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सामाजिक न्याय

परिवार की देखभाल के लिये बुज़ुर्गों को करना पड़ता है समझौता : अध्ययन

  • 09 Jul 2018
  • 6 min read

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र के ऐजवेल रिसर्च एंड एडवोकेसी सेंटर (Agewell Research and Advocacy Centre for the United Nations) द्वारा किये गए हालिया अध्ययन में पाया गया है कि अधिकांश बुज़ुर्गों को परिवार के सदस्यों द्वारा देखभाल और सहायता किये जाने के संबंध में अपने जीवन की परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है  और उनमें से 50% से अधिक बुज़ुर्गों को उपेक्षा और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। यह सर्वेक्षण भारत के 20 राज्यों में मई-जून 2018 में किया गया था।

अध्ययन के महत्त्वपूर्ण बिंदु 

  • 10,000 वरिष्ठ नागरिकों पर किये गए सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि बुज़ुर्गों में से 66.5% परिवार के युवा सदस्यों की तेज़ी से विकसित जीवन-शैली को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं| जब उनसे पूछा गया कि बुढ़ापे में उनकी खराब वित्तीय स्थिति एक बड़ी रुकावट साबित हुई है, तो उनमें से 60% ने इस बात को सही माना।
  • अध्ययन में यह भी पता चला है कि 52.4% उत्तरदाताओं (बुज़ुर्गों) ने उपेक्षा, दुर्व्यवहार या उत्पीड़न का सामना किया था।
  • इनमें 60-70 आयु वर्ग के 56.2%, 71-80 आयु वर्ग के 30.2% और शेष 81 से अधिक आयु वर्ग के 13.7% बुज़ुर्ग शामिल थे।

स्वतंत्र रूप से जीवन यापन 

  • अध्ययन से पता चला है कि चार वरिष्ठ नागरिकों में से एक यानी 23.44% अकेले रह रहे थे, जबकि दो में से एक यानी 48.88% अपने पति / पत्नी के साथ रह रहे थे।
  • केवल 26.5% बुज़ुर्ग अपने बच्चों या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रह रहे थे। ग्रामीण क्षेत्रों के 21.8% की तुलना में शहरी क्षेत्रों में अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों का प्रतिशत 25.3% था।
  • सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि बड़ी संख्या में बुज़ुर्गों को अकेले रहना  या केवल पति / पत्नी के साथ रहना पसंद है।
  • एक ही घर में अपने बच्चों के परिवार के साथ रहते हुए भी कई वरिष्ठ नागरिकों के रहने का स्थान / कमरा / मंजिल और रसोईघर आदि अलग थे। वे शायद ही कभी अपने बच्चों या परिवार के सदस्यों से बातचीत कर पाते थे और इसलिये वे अकेले रहने की बात स्वीकार करते हैं|
  • सर्वेक्षण में यह भी पता चला कि अधिकांश बुज़ुर्गों ने अपनी आज़ादी का आनंद लिया, लेकिन उनमें से अनेक बुढ़ापे में आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर थे। केवल 36.81% ने बताया कि वे अपने जीवन के अंतिम समय में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं।
  • सर्वेक्षण में पता चला कि लगभग 68.24% बुज़ुर्गों ने वैचारिक स्वतंत्रता, 60.54% ने मनोवैज्ञानिक आज़ादी, 69.45% ने सामाजिक आज़ादी और 61.81% ने शारीरिक आज़ादी का आनंद लिया।
  • लगभग 88.5% बुज़ुर्गों ने कहा कि वृद्धावस्था में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिये उन्हें स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता है। इसी तरह, लगभग 74.1% ने सोशल सपोर्ट सिस्टम और मनोरंजक सुविधाओं की आवश्यकता पर बल दिया ताकि वे और अधिक सुखद जीवन जी सकें।
  • सर्वेक्षण में कहा गया है कि ये चुनौतियाँ अक्सर भेदभाव बढाने में कैसे योगदान देती हैं। लगभग 54% बुज़ुर्गों ने कहा कि उन्हें उम्र के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ा।
  • 52.4% ने कहा कि उन्हें पारंपरिक पारिवारिक समर्थन की आवश्यकता है, जबकि 29% ने अपने बुढ़ापे की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये भरण-पोषण की मांग की और 13.9% ने बुढ़ापे में बेहतर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएँ प्रदान करने वाली सेवाओं की मांग की। 
  • लगभग 4.4% बुजुर्गों ने आवास और परामर्श जैसी सबसे महत्त्वपूर्ण ज़रूरतों को पूरा करने की आवश्यकता पर भी बात की।

योजनाओं से अनजान

  • अध्ययन के दौरान बुज़ुर्गों में से कई को नीतिगत ढाँचे और उनके लिये उपलब्ध सहायता और सेवाओं की स्थिति के बारे में अनजान पाया गया। केवल 28.6% ही उनके भरण-पोषण से संबंधित कानूनों और योजनाओं से अवगत थे, जबकि बाकी को उनके लिये आवश्यक प्रावधानों या योजनाओं के बारे में बहुत कम या कोई ज्ञान नहीं था।
  • यह देखते हुए कि हर बुज़ुर्ग का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना आवश्यक है, अध्ययन में सिफारिश की गई है कि "वृद्धावस्था में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने और दीर्घकालिक देखभाल की व्यवस्था पारिवारिक, सामुदायिक और सरकारी सभी स्तरों पर की जानी चहिये।
  • अध्ययन में कहा गया है कि बुज़ुर्गों को दीर्घकालिक देखभाल सुविधा प्रदान करना भारत में पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के तहत आता है| यह देखा गया है कि वे वरिष्ठ नागरिक जो वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर हैं और जिनके पास संपत्ति  या संपत्ति का अधिकार है, उनके परिवार द्वारा तुलनात्मक रूप से बेहतर व्यवहार किया जाता है|
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