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कार्बन बाज़ार पर विवाद

  • 07 Dec 2019
  • 6 min read

प्रीलिम्स के लिये

कार्बन बाज़ार, कार्बन क्रेडिट

मेन्स के लिये

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में निहित चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

वर्तमान में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में चल रहे COP-25 जलवायु शिखर सम्मलेन के दौरान एक नए कार्बन बाज़ार की स्थापना के प्रावधान पर देशों में असहमति बनी हुई है।

क्या है कार्बन बाज़ार?

  • कार्बन बाज़ार (Carbon Market) के अंतर्गत विश्व के विभिन्न देश या कंपनियाँ उनके द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी के चलते प्राप्त किये गए एक प्रमाण-पत्र, जिसे सर्टिफाइड उत्सर्जन कटौती (Certified Emission Reduction-CER) या कार्बन क्रेडिट (Carbon Credit) कहा जाता है, का क्रय-विक्रय करती हैं।
  • जिन कंपनियों ने ग्रीनहाउस गैसों में कटौती के माध्यम से कार्बन ऑफसेट के लक्ष्यों की प्राप्ति की है उनके द्वारा अतिरिक्त कटौती करने पर उन्हें कार्बन क्रेडिट प्राप्त होगा।
  • कार्बन क्रेडिट में एक यूनिट एक टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) या कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (CO2e) के बराबर होगा।

कार्बन बाज़ार की क्रियाविधि:

  • पेरिस समझौते (Paris Agreement) के तहत विश्व के अधिकांश देशों ने वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य रखा है परंतु इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये यह आवश्यक नहीं है कि उत्सर्जन में कमी ही की जाए। ऐसा करना आर्थिक विकास में बाधक हो सकता है।
  • ऐसी स्थिति में कार्बन बाज़ार एक बेहतर विकल्प है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई विकसित देश अपने उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों की प्राप्ति करने में असफल रहता है तो वह अपने धन या तकनीक के हस्तांतरण से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करने के लिये किसी विकासशील देश की मदद कर सकता है। इस तरीके से उक्त देश कार्बन क्रेडिट प्राप्त कर सकता है।
  • क्योंकि ये कार्बन क्रेडिट बिक्री योग्य होते हैं, अतः कोई कंपनी या देश इसे खरीद सकता है तथा स्वयं उसके द्वारा की गई उत्सर्जन में कटौती के रूप में इसे प्रस्तुत कर सकता है।
  • हालाँकि कार्बन बाज़ार का प्रावधान क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) में भी किया गया था किंतु अगले वर्ष से लागू होने वाले पेरिस समझौते में इसके कुछ प्रावधानों में बदलाव होंगे तथा इससे संबंधित मॉनीटरिंग एवं जाँच प्रक्रिया को भी बढ़ाया जाएगा।

कार्बन बाज़ार से संबंधित विवाद:

  • क्योटो प्रोटोकॉल के क्रियान्वयन के दौरान विकासशील देशों ने लाखों की संख्या में कार्बन क्रेडिट अर्जित किया। इस प्रोटोकॉल के तहत केवल विकसित देशों को ही अनिवार्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करनी थी। अतः बहुत देशों ने इसे भारत तथा चीन जैसे देशों से खरीदा।
  • पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने खुद को क्योटो प्रोटोकॉल से अलग कर लिया तथा उत्सर्जन में कमी के लिये अब वे बाध्य नहीं रहे। इस प्रकार कार्बन क्रेडिट्स की मांग में कमी हुई एवं भारत जैसे देशों को इसका नुकसान झेलना पड़ा।
  • भारत के पास लगभग 750 मिलियन कार्बन क्रेडिट्स या CER है जिसकी बिक्री नहीं हुई है। ऐसे ही अन्य देश जिनके CER की बिक्री नहीं हुई है, वे चाहते हैं कि पेरिस समझौते के दौर में भी उनकी बिक्री हो।
  • इसके विपरीत विकसित देश इसका विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि क्योटो प्रोटोकॉल के नियमों तथा जाँच प्रक्रिया सुदृढ़ नहीं थी। अतः वे पेरिस समझौते के तहत नए सिरे से इसकी शुरुआत करना चाहते हैं।
  • इस विवाद का अन्य मुख्य कारण कार्बन क्रेडिट्स की दोहरी गणना तथा इसके समायोजन से संबंधित है। नई प्रक्रिया के तहत इन क्रेडिट्स को बाज़ार में देशों या निजी कंपनियों के बीच कई बार खरीदा-बेचा जा सकता है। अतः इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि इन क्रेडिट्स की एक बार से अधिक गणना न की जाए।
  • विकासशील देशों का मानना है कि जिन देशों ने अपने उत्सर्जन में कमी की है उन्हें यह अधिकार होना चाहिये कि वे अपने क्रेडिट्स को बेचने के बाद भी उत्सर्जन में हुई इस कमी को दिखा सकें।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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