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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारतीय रुपए का अवमूल्यन

  • 10 May 2022
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय रुपए का अवमूल्यन, मुद्रा अवमूल्यन, मुद्रास्फीति, मूल्यह्रास बनाम अवमूल्यन, अभिमूल्यन और अवमूल्यन

मेन्स के लिये:

अर्थव्यवस्था पर भारतीय रुपए के अवमूल्यन का प्रभाव

चर्चा में क्यों? 

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 77.44 के अब तक के सबसे निम्न स्तर पर आ गया है।

प्रमुख बिंदु 

अवमूल्यन:

  • अवमूल्यन के बारे में: 
    • मुद्रा का मूल्यह्रास/अवमूल्यन का आशय अस्थायी विनिमय दर प्रणाली में मुद्रा के मूल्य में गिरावट से है।
    • रुपए के मूल्यह्रास का मतलब है कि डॉलर के मुकाबले रुपए का कमज़ोर होना।
      • इसका मतलब है कि रुपया अब पहले की तुलना में कमज़ोर है।
      • उदाहरण के लिये पहले एक अमेरिकी डाॅलर 70 रुपए के बराबर हुआ करता था। अब एक अमेरिकी डाॅलर 77 रुपए के बराबर है जिसका अर्थ है कि डॉलर के मुकाबले रुपए का अवमूल्यन हुआ है यानी एक डॉलर को खरीदने में अधिक रुपए लगते हैं।
  • भारतीय रुपए के अवमूल्यन का प्रभाव:
    • रुपए में गिरावट भारतीय रिज़र्व बैंक के लिये एक दोधारी तलवार (नकारात्मक एवं सकारात्मक) की भांँति होती है। 
      • सकारात्मक प्रभाव:  
        • सैद्धांतिक रूप से कमजोर रुपए को भारत के निर्यात को बढ़ावा देना चाहिये, लेकिन अनिश्चितता और कमजोर वैश्विक मांग के माहौल में रुपए के बाहरी मूल्य में गिरावट उच्च निर्यात में परिवर्तित नहीं हो सकती है। 
      • नकारात्मक प्रभाव:  
        •  यह आयातित मुद्रास्फीति का जोखिम उत्पन्न करता है और केंद्रीय बैंक के लिये ब्याज दरों को रिकॉर्ड स्तर पर लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल बना सकता है। 
        • भारत अपनी घरेलू तेल आवश्यकता के दो-तिहाई से अधिक की पूर्ति आयात के माध्यम से करता है।  
        • भारत खाद्य तेलों के शीर्ष आयातक देशों में से एक है। एक कमज़ोर मुद्रा आयातित खाद्य तेल की कीमतों को और अधिक बढ़ाएगी तथा  उच्च खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ावा देगी। 

मुद्रा का अभिमूल्यन और अवमूल्यन: 

  • लचीली विनिमय दर प्रणाली (Floating Exchange Rate System) में बाज़ार की ताकतें (मुद्रा की मांग और आपूर्ति) मुद्रा का मूल्य निर्धारित करती हैं। 
  • मुद्रा अभिमूल्यन: यह किसी अन्य मुद्रा की तुलना में एक मुद्रा के मूल्य में वृद्धि है। 
    • सरकार की नीति, ब्याज दरों, व्यापार संतुलन और व्यापार चक्र सहित कई कारणों से मुद्रा के मूल्य में वृद्धि होती है।
    • मुद्रा अभिमूल्यन किसी देश की निर्यात गतिविधि को हतोत्साहित करता है क्योंकि विदेशों से वस्तुएँ खरीदना सस्ता हो जाता है, जबकि विदेशी व्यापारियों द्वारा देश की वस्तुएँ खरीदना महँगा हो जाता है। 

अवमूल्यन और मूल्यह्रास: 

  • यदि प्रशासनिक कार्रवाई से भारतीय रुपए के मूल्य में गिरावट आती है, तो यह अवमूल्यन है। 
    • मूल्यह्रास और अवमूल्यन के लिये प्रक्रिया अलग है, प्रभाव के संदर्भ में कोई अंतर नहीं है।
  • भारत वर्ष 1993 तक विनिमय की प्रशासित या निश्चित दर का पालन करता था, जब वह बाज़ार-निर्धारित प्रक्रिया या अस्थायी विनिमय दर आधारित था।  
    • चीन अभी भी पूर्व नीति का पालन करता है।

भारतीय रुपए के वर्तमान मूल्यह्रास का कारण: 

  • इक्विटी की बिक्री: 
    • वैश्विक इक्विटी बाज़ारों में सरकारी विक्रय, जो अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (केंद्रीय बैंक) द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि, यूरोप में युद्ध, चीन में कोविड-19 उछाल के कारण विकास संबंधी चिंताओं की वजह बना, के चलते रुपए का मूल्यह्रास हुआ।
  • डॉलर का बहिर्वाह: 
    • डॉलर का बहिर्वाह कच्चे तेल की उच्च कीमतों का परिणाम है और इक्विटी बाज़ारों में सुधार भी डॉलर के प्रतिकूल प्रवाह का कारण बन रहा है।
  • मौद्रिक नीति का सख्त होना:
    • बढ़ती मुद्रास्फीति का मुकाबला करने के लिये मौद्रिक नीति को सख्त करने के लिये आरबीआई द्वारा उठाए गए कदमों से भी मूल्यह्रास हुआ है।

रुपए के मूल्यह्रास का समग्र अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:

  • रुपए के कमज़ोर होने से चालू खाता घाटे का बढ़ना, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी जैसी स्थिति सामने आती है।
  • अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से कच्चे तेल की ऊंँची कीमतों और अन्य महत्वपूर्ण आयातों के कारण लागत-जन्य मुद्रास्फीति की ओर बढ़ रही है।
    • लागत-जन्य मुद्रास्फीति (जिसे वेज-पुश इन्फ्लेशन के रूप में भी जाना जाता है) तब होती है जब मजदूरी और कच्चे माल की लागत में वृद्धि के कारण समग्र कीमतों में वृद्धि (मुद्रास्फीति) होती है।
  • कंपनियों को उच्च लागत का बोझ पूरी तरह से उपभोक्ताओं पर डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि इससे सरकारी लाभांश आय प्रभावित होने के साथ बजटीय राजकोषीय घाटे पर सवाल उठते हैं।

विगत वर्ष के प्रश्न:

प्रश्न. भारतीय रुपए के अवमूल्यन को रोकने के लिये सरकार/RBI द्वारा निम्नलिखित में से कौन सा सबसे संभावित उपाय नहीं है? (2019)

(A) गैर-आवश्यक वस्तुओं के आयात पर अंकुश लगाना और निर्यात को बढ़ावा देना।
(B) भारतीय उधारकर्त्ताओं को रुपया मूल्यवर्ग मसाला बांड जारी करने के लिये प्रोत्साहित करना।
(C) बाहरी वाणिज्यिक उधार से संबंधित शर्तों को आसान बनाना।
(D) विस्तारवादी मौद्रिक नीति का अनुसरण।

उत्तर: (D) 

  • मुद्रा मूल्यह्रास अस्थायी विनिमय दर प्रणाली में मुद्रा के मूल्य में गिरावट है। मुद्रा मूल्यह्रास आर्थिक बुनियादी बातों, ब्याज दर के अंतर, राजनीतिक अस्थिरता या निवेशकों के बीच जोखिम से बचने जैसे कारकों के कारण हो सकता है। भारत फ्लोटिंग विनिमय दर प्रणाली का अनुसरण करता है। 
  • गैर-आवश्यक वस्तुओं के आयात पर अंकुश लगाने से डॉलर की मांग कम होगी और निर्यात को बढ़ावा देने से देश में डॉलर के प्रवाह को बढ़ाने में मदद मिलेगी, अतः इस प्रकार रुपए के मूल्यह्रास को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
  • मसाला बांड सीधे भारतीय मुद्रा से जुड़ा होता है। यदि भारतीय उधारकर्त्ता अधिक रुपए के मसाला बांड जारी करते हैं तो इससे बाज़ार में तरलता बढ़ेगी या बाज़ार में कुछ मुद्राओं के मुकाबले रुपए के स्टॉक में वृद्धि होगी, अतःइससे रुपए को मज़बूत करने में मदद मिलेगी।
  • बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) विदेशी मुद्रा में एक प्रकार का ऋण है, यह किसी अनिवासी ऋणदाता से भारतीय इकाई द्वारा लिया गया ऋण होता है। इस प्रकार ECB की शर्तों को आसान बनाने से विदेशी मुद्राओं में अधिक ऋण प्राप्त करने में मदद मिलती है, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ेगा तथा रुपए के मूल्य में वृद्धि होगी।
  • विस्तारवादी मौद्रिक नीति अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिये आरबीआई द्वारा उपयोग किये जाने वाले नीतिगत उपायों का समूह है। यह एक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति को बढ़ावा देता है। हालाँकि यह रुपए के मूल्य में भिन्नता को प्रभावित नहीं कर सकता है।

अतः विकल्प (D) सही है।


प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

किसी मुद्रा के अवमूल्यन का प्रभाव यह होता है कि वह आवश्यक रूप से:

  1. विदेशी बाज़ारों में घरेलू निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार करता है।
  2. घरेलू मुद्रा के विदेशी मूल्य को बढ़ाता है।
  3. व्यापार संतुलन में सुधार करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) केवल 2 और 3

उत्तर: (A)  

  • मुद्रा अवमूल्यन किसी देश की मुद्रा के मूल्य में किसी अन्य देश की मुद्रा की तुलना में जान-बूझकर कमी करना है। मुद्रा अवमूल्यन के मुख्य प्रभाव हैं:
    • विदेशी ग्राहकों के लियेनिर्यात सस्ता होगा 
    • आयात महँगा होगा 
    • अल्पावधि में अवमूल्यन मुद्रास्फीति का कारण बनता है
    • उच्च रोज़गार और तीव्र जीडीपी विकास
  • एक देश अपने निर्यात को बढ़ावा देने के लिये अवमूल्यन की नीति अपनाता है क्योंकि इससे उत्पाद और सेवाएँ खरीदना सस्ता हो जाता है। दूसरे शब्दों में विदेशी बाज़ारों में घरेलू निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार होता है। अवमूल्यन से घरेलू मुद्रा के विदेशी मूल्य में वृद्धि नहीं होगी। अत:कथन 1 सही है और कथन 2 सही नहीं है। 

स्रोत: द हिंदू

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