमी जैसे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये पर्यावरण की गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है।
  • यह माना जाता है कि वित्तीय और तकनीकी क्षमताओं में वृद्धि के साथ-साथ आय के स्तर में क्रमिक वृद्धि द्वारा पर्यावरण की गुणवत्ता को बहाल किया जा सकता है।
  • वास्तविकता यह है कि विकासात्मक गतिविधियाँ पर्यावरण की गुणवत्ता को खराब करती हैं।

पर्यावरणीय स्थिरता को प्रभावित करने वाले विकासीय कारक:

पर्यावरणीय अनुपालन का अभाव:

  • पर्यावरणीय सिद्धांतों की उपेक्षा इस बात का गंभीर संकेत है कि प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से कई बार जन-धन की हानि होती है।
  • किसी भी क्षेत्र में प्राकृतिक खतरों से होने वाले जोखिम का वैज्ञानिक रूप से पता लगाने के लिये किये जाने वाले कार्य कभी-कभी ही सही भावना से किये जाते हैं।
  • अनियमित खदान और पहाड़ियों में ढलान की मिट्टी के अवैज्ञानिक कटाव का खतरा बढ़ने से भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।

सब्सिडी का बुरा प्रभाव:

  • समाज के कमज़ोर वर्गों के कल्याण के लिये सरकार बड़ी मात्रा में सब्सिडी प्रदान करती है।
  • ऊर्जा और बिजली जैसी सेवाओं में सब्सिडी प्रदान करने से इनके अति प्रयोग से पर्यावरणीय स्थिरता  प्रभावित होती है।
  • इसके अलावा सब्सिडी राजस्व आधार को कम करती है और सरकार की नई स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में निवेश करने की क्षमता को सीमित करती है।

पर्यावरणीय संसाधनों तक पहुँच:

  • सभी को प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच प्राप्त है और कोई भी उपयोगकर्त्ता पर्यावरणीय गिरावट की पूरी लागत वहन नहीं करता है, इसके परिणामस्वरूप संसाधनों का अत्यधिक उपयोग होता है।

जनसांख्यिकी गतिशीलता की जटिलता:

  • बढ़ती जनसंख्या अविकसितता और पर्यावरणीय गिरावट के बीच संबंधों को बढ़ाती है।
  • इसके अलावा गरीबी के कारण बड़े परिवार तथा पलायन की समस्या उत्पन्न होती है, जो शहरी क्षेत्रों को पर्यावरणीय रूप से अस्थिर बनाता है।
  • दोनों परिणामों की वजह से संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण की गुणवत्ता में गिरावट आती है, उत्पादकता कम हो जाती है और गरीबी बढ़ जाती है।

आगे की राह:

  • विकास मानवता के सामने सबसे बड़ी ज़रूरत के साथ-साथ एक चुनौती बना हुआ है। हालाँकि पिछली सदी में अभूतपूर्व आर्थिक और सामाजिक प्रगति के बावजूद गरीबी, अकाल और पर्यावरणीय गिरावट जैसी समस्याएँ अभी भी वैश्विक स्तर पर बनी हुई हैं।
  • इसके अलावा अब तक की विकासात्मक प्रगति ने पर्यावरणीय गिरावट और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अपूरणीय क्षति को दर्शाना शुरू कर दिया है।
  • इस प्रकार पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन किये बिना विकास लक्ष्यों का पालन किया जाना चाहिये।

स्रोत- इंडियन एक्सप्रेस

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